उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव चुपचाप हो चुका है। अब चुनाव सिर्फ जातीय समीकरणों से नहीं जीते जाते। जाति अब भी निर्णायक है, लेकिन उसके ऊपर एक नया राजनीतिक स्तर बन चुका है- लाभार्थी राजनीति, महिला वोटिंग और मोबाइल आधारित नैरेटिव का स्तर।
2014 तक यूपी की राजनीति का केंद्र जातीय वोट बैंक थे। 2017 में हिंदुत्व और मजबूत नेतृत्व की राजनीति उभरी। 2022 आते-आते भारतीय जनता पार्टी ने “फ्री राशन + कानून व्यवस्था + मोदी-योगी मॉडल” को स्थायी चुनावी रणनीति में बदल दिया। लेकिन 2027 की लड़ाई शायद इससे भी आगे जाने वाली है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अब सबसे निर्णायक वर्ग वह है जिसे पहले बिखरा हुआ माना जाता था-महिला वोटर, युवा वोटर और स्मार्टफोन उपयोगकर्ता।
महिला वोटर: यूपी की सबसे बड़ी राजनीतिक बदलाव
2022 विधानसभा चुनाव के बाद आए CSDS-Lokniti सर्वे के मुताबिक बीजेपी को महिला वोटरों में पुरुषों की तुलना में ज्यादा बढ़त मिली थी। चुनाव बाद के अध्ययनों में यह सामने आया कि सरकारी योजनाओं का असर महिला वोटरों पर साफ दिखाई दिया।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव सिर्फ “महिला मतदान” का नहीं, बल्कि “महिला राजनीतिक निर्णय” का बदलाव है।
उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन, शौचालय, आवास योजना और सीधे बैंक खाते में पैसे भेजने जैसी योजनाओं ने पहली बार बड़ी संख्या में गरीब महिला वोटरों को सीधे सरकार से जोड़ा।
लखनऊ की रहने वाली 42 वर्षीय गृहिणी शशि देवी कहती हैं कि पहले चुनाव में घर के पुरुष तय करते थे किसे वोट देना है। अब राशन, गैस और सुरक्षा देखकर महिलाएं खुद फैसला लेती हैं। इसी वजह से अब लगभग हर बड़ी पार्टी महिला वोटर को अपनी मुख्य रणनीति का हिस्सा बना रही है।
समाजवादी पार्टी महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता और PDA यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक राजनीति पर जोर दे रही है, जबकि बीजेपी “लाभार्थी वर्ग” को अपने सबसे स्थायी सामाजिक गठबंधन के रूप में देख रही है।
रोजगार बनाम एक्सप्रेसवे: विकास मॉडल की असली परीक्षा
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाएं बीजेपी सरकार की राजनीतिक पहचान बन चुकी हैं।
- पूर्वांचल एक्सप्रेसवे
- गंगा एक्सप्रेसवे
- डिफेंस कॉरिडोर
- नए एयरपोर्ट और लॉजिस्टिक नेटवर्क
इन परियोजनाओं को “नए उत्तर प्रदेश” की तस्वीर के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल रोजगार को लेकर है।
CMIE के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में देश में बेरोजगारी दर कई महीनों में 8–9 प्रतिशत के ऊपर रही, जबकि युवाओं में बेरोजगारी को लेकर चिंता लगातार बनी रही। 15–24 आयु वर्ग में बेरोजगारी दर 45 प्रतिशत से ऊपर दर्ज की गई थी।
हालांकि सरकारी श्रम सर्वेक्षण अपेक्षाकृत कम बेरोजगारी दिखाते हैं, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, संविदा नौकरी और भर्ती परीक्षाओं में देरी युवा असंतोष का बड़ा कारण बने हुए हैं।
प्रयागराज के 26 वर्षीय प्रतियोगी छात्र आदित्य मिश्रा कहते हैं कि सड़क और एयरपोर्ट अच्छे हैं, लेकिन नौकरी नहीं होगी तो युवा आखिर कब तक सिर्फ विकास के पोस्टर देखेगा? पेपर लीक, भर्ती परीक्षा रद्द होना और पुलिस भर्ती में देरी जैसे मुद्दे सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होते हैं। यही कारण है कि 2027 में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा सवाल सिर्फ विकास दिखाना नहीं, बल्कि रोजगार पर भरोसा बनाए रखना होगा।
