मेंटल हेल्थ- परफेक्शन की चाह में डेडलाइन मिस:बेस्ट करने में चक्कर में अटक रहा काम, करियर पर बुरा असर, संतुलन कैसे बनाऊं

मेंटल हेल्थ- परफेक्शन की चाह में डेडलाइन मिस:बेस्ट करने में चक्कर में अटक रहा काम, करियर पर बुरा असर, संतुलन कैसे बनाऊं

सवाल- मैं 29 साल का हूं और एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता हूं। मैं बचपन से ही बिल्कुल परफेक्शनिस्ट रहा हूं। हर छोटी-छोटी चीज की एकदम डिटेल में चला जाता हूं। टीम के लोग कहते हैं कि मैं अनावश्यक रूप से काम को खींचता हूं। लेकिन प्रॉब्लम ये है कि अगर काम 100% परफेक्ट न हो तो मैं सबमिट ही नहीं कर पाता। इस चक्कर में डेडलाइन मिस हो जाती है। परफेक्ट न कर पाने और डेडलाइन मिस करने के डर से मैं नए प्रोजेक्ट नहीं लेता। अब इसका असर मेरे परफॉर्मेंस रिव्यू और करियर पर पड़ रहा है। अच्छा करने की कोशिश में मेरे करियर को नुकसान हो रहा है। मैं बैलेंस कैसे बनाऊं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। आप जो बता रहे हैं, वह सिर्फ ‘ज्यादा मेहनती’ या ‘डिटेल पर ध्यान देने वाला’ होने की बात नहीं है। शुरू में परफेक्शन की आदत आपको आगे बढ़ाती है, लेकिन जब यही आदत काम पूरा करने से रोकने लगे, डेडलाइन मिस होने लगे और नए मौके लेने से डर लगने लगे—तो हमें इसे थोड़ा अलग तरीके से समझने की जरूरत है। हेल्दी परफेक्शनिज्म अपने लिए हाई स्टैंडर्ड रखना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। परफेक्शनिज्म एक अच्छी बात हो सकती है, अगर वो हेल्दी परफेक्शनिज्म हो। जैसेकि यह आपको- ये सभी बहुत अच्छे गुण हैं, जो आपकी ग्रोथ में मदद करते हैं। अनहेल्दी परफेक्शनिज्म लेकिन अब सवाल ये है कि हेल्दी परफेक्शनिज्म कब अनहेल्दी यानी नुकसानदायक परफेक्शनिज्म में बदल जाता है। समस्या तब शुरू होती है, जब आपके हाई स्टैंडर्ड्स के साथ एक तरह का डर जुड़ जाता है। तब व्यक्ति अच्छा और परफेक्ट काम सिर्फ अच्छा करने के लिए नहीं करता। वो ये काम किसी डर से करता है। जैसेकि- आपके भीतर क्या चल रहा है? इसके पीछे अक्सर कुछ छिपे हुए विश्वास काम कर रहे होते हैं। जैसेकि- और इसके उलट ये डर सताता है- ऐसा सोचने पर व्यक्ति सच को बहुत सीमित फ्रेम में देखने लगता है। जैसकि– इसका असर काम पर कैसे दिखता है? इन मानसिकता का असर काम पर भी पड़ता है और धीरे-धीरे कुछ पैटर्न बनने लगते हैं। सभी पैटर्न नीचे ग्राफिक में देखें– बाहर से देखकर लगता है कि यह “बहुत मेहनत” का काम है, लेकिन अगर भीतर उतरकर देखें तो यहां एंग्जाइटी और सेल्फ डाउट का एक खेल चल रहा होता होता है। नीचे ग्राफिक में हेल्दी और अनहेल्दी परफेक्शनिज्म का फर्क देखें। इस केस में साफ है— आपका परफेक्शनिज्म अच्छा है या नुकसानदायक करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक में कुल 16 सवाल हैं। इन सवालों को 0 से 4 के स्केल पर रेट करें और अंत में अपने स्कोर की एनालिसिस करें। अगर आपका टोटल स्कोर 49 से ज्यादा है तो आपको प्रोफेशनल हेल्प लेनी चाहिए। CBT आधारित मैनेजमेंट प्लान 1. परफेक्शनिस्ट सोच को पहचानना और बदलना काम करते समय रुककर देखें- आपके दिमाग में क्या चल रहा है? नोट: ये विचार अक्सर अपने-आप आते हैं, लेकिन इन्हें नोटिस करना जरूरी है। खुद से सवाल पूछें (रियलिटी चेक) हर विचार को तुरंत सच मानने के बजाय सवाल करें— नोट: इससे आपको दिखेगा कि आपका डर अक्सर चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा होता है। बैलेंस्ड सोच बनाएं अब उसी सोच को थोड़ा संतुलित तरीके से बदलें— नोट: यह सोच आपको आगे बढ़ने में मदद करती है, रोकती नहीं है। 