छात्रों, दिव्यांगों और बुजुर्गों को मुफ्त सफर कराते हैं धर्मेंद्र:रोज 200-300 रुपए कमाने वाले जमुई के ई-रिक्शा ड्राइवर ने किराया नहीं लेने के 3 नियम बनाए

छात्रों, दिव्यांगों और बुजुर्गों को मुफ्त सफर कराते हैं धर्मेंद्र:रोज 200-300 रुपए कमाने वाले जमुई के ई-रिक्शा ड्राइवर ने किराया नहीं लेने के 3 नियम बनाए

कभी आर्थिक तंगी और पिता की असमय मौत ने धर्मेंद्र कुमार के पढ़ाई के सपने को अधूरा छोड़ दिया था। परिवार की जिम्मेदारी ऐसी आई कि इंटर तक पढ़ाई करने के बाद उन्हें किताबों की जगह ई-रिक्शा का हैंडल थामना पड़ा। लेकिन पढ़ाई छूटने का दर्द आज भी उनके मन में है। शायद यही वजह है कि अब वह नहीं चाहते कि किसी दूसरे बच्चे का सपना भी पैसों की कमी के कारण अधूरा रह जाए। इसी सोच के साथ जमुई के इंदपे गांव निवासी धर्मेंद्र कुमार अपनी सीमित कमाई के बावजूद जरूरतमंदों को मुफ्त सफर करा रहे हैं। उनका वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल है और लोग उनकी खूब सराहना कर रहे हैं। खुद की पढ़ाई छूटी, दूसरों के सपनों को दे रहे रफ्तार धर्मेंद्र पेशे से ई-रिक्शा चालक हैं। रोजाना करीब 200 से 300 रुपये कमाते हैं। इसी कमाई से परिवार का खर्च चलाते हैं। घर में बुजुर्ग मां और पत्नी हैं। पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। आर्थिक परेशानी के कारण वह आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सके। अब उनकी कोशिश है कि दूसरे बच्चों को ऐसी मजबूरी का सामना नहीं करना पड़े। तीन वर्गों से कभी नहीं लेते किराया धर्मेंद्र ने अपने ई-रिक्शा के लिए तीन नियम बनाए हैं। स्कूल-कॉलेज और कोचिंग जाने वाले छात्र-छात्राओं, दिव्यांगजनों और सड़क पर पैदल चलने वाले बुजुर्ग महिला-पुरुषों से वह कभी किराया नहीं लेते। रास्ते में ऐसे लोग दिखते ही अपना ई-रिक्शा रोक देते हैं और उन्हें सम्मान के साथ उनकी मंजिल तक पहुंचाते हैं। धर्मेंद्र कहते हैं कि पढ़ाई के दौरान आर्थिक परेशानी कितनी बड़ी चुनौती होती है, यह उन्होंने खुद महसूस किया है। इसलिए छात्रों से कहते हैं कि किराये में बचने वाले पैसे पढ़ाई पर खर्च करें और अपने माता-पिता का नाम रोशन करें। वहीं बुजुर्गों और दिव्यांगों से किराया लेना उन्हें अच्छा नहीं लगता। किराये की जगह मांगते हैं आशीर्वाद धर्मेंद्र बताते हैं कि पिछले डेढ़ साल से उनके मन में मुफ्त सेवा शुरू करने का विचार था। दोस्तों की सलाह पर करीब 20-22 दिन पहले उन्होंने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालना शुरू किया। लोग उनसे पूछते हैं कि किराया नहीं लेंगे तो पार्किंग का पैसा कहां से देंगे? इस पर उनका जवाब होता है कि आशीर्वाद दे दीजिए, वही काफी है।

