जमुई जिले के खैरा स्थित ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर में आस्था और इतिहास की अनूठी परंपरा आज भी जीवंत है। करीब 300 साल से अधिक पुराने इस मंदिर में चंदेल राजाओं के समय से मां दुर्गा की पूजा होती आ रही है। नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। कोई माता के दर्शन करने पहुंचता है, तो कोई अपनी मन्नत पूरी होने पर खोइछा भरने आता है। मंदिर की धार्मिक परंपराएं और चंदेल राजाओं से जुड़ा इतिहास इसे इलाके के प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल करते हैं। मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा जारी स्थानीय मान्यताओं और बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार, चंदेल वंश के शासक राजा राम नारायण सिंह ने मंदिर की स्थापना कराई थी। यह मंदिर चंदेल राजाओं के ऐतिहासिक किले के मुख्य द्वार पर स्थित है। समय बदला, राजपरिवार का दौर समाप्त हुआ, लेकिन मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा जारी रही। स्थानीय निवासी ललन मेहता के अनुसार, राजा राम नारायण सिंह के बाद उनके पुत्र और चंदेल वंश के अंतिम राजा गुरु प्रसाद सिंह ने भी पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया। बाद में गुरु प्रसाद सिंह के कोलकाता चले जाने के बाद गोयनका परिवार ने दुर्गा पूजा के आयोजन की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद स्थानीय लोगों ने पूजा की व्यवस्था अपने हाथों में ले ली। अहले सुबह 3 बजे नहाते हैं श्रद्धालु पिछले पांच दशक से अधिक समय से ग्रामीणों के सहयोग से यहां दुर्गा पूजा आयोजित की जा रही है। इस तरह मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की सामूहिक आस्था और विरासत का प्रतीक भी बन गया है। नवरात्र के दिनों में मंदिर की दिनचर्या सुबह तड़के शुरू हो जाती है। परंपरा के अनुसार, श्रद्धालु सुबह करीब तीन बजे राजा तालाब में स्नान करते हैं। इसके बाद कई भक्त दंडवत करते हुए मंदिर तक पहुंचते हैं और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं। किले के अंदर स्थित गहबर में कलश स्थापना की जाती है। बड़ी संख्या में दी जाती है बकरों की बलि सप्तमी के दिन बेलभरनी जुलूस निकाला जाता है, जिसमें धार्मिक उत्साह के साथ श्रद्धालु शामिल होते हैं। मंदिर की प्रमुख परंपराओं में अष्टमी की रात होने वाला धार्मिक आयोजन भी शामिल है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, इस दौरान बड़ी संख्या में बकरों की बलि दी जाती है। नवरात्र में आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। दर्शन, पूजा और मन्नतों के कारण मंदिर परिसर में पूरे पर्व के दौरान विशेष चहल-पहल रहती है। खैरा का यह दुर्गा मंदिर समय के साथ बदलते सामाजिक परिवेश के बीच अपनी ऐतिहासिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को सहेजे हुए है। चंदेल राजाओं के दौर से चली आ रही पूजा और पीढ़ियों से जुड़े स्थानीय लोगों का सहयोग इस मंदिर की विरासत को आज भी कायम रखे हुए है। जमुई जिले के खैरा स्थित ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर में आस्था और इतिहास की अनूठी परंपरा आज भी जीवंत है। करीब 300 साल से अधिक पुराने इस मंदिर में चंदेल राजाओं के समय से मां दुर्गा की पूजा होती आ रही है। नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। कोई माता के दर्शन करने पहुंचता है, तो कोई अपनी मन्नत पूरी होने पर खोइछा भरने आता है। मंदिर की धार्मिक परंपराएं और चंदेल राजाओं से जुड़ा इतिहास इसे इलाके के प्रमुख आस्था केंद्रों में शामिल करते हैं। मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा जारी स्थानीय मान्यताओं और बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार, चंदेल वंश के शासक राजा राम नारायण सिंह ने मंदिर की स्थापना कराई थी। यह मंदिर चंदेल राजाओं के ऐतिहासिक किले के मुख्य द्वार पर स्थित है। समय बदला, राजपरिवार का दौर समाप्त हुआ, लेकिन मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा जारी रही। स्थानीय निवासी ललन मेहता के अनुसार, राजा राम नारायण सिंह के बाद उनके पुत्र और चंदेल वंश के अंतिम राजा गुरु प्रसाद सिंह ने भी पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया। बाद में गुरु प्रसाद सिंह के कोलकाता चले जाने के बाद गोयनका परिवार ने दुर्गा पूजा के आयोजन की जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद स्थानीय लोगों ने पूजा की व्यवस्था अपने हाथों में ले ली। अहले सुबह 3 बजे नहाते हैं श्रद्धालु पिछले पांच दशक से अधिक समय से ग्रामीणों के सहयोग से यहां दुर्गा पूजा आयोजित की जा रही है। इस तरह मंदिर केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की सामूहिक आस्था और विरासत का प्रतीक भी बन गया है। नवरात्र के दिनों में मंदिर की दिनचर्या सुबह तड़के शुरू हो जाती है। परंपरा के अनुसार, श्रद्धालु सुबह करीब तीन बजे राजा तालाब में स्नान करते हैं। इसके बाद कई भक्त दंडवत करते हुए मंदिर तक पहुंचते हैं और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं। किले के अंदर स्थित गहबर में कलश स्थापना की जाती है। बड़ी संख्या में दी जाती है बकरों की बलि सप्तमी के दिन बेलभरनी जुलूस निकाला जाता है, जिसमें धार्मिक उत्साह के साथ श्रद्धालु शामिल होते हैं। मंदिर की प्रमुख परंपराओं में अष्टमी की रात होने वाला धार्मिक आयोजन भी शामिल है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, इस दौरान बड़ी संख्या में बकरों की बलि दी जाती है। नवरात्र में आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग यहां पहुंचते हैं। दर्शन, पूजा और मन्नतों के कारण मंदिर परिसर में पूरे पर्व के दौरान विशेष चहल-पहल रहती है। खैरा का यह दुर्गा मंदिर समय के साथ बदलते सामाजिक परिवेश के बीच अपनी ऐतिहासिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को सहेजे हुए है। चंदेल राजाओं के दौर से चली आ रही पूजा और पीढ़ियों से जुड़े स्थानीय लोगों का सहयोग इस मंदिर की विरासत को आज भी कायम रखे हुए है।

