अझौर पंचायत में कुएं उपेक्षा का शिकार:आधुनिक जलापूर्ति से उपयोगिता घटी, ग्रामीणों ने जीर्णोद्धार मांगा की

अझौर पंचायत में कुएं उपेक्षा का शिकार:आधुनिक जलापूर्ति से उपयोगिता घटी, ग्रामीणों ने जीर्णोद्धार मांगा की

बेगूसराय सदर प्रखंड की अझौर पंचायत में पारंपरिक जलस्रोत, विशेषकर कुएं, उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। कभी ग्रामीण जीवन की आधारशिला रहे ये कुएं, आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था जैसे चापाकल और नल-जल योजना के विस्तार के कारण अपनी उपयोगिता खोते जा रहे हैं, जिससे इनके संरक्षण के प्रयास कमजोर पड़ गए हैं। पंचायत क्षेत्र में कई सार्वजनिक कुओं का वर्षों से जीर्णोद्धार नहीं हुआ है। कुछ कुएं भर दिए गए हैं, जबकि शेष जर्जर अवस्था में हैं, जिससे इन प्राचीन जलस्रोतों का अस्तित्व खतरे में है। जिन कुओं का जीर्णोद्धार हुआ भी है, वे नियमित साफ-सफाई और रखरखाव के अभाव में अनुपयोगी हो गए हैं। कई कुओं में गंदगी और झाड़-झंखाड़ जमा होने से उनका उपयोग करना मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों के अनुसार, जल संकट के समय ये कुएं सबसे बड़ा सहारा होते हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों जैसे सतइसा पूजा, विवाह के मटकोर और पनकट्टी में भी कुएं के जल का विशेष महत्व है, जो इनकी पारंपरिक उपयोगिता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिगत जलस्तर में गिरावट के बावजूद कुओं का जलस्तर अपेक्षाकृत स्थिर रहता है और गर्मियों में भी इनका पानी स्वाभाविक रूप से ठंडा रहता है। इसके बावजूद, “जल-जीवन-हरियाली” जैसे कार्यक्रमों के तहत इन जलस्रोतों के संरक्षण की योजनाएं धरातल पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रही हैं। अझौर पंचायत के वार्ड संख्या 7 में स्थित एक प्राचीन सार्वजनिक कुआं आज भी बदहाल है। सुरक्षा घेरा न होने के कारण दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। स्थानीय ग्रामीण शशि कुमार, हिमांशु कुमार, राकेश कुमार और कार्तिक शर्मा ने प्रशासन से सभी कुओं के शीघ्र जीर्णोद्धार की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि समय पर संरक्षण न होने से भविष्य में जल संकट और गहरा सकता है। वहीं जब पंचायत के मुखिया असगर इमाम ने इस संबंध में पूछा गया। तो उन्होंने कुछ बोलने से इनकार कर दिया। बेगूसराय सदर प्रखंड की अझौर पंचायत में पारंपरिक जलस्रोत, विशेषकर कुएं, उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। कभी ग्रामीण जीवन की आधारशिला रहे ये कुएं, आधुनिक जलापूर्ति व्यवस्था जैसे चापाकल और नल-जल योजना के विस्तार के कारण अपनी उपयोगिता खोते जा रहे हैं, जिससे इनके संरक्षण के प्रयास कमजोर पड़ गए हैं। पंचायत क्षेत्र में कई सार्वजनिक कुओं का वर्षों से जीर्णोद्धार नहीं हुआ है। कुछ कुएं भर दिए गए हैं, जबकि शेष जर्जर अवस्था में हैं, जिससे इन प्राचीन जलस्रोतों का अस्तित्व खतरे में है। जिन कुओं का जीर्णोद्धार हुआ भी है, वे नियमित साफ-सफाई और रखरखाव के अभाव में अनुपयोगी हो गए हैं। कई कुओं में गंदगी और झाड़-झंखाड़ जमा होने से उनका उपयोग करना मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों के अनुसार, जल संकट के समय ये कुएं सबसे बड़ा सहारा होते हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों जैसे सतइसा पूजा, विवाह के मटकोर और पनकट्टी में भी कुएं के जल का विशेष महत्व है, जो इनकी पारंपरिक उपयोगिता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिगत जलस्तर में गिरावट के बावजूद कुओं का जलस्तर अपेक्षाकृत स्थिर रहता है और गर्मियों में भी इनका पानी स्वाभाविक रूप से ठंडा रहता है। इसके बावजूद, “जल-जीवन-हरियाली” जैसे कार्यक्रमों के तहत इन जलस्रोतों के संरक्षण की योजनाएं धरातल पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रही हैं। अझौर पंचायत के वार्ड संख्या 7 में स्थित एक प्राचीन सार्वजनिक कुआं आज भी बदहाल है। सुरक्षा घेरा न होने के कारण दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। स्थानीय ग्रामीण शशि कुमार, हिमांशु कुमार, राकेश कुमार और कार्तिक शर्मा ने प्रशासन से सभी कुओं के शीघ्र जीर्णोद्धार की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि समय पर संरक्षण न होने से भविष्य में जल संकट और गहरा सकता है। वहीं जब पंचायत के मुखिया असगर इमाम ने इस संबंध में पूछा गया। तो उन्होंने कुछ बोलने से इनकार कर दिया।  

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