वह कहते हैं कि यह काम वायरल होने के लिए नहीं कर रहे हैं। अगर सोशल मीडिया से कोई कमाई होती है तो उसे भी जरूरतमंदों के बीच खर्च करेंगे। धर्मेंद्र की यह पहल बताती है कि दूसरों की मदद करने के लिए बड़ी हैसियत नहीं, बल्कि बड़ा दिल होना जरूरी है। अपनी अधूरी पढ़ाई के दर्द को दूसरों के सपनों का सहारा बनाने वाले धर्मेंद्र आज जमुई में इंसानियत की मिसाल बन रहे हैं। कभी आर्थिक तंगी और पिता की असमय मौत ने धर्मेंद्र कुमार के पढ़ाई के सपने को अधूरा छोड़ दिया था। परिवार की जिम्मेदारी ऐसी आई कि इंटर तक पढ़ाई करने के बाद उन्हें किताबों की जगह ई-रिक्शा का हैंडल थामना पड़ा। लेकिन पढ़ाई छूटने का दर्द आज भी उनके मन में है। शायद यही वजह है कि अब वह नहीं चाहते कि किसी दूसरे बच्चे का सपना भी पैसों की कमी के कारण अधूरा रह जाए। इसी सोच के साथ जमुई के इंदपे गांव निवासी धर्मेंद्र कुमार अपनी सीमित कमाई के बावजूद जरूरतमंदों को मुफ्त सफर करा रहे हैं। उनका वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल है और लोग उनकी खूब सराहना कर रहे हैं। खुद की पढ़ाई छूटी, दूसरों के सपनों को दे रहे रफ्तार धर्मेंद्र पेशे से ई-रिक्शा चालक हैं। रोजाना करीब 200 से 300 रुपये कमाते हैं। इसी कमाई से परिवार का खर्च चलाते हैं। घर में बुजुर्ग मां और पत्नी हैं। पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। आर्थिक परेशानी के कारण वह आगे पढ़ाई जारी नहीं रख सके। अब उनकी कोशिश है कि दूसरे बच्चों को ऐसी मजबूरी का सामना नहीं करना पड़े। तीन वर्गों से कभी नहीं लेते किराया धर्मेंद्र ने अपने ई-रिक्शा के लिए तीन नियम बनाए हैं। स्कूल-कॉलेज और कोचिंग जाने वाले छात्र-छात्राओं, दिव्यांगजनों और सड़क पर पैदल चलने वाले बुजुर्ग महिला-पुरुषों से वह कभी किराया नहीं लेते। रास्ते में ऐसे लोग दिखते ही अपना ई-रिक्शा रोक देते हैं और उन्हें सम्मान के साथ उनकी मंजिल तक पहुंचाते हैं। धर्मेंद्र कहते हैं कि पढ़ाई के दौरान आर्थिक परेशानी कितनी बड़ी चुनौती होती है, यह उन्होंने खुद महसूस किया है। इसलिए छात्रों से कहते हैं कि किराये में बचने वाले पैसे पढ़ाई पर खर्च करें और अपने माता-पिता का नाम रोशन करें। वहीं बुजुर्गों और दिव्यांगों से किराया लेना उन्हें अच्छा नहीं लगता। किराये की जगह मांगते हैं आशीर्वाद धर्मेंद्र बताते हैं कि पिछले डेढ़ साल से उनके मन में मुफ्त सेवा शुरू करने का विचार था। दोस्तों की सलाह पर करीब 20-22 दिन पहले उन्होंने इसका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालना शुरू किया। लोग उनसे पूछते हैं कि किराया नहीं लेंगे तो पार्किंग का पैसा कहां से देंगे? इस पर उनका जवाब होता है कि आशीर्वाद दे दीजिए, वही काफी है।

वह कहते हैं कि यह काम वायरल होने के लिए नहीं कर रहे हैं। अगर सोशल मीडिया से कोई कमाई होती है तो उसे भी जरूरतमंदों के बीच खर्च करेंगे। धर्मेंद्र की यह पहल बताती है कि दूसरों की मदद करने के लिए बड़ी हैसियत नहीं, बल्कि बड़ा दिल होना जरूरी है। अपनी अधूरी पढ़ाई के दर्द को दूसरों के सपनों का सहारा बनाने वाले धर्मेंद्र आज जमुई में इंसानियत की मिसाल बन रहे हैं।  

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