अब चुनाव मैदान में नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर भी लड़ा जाएगा
2027 का यूपी चुनाव संभवतः पहला ऐसा चुनाव होगा जिसमें मोबाइल स्क्रीन राजनीतिक माहौल बनाने में टीवी से ज्यादा प्रभावी दिख सकती है।
TRAI और इंटरनेट उपयोग से जुड़े उद्योग अध्ययनों के मुताबिक ग्रामीण भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसका सीधा असर राजनीतिक प्रचार पर पड़ा है।
अब गांव का वोटर सिर्फ टीवी डिबेट नहीं देखता- वह व्हाट्सऐप मैसेज, फेसबुक वीडियो, यूट्यूब शॉर्ट्स और इंस्टाग्राम रील्स से भी राजनीतिक राय बना रहा है।
वाराणसी के एक बीजेपी रणनीतिकार, जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बात की, कहते हैं कि 2027 में बूथ प्रबंधन जितना जरूरी होगा, उतना ही व्हाट्सऐप प्रबंधन भी होगा।
वहीं समाजवादी पार्टी के एक डिजिटल प्रचार सदस्य का दावा है कि PDA नैरेटिव सोशल मीडिया पर स्वाभाविक तरीके से फैल रहा है। युवाओं का गुस्सा अब सीधे वीडियो में दिखता है।”
जाति खत्म नहीं हुई… उसका “सॉफ्टवेयर अपडेट” हुआ है
यूपी में जातीय राजनीति समाप्त नहीं हुई है। लेकिन उसका स्वरूप बदल गया है। 1990 के दशक की राजनीति बड़े जातीय समूहों पर आधारित थी- यादव, जाटव, ब्राह्मण, ठाकुर या मुस्लिम ध्रुवीकरण।
अब ध्यान छोटी लेकिन प्रभावशाली जातियों पर है।निषाद, मौर्य, कुर्मी, राजभर, लोध और पासी जैसी जातियां कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बीजेपी ने गैर-यादव पिछड़ा वर्ग और गैर-जाटव दलित समुदायों पर लगातार काम किया है, जबकि समाजवादी पार्टी PDA यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक गठजोड़ को नए सामाजिक समीकरण के रूप में पेश कर रही है।
बहुजन समाज पार्टी के कमजोर पड़ने से दलित वोट के पुनर्वितरण ने भी यूपी की राजनीति को अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया है।
2024 लोकसभा चुनाव ने क्या संकेत दिए?
2024 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को उत्तर प्रदेश में नुकसान जरूर हुआ, लेकिन वह राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी रही। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने PDA रणनीति और जातीय गठजोड़ के जरिए मजबूत वापसी की।
कई चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि 2024 ने एक नई तस्वीर दिखाई:
- महिला लाभार्थी वोट अभी भी बीजेपी के साथ दिखा
- लेकिन युवा और बेरोजगारी का मुद्दा विपक्ष के लिए राजनीतिक जगह बना रहा
- PDA रणनीति ने कई सीटों पर सामाजिक गणित बदला
- संविधान और आरक्षण जैसे मुद्दे दलित-पिछड़ा राजनीति में फिर से केंद्र में आए
असली मुकाबला: दो राजनीतिक मॉडलों की लड़ाई
| बीजेपी मॉडल | समाजवादी पार्टी मॉडल |
|---|---|
| हिंदुत्व + लाभार्थी राजनीति | PDA + सामाजिक न्याय |
| बुनियादी ढांचा विकास | रोजगार और आरक्षण |
| मजबूत नेतृत्व | सामाजिक गठबंधन |
| मोदी-योगी ब्रांड | स्थानीय जातीय लामबंदी |
दिलचस्प बात यह है कि दोनों पार्टियों का सबसे बड़ा फोकस अब महिला और युवा वोटर पर है।


