आईना : आखिर क्‍यों झेले राजस्‍थान !

आईना : आखिर क्‍यों झेले राजस्‍थान !

राजस्थान आखिर हर बार दूसरों के पापों का प्रायश्चित क्यों करे? दिल्ली की तरफ से जहरीली हवा आती है, पंजाब की तरफ से जहरीला पानी आता है और हर बार राजस्थान उसे अपनी नियति मानकर आत्‍मसात कर लेता है। मानो इस प्रदेश की किस्मत में ही दूसरों की लापरवाही, लालच और प्रदूषण का बोझ ढोना लिखा हो। गंगनहर, भाखड़ा और इंदिरा गांधी नहर कभी रेगिस्तान की जीवनरेखा थीं। इन्हीं नहरों ने सूखी धरती पर हरियाली की इबारत लिखी। इन्हीं ने गांव बसाए, खेत बचाए, प्यास बुझाई। लेकिन अब वही नहरें धीरे-धीरे जहर की सौदागर बन चुकी हैं। जगजाहिर है कि लुधियाना का बुड्ढा नाला प्रतिदिन करोड़ों लीटर जहरीला सीवेज और औद्योगिक कचरा सतलुज में उड़ेल रहा है। पंजाब के अधिकारी भी मान चुके हैं कि सतलुज के प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत यही नाला है। यानी जहरीला पानी कोई रहस्य की कहानी नहीं है।

और वही काला पानी आगे राजस्थान की नहरों में उतरता है। उसी पानी से खेत सींचे जाते हैं। उसी से शहरों की प्यास बुझती है। और अब उसी पानी में मरी हुई मुर्गियां और इंसानी शव तैरते मिल रहे हैं। यह किसी भयावह उपन्यास का दृश्य नहीं, बल्कि उस राजस्थान की सच्चाई है जो दशकों से यह सब सह रहा है।

प्रदूषण नियमित रूप से आ रहा है। हमारे अफसरों की संवेदनशीलता इतनी सुन्न हो चुकी है कि जहरीले पानी का आना भी अब एक सामान्य प्रशासनिक सूचना भर रह गया है।

डर यह नहीं कि पानी गंदा है। डर यह है कि यह जहर धीरे-धीरे रगों में उतर रहा है कैंसर बनकर, असाध्य बीमारियां बनकर, आने वाली पीढ़ियों की तबाही बनकर। राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े सार्वजनिक मंच से कह चुके हैं कि पंजाब से आने वाला कैमिकलयुक्त पानी पश्चिमी राजस्थान में कैंसर का कारण बन रहा है। उन्होंने पंजाब के राज्यपाल को पत्र भी लिखा। जब राज्यपाल तक खुलकर यह कह रहे हैं कि पानी में जहर है, तब सवाल सरकारों से पूछा जाना चाहिए – आखिर वे कर क्या रही हैं? बैठकें? पत्राचार? समितियां? रिपोर्टें?

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) करोड़ों का जुर्माना लगा चुका। समितियां बन चुकीं। लेकिन राजस्थान के हिस्से में आज भी वही जहरीला पानी आ रहा है। गंगनहर में बहकर आने वाली मरी मुर्गियां इस पूरे सिस्टम के चेहरे पर तमाचा हैं। हर बार एफआइआर होती है। हर बार जांच शुरू होती है मगर हर बार पंजाब की सीमा पर जाकर कार्रवाई दम तोड़ देती है। यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं है, यह राजनीतिक कायरता है।

और अब तो इंसानी शव तक नहरों में बहकर राजस्थान पहुंच रहे हैं। हाल ही में सामने आए तथ्य बताते हैं कि बीते 16 वर्षों में 2300 से अधिक शव नहरों में मिले। लगभग दो हजार की पहचान तक नहीं हो सकी। सोचिए, जिन नहरों को जीवन देना था, वे अब सड़ांध और लावारिस मौतें ढो रही हैं। राजस्थान सरकार को अब यह समझना होगा कि यह कोई ‘रूटीन इंटर-स्टेट इश्यू’ नहीं है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा है। यह पर्यावरणीय हमला है। अगर पंजाब अपने उद्योगों, सीवेज और जहरीले अपशिष्ट को नियंत्रित नहीं कर पा रहा, तो उसका दंश राजस्थान क्यों झेले?

अब समय आ गया है कि राजस्थान बेहद स्पष्ट और कठोर रुख अपनाए। पंजाब के साथ उच्चस्तरीय वार्ता हो। संयुक्त निगरानी तंत्र बने। रियल टाइम वॉटर क्वालिटी मॉनिटरिंग हो। और यदि फिर भी हालात नहीं सुधरते, तो केंद्र सरकार और एनजीटी के माध्यम से कठोर संवैधानिक दबाव बनाया जाए। … क्‍योंकि रेगिस्तान ने पानी का मूल्य बूंद-बूंद से सीखा है। यह प्रदेश पानी को प्रसाद की तरह सहेजता है। और बदले में उसे जहर मिल रहा है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, राजस्थान के साथ अन्याय है। अब राजस्थान को साफ-साफ कहना ही होगा कि हमें पानी चाहिए, जहर नहीं।

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