मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने नगर परिषद अध्यक्षों के निर्वाचन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए 20 से अधिक याचिकाओं को खारिज कर दिया। जस्टिस प्रणय वर्मा की सिंगल बेंच ने कहा कि अत्यधिक विलंब से दायर याचिकाओं में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि कई नगर परिषद अध्यक्षों ने वैध राजपत्र अधिसूचना (गजट नोटिफिकेशन) जारी हुए बिना ही पदभार ग्रहण कर लिया और लंबे समय से अध्यक्ष पद का उपयोग कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि ऐसे अध्यक्षों को कार्य करने से रोका जाए और उनकी प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियां समाप्त की जाएं। गजट नोटिफिकेशन को लेकर उठे थे सवाल याचिकाओं में मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1961 की धारा 19, 20 और 45 का हवाला देते हुए कहा गया था कि नगर परिषद अध्यक्ष के निर्वाचन के बाद राजपत्र अधिसूचना जारी होना अनिवार्य है। बिना अधिसूचना कोई व्यक्ति विधिसम्मत तरीके से अध्यक्ष पद पर कार्य नहीं कर सकता। हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि जिन अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है, वे वर्ष 2022 से संबंधित हैं, जबकि याचिकाएं वर्ष 2026 में दायर की गई। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता इतने लंबे समय तक निष्क्रिय क्यों रहे, इसका कोई संतोषजनक कारण प्रस्तुत नहीं किया गया। रिट अधिकार विवेकाधीन, देरी पर राहत जरूरी नहीं हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत प्रदत्त रिट अधिकार विवेकाधीन होता है। यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक अपने अधिकारों के प्रति निष्क्रिय बना रहता है तो बाद में उसे राहत देना आवश्यक नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित नगर परिषद अध्यक्ष पिछले कई वर्षों में अनेक प्रशासनिक और वित्तीय निर्णय ले चुके हैं। ऐसे में अब हस्तक्षेप करने से प्रशासनिक अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है। समय पर अधिकारों का इस्तेमाल भी जरूरी कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय केवल अधिकार प्राप्त करने का विषय नहीं है, बल्कि समय पर उन अधिकारों का उपयोग करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी आधार पर सभी याचिकाओं को अत्यधिक देरी से दायर माना गया और खारिज कर दिया गया। मामले में एडवोकेट विनय गांधी ने थांदला और मंडलेश्वर नगर परिषद अध्यक्षों की ओर से पैरवी की।


