जिले के सदर प्रखंड की चांदपूरा पंचायत में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत निर्मित अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाई पूरी तरह बंद पड़ी है। 15वें वित्त आयोग की राशि से बनी इस इकाई का उद्देश्य गांव में कचरे का वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित करना था, लेकिन वर्तमान में यह केवल एक बंद भवन बनकर रह गई है। लाखों रुपये की लागत से तैयार यह परियोजना अब अपनी उपयोगिता खोती नजर आ रही है। ग्रामीणों के अनुसार, इकाई शुरू होने के कुछ ही समय बाद इसका संचालन ठप हो गया। यहां न तो नियमित रूप से कचरा पहुंच रहा है और न ही किसी प्रकार की प्रसंस्करण प्रक्रिया चल रही है। परिणामस्वरूप गांव में कचरा इधर-उधर फैला हुआ है, जिससे गंदगी बढ़ रही है और बीमारियों का खतरा भी मंडरा रहा है। विवेक कुमार, सिंटू कुमार, पिंटू कुमार, फूलों रजक, सुनील कुमार और सुमन कुमार सहित कई ग्रामीणों ने बताया कि यह योजना अब केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है। दीवारों पर स्वच्छता के संदेश जरूर लिखे गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कोई असर दिखाई नहीं देता। पंचायत में कचरा उठाव के लिए गाड़ियां और सफाई कर्मी उपलब्ध होने के बावजूद नियमित सफाई कार्य बाधित है। इसका मुख्य कारण सफाई कर्मियों को समय पर मानदेय नहीं मिलना बताया जा रहा है। शुरुआत में घर-घर से कचरा संग्रहण की व्यवस्था ठीक से चल रही थी, लेकिन अब यह लगभग पूरी तरह बंद हो चुकी है। मोहल्लों में सार्वजनिक डस्टबिन की कमी के कारण लोग मजबूरी में कचरा खुले में फेंक रहे हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ती जा रही है। वहीं, पंचायत सरकार भवन परिसर में कचरा उठाने वाले ठेले खुले आसमान के नीचे पड़े-पड़े जंग खा रहे हैं। यह दृश्य साफ दर्शाता है कि स्वच्छता से जुड़ी योजनाएं अब जमीनी स्तर पर दम तोड़ रही हैं। इस संबंध में जब पंचायत के मुखिया अरविंद कुमार साह से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द इकाई को चालू कर नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए, ताकि स्वच्छता अभियान का मूल उद्देश्य पूरा हो सके। जिले के सदर प्रखंड की चांदपूरा पंचायत में लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत निर्मित अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाई पूरी तरह बंद पड़ी है। 15वें वित्त आयोग की राशि से बनी इस इकाई का उद्देश्य गांव में कचरे का वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित करना था, लेकिन वर्तमान में यह केवल एक बंद भवन बनकर रह गई है। लाखों रुपये की लागत से तैयार यह परियोजना अब अपनी उपयोगिता खोती नजर आ रही है। ग्रामीणों के अनुसार, इकाई शुरू होने के कुछ ही समय बाद इसका संचालन ठप हो गया। यहां न तो नियमित रूप से कचरा पहुंच रहा है और न ही किसी प्रकार की प्रसंस्करण प्रक्रिया चल रही है। परिणामस्वरूप गांव में कचरा इधर-उधर फैला हुआ है, जिससे गंदगी बढ़ रही है और बीमारियों का खतरा भी मंडरा रहा है। विवेक कुमार, सिंटू कुमार, पिंटू कुमार, फूलों रजक, सुनील कुमार और सुमन कुमार सहित कई ग्रामीणों ने बताया कि यह योजना अब केवल कागजों तक सीमित होकर रह गई है। दीवारों पर स्वच्छता के संदेश जरूर लिखे गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कोई असर दिखाई नहीं देता। पंचायत में कचरा उठाव के लिए गाड़ियां और सफाई कर्मी उपलब्ध होने के बावजूद नियमित सफाई कार्य बाधित है। इसका मुख्य कारण सफाई कर्मियों को समय पर मानदेय नहीं मिलना बताया जा रहा है। शुरुआत में घर-घर से कचरा संग्रहण की व्यवस्था ठीक से चल रही थी, लेकिन अब यह लगभग पूरी तरह बंद हो चुकी है। मोहल्लों में सार्वजनिक डस्टबिन की कमी के कारण लोग मजबूरी में कचरा खुले में फेंक रहे हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ती जा रही है। वहीं, पंचायत सरकार भवन परिसर में कचरा उठाने वाले ठेले खुले आसमान के नीचे पड़े-पड़े जंग खा रहे हैं। यह दृश्य साफ दर्शाता है कि स्वच्छता से जुड़ी योजनाएं अब जमीनी स्तर पर दम तोड़ रही हैं। इस संबंध में जब पंचायत के मुखिया अरविंद कुमार साह से संपर्क करने का प्रयास किया गया तो स्पष्ट जवाब नहीं मिल सका। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द इकाई को चालू कर नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए, ताकि स्वच्छता अभियान का मूल उद्देश्य पूरा हो सके।


