बिना AC 45 डिग्री में राहत दे रहे दो मॉडल:घर की छत पर भिंडी-टमाटर से हो रही कूलिंग, अनोखी झोपड़ी हीटवेव से बचा रही

राजस्थान में गर्मी में कई शहरों का तापमान 45 डिग्री के पार भी पहुंचा है। घरों से लेकर दफ्तरों तक बिना एयर कंडीशनर के रह पाना मुश्किल है। लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जो ट्रेडिशनल मॉडल अपनाकर घर-दफ्तर का टेम्प्रेचर कम कर रहे हैं। एक तरफ जयपुर में बना नेट जीरो कूलिंग स्टेशनों में शामिल मॉडल है, जहां बिना एयर कंडीशनर के लोगों को राहत मिल रही है। वहीं, दूसरी ओर जयपुर के उद्यमी प्रतीक तिवारी का रूफटॉप फार्मिंग मॉडल है। जो राजस्थान से निकलकर देश के 32 से ज्यादा शहरों तक पहुंच चुका है और हजारों घरों की तपती छतों को प्राकृतिक एयर कंडीशनर में बदल रहा है। दैनिक भास्कर की विश्व पर्यावरण दिवस विशेष ग्राउंड रिपोर्ट में पड़ताल इन दोनों मॉडलों की, जो सिर्फ गर्मी से राहत नहीं दे रहे, बल्कि यह भी बता रहे हैं कि भविष्य के शहरों को ठंडा रखने का रास्ता शायद मशीनों से ज्यादा प्रकृति के बीच छिपा है। मॉडल-1 : छत पर उग रही भिंडी, बैंगन और कद्दू जयपुर के मानसरोवर स्थित मुकेश वासवानी के घर की छत किसी खेत के नजारे से कम नहीं। टीम जब उनकी छत पर पहुंची तो छत पर बड़े-बड़े ग्रो बैग्स और कंटेनरों में भिंडी, बैंगन, कद्दू, टमाटर, मिर्च और कई तरह की हरी सब्जियां लहलहा रही थीं। तेज धूप के बावजूद छत पर हरियाली की वजह से गर्मी अपेक्षाकृत कम महसूस हो रही थी। यह सिर्फ सब्जियां उगाने का प्रयोग नहीं था, बल्कि बढ़ती गर्मी से लड़ने का एक ऐसा मॉडल था जो घर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में भी मदद कर रहा है। मुकेश वासवानी बताते हैं कि एक साल पहले तक उनकी छत भी गर्मियों में तपती रहती थी। दोपहर के समय छत पर खड़ा होना मुश्किल हो जाता था और घर के कमरे देर रात तक गर्म रहते थे। लेकिन रूफटॉप फार्मिंग शुरू करने के बाद हालात बदल गए। अब छत पर मिट्टी, पौधों और सब्जियों की परत होने से धूप सीधे कंक्रीट पर नहीं पड़ती, जिससे घर के अंदर का तापमान पहले की तुलना में कम रहता है। कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ी, बना दिया स्टार्टअप इस बदलाव के पीछे जयपुर के उद्यमी प्रतीक तिवारी का मॉडल है। प्रतीक बताते हैं कि उन्होंने भी शुरुआत अपने घर से की थी। बढ़ती गर्मी और लगातार बढ़ते बिजली बिल ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया था। उन्होंने अपनी छत पर ऑर्गेनिक खेती शुरू की और कुछ ही महीनों में महसूस किया कि घर पहले से ज्यादा ठंडा रहने लगा है। इसके बाद उन्होंने इस विचार को एक मिशन में बदल दिया। कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर उन्होंने साल 2017 में ‘लिविंग ग्रीन्स ऑर्गेनिक्स’ नाम से अपना स्टार्टअप शुरु किया। लोगों को रूफटॉप फार्मिंग के जरिए घरों को प्राकृतिक तरीके से ठंडा रखने का समाधान देने