डॉ. रवींद्र भारती:लोककला अपने समय में हमेशा समसामयिक रही:देशज परंपराओं और आधुनिक कला के जुड़ाव पर हुई चर्चा

डॉ. रवींद्र भारती:लोककला अपने समय में हमेशा समसामयिक रही:देशज परंपराओं और आधुनिक कला के जुड़ाव पर हुई चर्चा

जयपुर में संस्कार भारती के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. रवींद्र भारती जयपुर में प्री-लोकमंथन कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे। यहां उन्होंने कहा कि लोक कला केवल अतीत की परंपराओं को संजोने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह अपने समय, समाज और परिस्थितियों के साथ निरंतर बदलती रही है। भारतीय लोक के अंतर्गर्भ में प्रकृति प्रेरित विश्व-सृष्टि की भावना सदैव सक्रिय रही है। लोक कला अपने समय में समसामयिक रही है और देश, काल व परिस्थिति के अनुरूप कल्याणकारी स्वरूप को सामने लाती रही है। राजस्थान विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग और संस्कार भारती, जयपुर प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। संगीत विभाग के मुख्य सभागार में ‘लोक से संतृप्त समसामयिक कला’ विषय पर पैनल चर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम लोकमंथन के ‘देश-काल-स्थिति : हम भारत के लोग’ विषय के तहत आयोजित हुआ। चर्चा में कलाकारों और कला विशेषज्ञों ने लोक परंपराओं, आंचलिक परिवेश और समसामयिक कला के बीच संबंधों पर विचार साझा किए। लोक और समसामयिक कला के बीच संबंध पर संवाद पैनल चर्चा में आमंत्रित कलाकारों डॉ. विजय मा. धोरे, डॉ. क्षमा द्विवेदी, मदन राठौड़, मदन सिंह, मनीष शर्मा और रंजित सरकार ने लोक के अर्थ और उसकी व्यापकता पर चर्चा की। कलाकारों ने बताया कि किस तरह लोक कला आज भी समसामयिक कला को नए विषय, प्रतीक और अभिव्यक्ति प्रदान कर रही है। चर्चा में आंचलिक परिवेश के प्रतीकों, प्रकृति के रूपाकारों और देशज परंपराओं से जुड़े उपादानों को आधुनिक कला से जोड़ने के विभिन्न पहलुओं पर भी विचार हुआ। कलाकारों ने अपने अनुभवों और कला यात्रा के माध्यम से बताया कि लोक से जुड़े तत्व केवल सजावटी प्रतीक नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे समाज, संस्कृति, प्रकृति और जीवन से जुड़ी गहरी संवेदनाएं मौजूद हैं। कार्यक्रम में वार्ताकार निधीश गोयल ने सभी कलाकारों के बीच सूत्रधार की भूमिका निभाते हुए चर्चा को आगे बढ़ाया। लोक में प्रकृति और कल्याण की भावना डॉ. रवीन्द्र भारती ने कहा कि भारतीय लोक परंपरा के भीतर प्रकृति से प्रेरित सृष्टि की अवधारणा हमेशा सक्रिय रही है। लोक कला ने अपने समय की आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को अभिव्यक्त किया है। उन्होंने लोक की भावना को लोकमंथन की अवधारणा से जोड़ते हुए कहा कि लोक केवल किसी क्षेत्र विशेष की परंपरा नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना और जीवन अनुभवों का प्रतिबिंब है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं प्रो. डॉ. मधु भट्ट तैलंग ने संगीत की परंपरा को समसामयिकता से जोड़ते हुए देशज उदाहरणों के माध्यम से लोक की अवधारणा को समझाया। उन्होंने बताया कि लोक परंपराएं स्थिर नहीं होतीं, बल्कि समय के साथ उनमें नए अनुभव और अभिव्यक्तियां जुड़ती रहती हैं। ‘अभिव्यक्ति संवाद’ पत्रिका का विमोचन कार्यक्रम के दौरान कला एवं संस्कृति पर केंद्रित ‘अभिव्यक्ति संवाद’ पत्रिका का विमोचन भी किया गया। इसमें उपस्थित विशिष्ट अतिथियों और कलाकारों ने सहभागिता की। कार्यक्रम की शुरुआत मां शारदे की स्तुति, वंदे मातरम् और कुलगीत से हुई। विभागाध्यक्ष एवं संयोजक डॉ. अमिता राज गोयल ने अतिथियों और कलाकारों का अंगवस्त्र एवं पौधा भेंट कर स्वागत किया। कार्यक्रम की भूमिका आयोजन सचिव डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने रखी, जबकि संचालन डॉ. अमित कल्ला ने किया। समापन संस्कार भारती के महामंत्री बनवारी लाल चेजारा के धन्यवाद ज्ञापन और राष्ट्रगान के साथ हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविद, कलाकार, शोधार्थी और विद्यार्थी मौजूद रहे।

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