संदीप पुरोहित
परिवार संस्था में पति-पत्नी के बीच अलगाव की सबसे बड़ी मार बच्चों पर पड़ती है। यह मार जब कुरीति का रूप लेती जा रही किसी सामाजिक परिपाटी से पड़े तो बच्चों का बचपन छिनता नजर आता है। राजस्थान में आदिवासी समुदाय समेत कई दूसरे समुदायों में नाता प्रथा की परिपाटी बच्चों को ऐसा ही दंश दे रही है, जिसमें उन्हें या तो बिल्कुल अनाथ के रूप में रहने को मजबूर होना पड़ता है या फिर सौतेले माता-पिता के भेदभाव को सहना पड़ता है। नाता प्रथा दाम्पत्य जीवन में आई कटुता, जीवनसाथी का किसी कारण से साथ छूटने के दौर में महिला को दूसरा जीवनसाथी अपनाने का अवसर देती है।
घर बसाने के लिहाज से तो इसे ठीक समझा जा सकता है लेकिन परेशानी वहां शुरू होती है, जहां इस नए रिश्ते का असर नए माता-पिता के कारण बच्चों की जिंदगी पर पड़ता है। नाता होने के बाद बच्चे अमूमन माता-पिता से अलग हो जाते हैं। इस प्रथा के अनुसार जब मां नई गृहस्थी में चली जाती है उसके पूर्व पति से जन्मे बच्चों को पालन-पोषण के लिए दादा-दादी या दूसरे रिश्तेदारों के भरोसे रहने को मजबूर होना पड़ता है। पति की मृत्यु के बाद मां का नाता चले जाना और बच्चों का पीछे छूट जाना ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें केवल परिवार की निजी समस्या मानकर छोड़ देना ठीक नहीं होगा। यह एक बड़ा सामाजिक सवाल है।
वयस्क अपने जीवन को नई दिशा खोज लेते हैं, लेकिन कई बार बच्चे उसी मोड़ पर खड़े रह जाते हैं, जहां उनका बचपन पीछे छूटने लगता है। बचपन में भावनात्मक सुरक्षा का बहुत महत्व है। माता-पिता का साथ नहीं मिलने का असर बच्चे की पढ़ाई, उसके व्यवहार और उसके व्यक्तित्व पर पड़ सकता है। इसलिए नाता प्रथा को लेकर बहस इसे सही या गलत ठहराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। किसी वयस्क को नया जीवन शुरू करने का अधिकार है लेकिन उसी के साथ यह भी तय होना चाहिए कि पीछे छूट रहे बच्चों की जिम्मेदारी कौन उठाएगा। असल में तो नाता तब ही हो जब बच्चों से नाता न टूटे।
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