100% की जगह ‘काफी अच्छा’ सोचें खुद से सवाल पूछें— नोट: अगर जवाब ‘हां’ है, तो इसका मतलब है कि काम तैयार है। डेली यूज के लिए छोटा सा अभ्यास जब भी अटकें तो ये 3 स्टेप फॉलो करें: याद रखने वाली जरूरी बात “आपका लक्ष्य परफेक्ट बनना नहीं, बल्कि काम को समय पर और प्रभावी तरीके से पूरा करना है।” 2. ब्लैक-एंड-व्हाइट सोच छोड़ें आप जीवन को ब्लैक-एंड-व्हाइट तरीके से देखते और सोचते हैं। जैसे- इस सोच को बदलने के लिए ये स्टेप फॉलो करें। 1. सवाल बदलें गलत सवाल- “क्या ये परफेक्ट है?” सही सवाल- “क्या ये सही और उपयोगी है?” नोट: इससे फोकस क्वालिटी से हटकर उपयोगिता पर आता है। 2. ‘काफी अच्छा’ को स्वीकार करें हर काम 100% परफेक्ट होना जरूरी नहीं, 80–90% तक अच्छा होना काफी है। नोट: सोचें कि क्या यह काम अपने उद्देश्य को पूरा कर रहा है? अगर हां, तो यह पर्याप्त है। 3. स्केल में सोचना शुरू करें (0–10) परफेक्ट/फेल की जगह खुद से पूछें— “यह काम 10 में से कितना है?” अगर जवाब 7–8 है, तो यह अच्छा काम है नोट: इससे सोच में संतुलन आता है। मध्यम मार्ग समझ में आता है। 4. गलती को ‘फेलियर’ नहीं, ‘फीडबैक’ मानें नोट: इस सोच से डर कम होता है और आप आगे बढ़ पाते हैं। 3. काम की अहमियत के अनुसार मेहनत करें काम को तीन श्रेणियों में बांटें– 1. हाई प्रिऑरिटी– ‘बेहतरीन काम’ सोच: “यह काम मेरी पहचान दिखाता है, इसे बेस्ट करना जरूरी है।” 2. मीडियम प्रिऑरिटी– “अच्छा और साफ काम” सोच: “यह काम सही होना चाहिए, पर परफेक्ट होना जरूरी नहीं है।” 3. लो प्रिऑरिटी– “बस पूरा करना” सोच: इंपॉर्टेंस के हिसाब से इस काम को ज्यादा वक्त देना सही नहीं है।” 4. पहले से तय करें “काम कब पूरा है” प्रॉब्लम- हमें पता ही नहीं होता कि काम कब “पूरा” माना जाए। इसलिए हम उसे बार-बार सुधारते रहते हैं। सॉल्यूशन- काम शुरू करने से पहले उसकी टाइम लाइन तय करें। 1. पहले क्लियर करें– क्या करना है सोच: “मुझे बस इतना करना है, इससे ज्यादा नहीं।” 2. समय पहले तय करें हर काम के लिए एक लिमिट सेट करें, जैसे- ईमेल: 10 मिनट रिपोर्ट: 30–40 मिनट सोच: समय तय होने से आप अनावश्यक डिटेल में नहीं फंसते। 3. समय पूरा होते ही रुकें सोच: ये आदत अनहेल्दी परफेक्शनिज्म को कंट्रोल करती है याद रखने वाली बात “अगर “खत्म होने की लाइन” तय नहीं होगी तो काम कभी खत्म नहीं होगा। समय पर पूरा काम, देरी के परफेक्ट काम से बेहतर है।” 5. एक्सपेरिमेंट करें प्रॉब्लम: परफेक्शनिज्म में हमारा दिमाग मान लेता है कि अगर काम 100% परफेक्ट नहीं हुआ, तो जरूर कुछ गलत होगा। सॉल्यूशन: इस डर को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है- छोटे-छोटे एक्सपेरिमेंट करना। एक्सपेरिमेंट कैसे करें? सोच: “यह काम पर्याप्त अच्छा है, अब इसे भेज सकता हूं।” 6. क्रॉस चेकिंग कम करें बार-बार चेक करने से काम बेहतर नहीं होता, सिर्फ लेट होता है। इसलिए नियम बनाएं: 7. बचने की आदत छोड़ें सोच: “पूरा नहीं, छोटा हिस्सा शुरू करता हूं।” 8. सेल्फ-वर्थ को काम से अलग रखें गलत सोच: काम से मेरी पहचान है। काम खराब हुआ तो इसका मतलब कि मैं ही खराब हूं। सही सोच: मेरी पहचान सिर्फ मेरे काम से नहीं है। मैं परफेक्शन की कोशिश करता हूं। उससे मेरा महत्व तय नहीं होता। 9. ताकत रखें, जिद छोड़ें रखें: छोड़ें: डेली प्रैक्टिस हर दिन के अंत में खुद से पूछें— नोट: यही छोटे बदलाव धीरे-धीरे बड़ा फर्क लाते हैं। निष्कर्ष परफेक्शन की चाह अच्छी है, लेकिन जब यह रुकावट बनने लगे तो समस्या बन जाती है। लक्ष्य “हर बार परफेक्ट” नहीं, बल्कि “समय पर अच्छा काम” होना चाहिए। जब आप 100% की जिद छोड़कर 80–90% पर फोकस करते हैं, तो काम की स्पीड, आत्मविश्वास और मौके, तीनों बढ़ते हैं। इसलिए जीवन में सबसे जरूरी चीज है संतुलन, जिसे बुद्ध ने मध्यम मार्ग कहा है। ………………
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