धनबाद के बरमसिया स्थित दोहाटांड़ कुम्हार पट्टी में इन दिनों मिट्टी के दीयों की खुशबू और चाक की घूमती रफ्तार दिवाली की तैयारी का अहसास करा रही है। यहां करीब 40 से 80 कुम्हार परिवार रहते हैं। सभी परिवार त्योहार की तैयारी में जुटे हैं। कोई मिट्टी के दीये बना रहा है, तो कोई गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों को आकार दे रहा है। बच्चों के खिलौने और सजावटी सामान भी तैयार किए जा रहे हैं। कुम्हार परिवारों के लिए दिवाली साल का सबसे बड़ा कारोबारी मौका है। इसी त्योहार में होने वाली बिक्री से उनके परिवार की आजीविका चलती है। हर परिवार अपनी क्षमता के अनुसार 50 हजार से एक लाख तक मिट्टी के दीये तैयार करता है। स्थानीय कुम्हार राजेंद्र पंडित प्रजापति बताते हैं कि वे पिछले तीन से चार महीने से इसकी तैयारी कर रहे हैं। मिट्टी से सामान बनाने के बाद उसे अच्छी तरह सुखाना पड़ता है। बारिश और मौसम में बदलाव के कारण कई बार परेशानी होती है। समय पर सामान नहीं सूखने से काम प्रभावित होता है। इसलिए परिवार के लोग लगातार इस काम में लगे रहते हैं। मिट्टी महंगी, मेहनत ज्यादा; कीमत को लेकर चिंता राजेंद्र पंडित प्रजापति के मुताबिक, इस बार पिछले साल की तुलना में मिट्टी की कीमत बढ़ गई है। इससे दीये बनाने की लागत भी बढ़ी है। मिट्टी लाने से लेकर सामान तैयार करने और उसे सुखाने तक मेहनत करनी पड़ती है। इसके बावजूद बाजार में ग्राहक ज्यादा कीमत देने को तैयार नहीं हैं। दुकान लगाने के दौरान भी कुम्हारों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वहीं, नीलम देवी बताती हैं कि उनका पूरा परिवार करीब तीन महीने से लगातार मिट्टी के सामान बनाने में जुटा है। परिवार के लोग गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, बच्चों के खिलौने और अलग-अलग आकार के दीये तैयार कर रहे हैं। त्योहार को देखते हुए उत्पादन भी किया जा रहा है। लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी आमदनी उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाती है। कच्चे माल की बढ़ती कीमत और बाजार में बिक्री की अनिश्चितता से परिवारों की चिंता बढ़ी हुई है। इलेक्ट्रॉनिक दीयों और सजावटी लाइट से कारोबार पर असर कुम्हार परिवारों का कहना है कि बाजार में इलेक्ट्रॉनिक दीये और तरह-तरह की सजावटी लाइट आने से मिट्टी के पारंपरिक दीयों की मांग प्रभावित हुई है। पहले की तुलना में अब लोग कम मिट्टी के दीये खरीद रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक रोशनी के बढ़ते चलन का असर सीधे उनके कारोबार पर पड़ रहा है। एक तरफ मिट्टी महंगी हो रही है, दूसरी तरफ तैयार सामान की बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रही है। इससे मेहनत और लागत के मुकाबले कम आमदनी हो रही है। पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के काम से जुड़े इन परिवारों के सामने अब रोजगार और परिवार चलाने की चुनौती है। इसके बावजूद दोहाटांड़ के कुम्हार परिवार अपनी परंपरा को बचाए रखने में जुटे हैं। हर साल की तरह इस बार भी वे दिवाली के लिए हजारों दीये तैयार कर रहे हैं। उनकी उम्मीद है कि त्योहार के दौरान मिट्टी के दीयों की खरीदारी होगी और उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सकेगा। धनबाद के बरमसिया स्थित दोहाटांड़ कुम्हार पट्टी में इन दिनों मिट्टी के दीयों की खुशबू और चाक की घूमती रफ्तार दिवाली की तैयारी का अहसास करा रही है। यहां करीब 40 से 80 कुम्हार परिवार रहते हैं। सभी परिवार त्योहार की तैयारी में जुटे हैं। कोई मिट्टी के दीये बना रहा है, तो कोई गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों को आकार दे रहा है। बच्चों के खिलौने और सजावटी सामान भी तैयार किए जा रहे हैं। कुम्हार परिवारों के लिए दिवाली साल का सबसे बड़ा कारोबारी मौका है। इसी त्योहार में होने वाली बिक्री से उनके परिवार की आजीविका चलती है। हर परिवार अपनी क्षमता के अनुसार 50 हजार से एक लाख तक मिट्टी के दीये तैयार करता है। स्थानीय कुम्हार राजेंद्र पंडित प्रजापति बताते हैं कि वे पिछले तीन से चार महीने से इसकी तैयारी कर रहे हैं। मिट्टी से सामान बनाने के बाद उसे अच्छी तरह सुखाना पड़ता है। बारिश और मौसम में बदलाव के कारण कई बार परेशानी होती है। समय पर सामान नहीं सूखने से काम प्रभावित होता है। इसलिए परिवार के लोग लगातार इस काम में लगे रहते हैं। मिट्टी महंगी, मेहनत ज्यादा; कीमत को लेकर चिंता राजेंद्र पंडित प्रजापति के मुताबिक, इस बार पिछले साल की तुलना में मिट्टी की कीमत बढ़ गई है। इससे दीये बनाने की लागत भी बढ़ी है। मिट्टी लाने से लेकर सामान तैयार करने और उसे सुखाने तक मेहनत करनी पड़ती है। इसके बावजूद बाजार में ग्राहक ज्यादा कीमत देने को तैयार नहीं हैं। दुकान लगाने के दौरान भी कुम्हारों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वहीं, नीलम देवी बताती हैं कि उनका पूरा परिवार करीब तीन महीने से लगातार मिट्टी के सामान बनाने में जुटा है। परिवार के लोग गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां, बच्चों के खिलौने और अलग-अलग आकार के दीये तैयार कर रहे हैं। त्योहार को देखते हुए उत्पादन भी किया जा रहा है। लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी आमदनी उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाती है। कच्चे माल की बढ़ती कीमत और बाजार में बिक्री की अनिश्चितता से परिवारों की चिंता बढ़ी हुई है। इलेक्ट्रॉनिक दीयों और सजावटी लाइट से कारोबार पर असर कुम्हार परिवारों का कहना है कि बाजार में इलेक्ट्रॉनिक दीये और तरह-तरह की सजावटी लाइट आने से मिट्टी के पारंपरिक दीयों की मांग प्रभावित हुई है। पहले की तुलना में अब लोग कम मिट्टी के दीये खरीद रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक रोशनी के बढ़ते चलन का असर सीधे उनके कारोबार पर पड़ रहा है। एक तरफ मिट्टी महंगी हो रही है, दूसरी तरफ तैयार सामान की बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं हो रही है। इससे मेहनत और लागत के मुकाबले कम आमदनी हो रही है। पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के काम से जुड़े इन परिवारों के सामने अब रोजगार और परिवार चलाने की चुनौती है। इसके बावजूद दोहाटांड़ के कुम्हार परिवार अपनी परंपरा को बचाए रखने में जुटे हैं। हर साल की तरह इस बार भी वे दिवाली के लिए हजारों दीये तैयार कर रहे हैं। उनकी उम्मीद है कि त्योहार के दौरान मिट्टी के दीयों की खरीदारी होगी और उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सकेगा।

