Murshidabad में चुनाव के बीच बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद से लौट रहे हैं। ‘एसआइआर’ प्रक्रिया में नाम कटने और दबाव की शिकायतों के बीच वे वोट डालकर अपना वजूद साबित करना चाहते हैं, जिससे यह इलाका राजनीतिक रूप से बेहद अहम बन गया है।
मुर्शिदाबाद के रेलवे स्टेशन पर दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद से लौटते लोगों की भीड़ इस चुनाव का मिजाज बता रही है। धूलियां गांव के मोहम्मद शेख के परिवार के 14 वोट हैं। उन्हें धमकी मिली—वोट डालने आओ, वरना राशन बंद।
वे कहते हैं, बड़ी मुश्किल से ‘एसआइआर’ प्रक्रिया में कटे नाम जुड़वाए, इसलिए दिल्ली से लौटना पड़ा। यह सिर्फ शेख की कहानी नहीं, हर दिन सैकड़ों प्रवासी अपने वतन लौट रहे हैं।
गरीब मजदूर अपना वजूद दिखाने वोट डालने आ रहे हैं, जिनमें से कोई ‘एसआइआर’ प्रक्रिया की जटिलता की बात कर रहा है तो कोई नेताओं की चौधराहट की। कभी नवाबों की राजधानी रहा मुर्शिदाबाद अब गरीबी-पलायन और पश्चिम बंगाल की राजनीति का ‘एपिसेंटर’ है।
पावर सेंटर बनी रहती है सीट
मालदा के साथ मिलकर यह गंगा-पद्मा बेल्ट करीब 34 सीटों और प्रभाव वाली 60 सीटों के साथ सत्ता का ‘पावर सेंटर’ बनी रहती है। 2021 के चुनाव में मुर्शिदाबाद जिले की 22 में से 20 सीटें जीतकर टीएमसी ने नया कीर्तिमान बनाया था।
लेकिन, महज दो सीट जीतने वाली भाजपा ने इस बार जिले में ऐसी राजनीतिक चाल चली है कि टीएमसी उलझकर रह गई है। यहां चुनाव का शोर इस बार बहुरंगी है।
दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी, टीएमसी के बागी हुमायूं कबीर, कांग्रेस और वामपंथ के उम्मीदवारों ने मिलकर इस बार मुकाबले को चतुष्कोणीय बना दिया है।

बाहरी बनाम अपने और मुख्य मुकाबले वाली सीटें
1857 की पहली चिंगारी वाली इस धरती पर चुनाव पहचान, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और प्रायश्चित के त्रिकोण में फंसा दिख रहा है। कई सीटों पर ‘बाहरी बनाम अपने’ तो कई जगह टीएमसी में भितरघात है।
बहरामपुर में कांग्रेस के उम्मीदवार अधीर रंजन चौधरी की चौधराहट अब भी दिखती है। 2024 में ‘बाहरी को जिताने की भूल’ की बात कर मतदाता वर्ग प्रायश्चित के मूड में है।
टीएमसी सांसद यूसुफ पठान की ‘विजिटिंग सेलिब्रिटी’ छवि अधीर के पक्ष में सहानुभूति बना सकती है। मुकाबले में अधीर चौधरी, टीएमसी के नारू गोपाल मुखर्जी और बीजेपी के सुब्रत मैत्रा कंचन हैं।
रेजिनगर-नाओदा में टीएमसी के बागी हुमायूं कबीर अपनी पार्टी के साथ मैदान में हैं। ‘बाबरी मस्जिद’ का कार्ड खेलकर उन्होंने अल्पसंख्यक भावनाओं को हवा दी है। एआइएमआइएम से गठबंधन टूटने के बावजूद वे तृणमूल के समीकरण बिगाड़ने की कोशिश में हैं।
मुर्शिदाबाद (नगर) में भाजपा के गौरीशंकर घोष के सामने टीएमसी की शाओनी सिंह राय हैं। यहां भाजपा की रणनीति कोर हिंदुत्व और अल्पसंख्यक मतों के बिखराव पर टिकी है, जबकि वक्फ कानून पर ममता के यू-टर्न से समीकरण बदले हैं।
भितरघात, ममता मैजिक और वजूद की लड़ाई
जलांगी, डोमकल और रानीनगर में टीएमसी को भीतर से चुनौती मिल रही है। बड़वा और शक्तिपुर में भाजपा से सीधी टक्कर है। टिकट कटने से असंतोष खुलकर सामने है।
इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं और महिला वोटर्स पर भरोसा कर रही है, हालांकि स्थानीय नाराजगी और ‘बाहरी’ का मुद्दा उसे रक्षात्मक बनाता है।
‘एसआइआर’ प्रक्रिया में सबसे ज्यादा नाम कटने से महिलाएं घंटों कतार में खड़ी हैं। हजारद्वारी की राबिया खातून कहती हैं—’यह केवल वोट नहीं, नागरिकता साबित करने की जद्दोजहद है।’

इतिहास, अस्मिता और मुस्लिम वोट
मुर्शिदाबाद में ‘मीर जाफर’ और ‘जगत सेठ’ फिर चुनावी विमर्श में हैं। जाफरगंज की ‘नमक हराम देओढ़ी’ से लेकर रैलियों तक, गद्दारी और बाहरी प्रभाव के प्रतीक के रूप में इनका जिक्र हो रहा है।
ममता बनर्जी पार्टी छोड़ने वालों को ‘मीर जाफर’ बताकर निशाना साध रही हैं, वहीं ‘जगत सेठ’ के जरिए बंगाल की सत्ता को खरीदने की मंशा रखने वाले दिल्ली के नेताओं और पूंजीपतियों पर हमला कर रही हैं।
मीर जाफर के वंशजों के करीब 300 नाम ‘एसआइआर’ के बाद वोटर लिस्ट से हटने का मुद्दा भी गरम है। जिले में 70 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी है और पिछले चुनाव में 14 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते थे।
नाम कटने और यूसीसी जैसे मुद्दों के बीच मुस्लिम मतदाताओं के रुझान पर सभी दलों की नजर है। मालदा, मुर्शिदाबाद और 24 परगना में मुस्लिम मत निर्णायक हैं और वोटों के बंटवारे को लेकर चिंता भी दिखती है।
अधीर की चौधराहट, हुमायूं का बाबरी कार्ड, भाजपा की रणनीति और तृणमूल की योजनाओं के बीच यह मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। अब देखना है कि मुर्शिदाबाद 2016 की तस्वीर दोहराता है या 2021 जैसा परिणाम फिर सामने आता है।