लगे। आज उनके मॉडल से देश के 32 से ज्यादा शहरों में 4000 से अधिक परिवार जुड़े हुए हैं। जब छत बन गई ‘नेचुरल एयर कंडीशनर’ प्रतीक बताते हैं कि रूफटॉप फार्मिंग सिर्फ सब्जियां उगाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम की तरह भी काम करती है। छत पर मौजूद मिट्टी और पौधे सूरज की गर्मी का बड़ा हिस्सा सोख लेते हैं, जिससे कंक्रीट कम गर्म होती है और नीचे के कमरों में तापमान नियंत्रित रहता है। उनके अनुसार कई घरों में एसी और कूलर की जरूरत कम हुई है, जिससे बिजली बिल में भी कमी आई है। साथ ही परिवारों को ताजी और केमिकल मुक्त सब्जियां मिल रही हैं। मोबाइल की जगह पौधे बने बच्चों के दोस्त मानसरोवर निवासी भावना कहती हैं कि रूफटॉप फार्मिंग शुरू करने के बाद उनके घर का माहौल पूरी तरह बदल गया है। घर में बनने वाले जैविक कचरे से खाद तैयार की जाती है, जिसका इस्तेमाल पौधों में होता है। बच्चों को भी पौधों की देखभाल करने और प्रकृति के करीब रहने का मौका मिलता है। उनका कहना है कि पहले बच्चे खाली समय में मोबाइल पर लगे रहते थे, लेकिन अब वे पौधों को पानी देने और सब्जियां उगाने में रुचि लेते हैं। 70% सरकारी अनुदान ने बढ़ाई लोगों की दिलचस्पी रूफटॉप फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग ने पिछले साल जयपुर में ‘स्मार्ट सिटी रूफटॉप फार्मिंग परियोजना’ शुरू की थी। पायलट प्रोजेक्ट के तहत नगर निगम क्षेत्र के 250 घरों का चयन किया गया। यह चयन ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर किया गया था और इसमें केवल आवासीय भवनों को शामिल किया गया। परियोजना की जिम्मेदारी दुर्गापुरा स्थित अंतरराष्ट्रीय उद्यानिकी नवाचार एवं प्रशिक्षण संस्थान (ISITC) को दी गई। सरकार की तरफ से रूफटॉप फार्मिंग की लागत पर 70 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जा रही है। मॉडल-2 : बिना AC ठंडा हो रहा बस स्टैंड मानसरोवर के वीटी रोड स्थित बस स्टैंड पर बना नेट जीरो कूलिंग स्टेशन पहली नजर में एक सामान्य शेड जैसा दिखाई देता है, लेकिन जैसे ही कोई इसके भीतर प्रवेश करता है, बाहर और अंदर के तापमान का अंतर तुरंत महसूस होने लगता है। महिला हाउसिंग ट्रस्ट (MHT), जयपुर नगर निगम और आईआईएफएल फाउंडेशन की साझेदारी से बने इस स्टेशन में एयर कंडीशनर नहीं लगाया गया है। इसके बावजूद यहां बाहर की तुलना में 5 से 6 डिग्री तक कम तापमान महसूस होता है। इसका राज है खस के पर्दे, पानी की फुहारें, सोलर पावर और पारंपरिक वेंटिलेशन तकनीक। स्टेशन की दीवारों पर लगे खस के पर्दों पर लगातार पानी डाला जाता है। गर्म हवा जब इन गीले पर्दों से गुजरती है तो ठंडी होकर अंदर प्रवेश करती है। ऊपर बना विंड टावर गर्म हवा को बाहर निकाल देता है, जिससे लगातार ठंडी हवा का प्रवाह बना रहता है। पूरा सिस्टम सोलर ऊर्जा से संचालित होता है। दैनिक भास्कर की टीम जब मौके पर पहुंची तो वहां मजदूर, डिलीवरी बॉय और राहगीर गर्मी से राहत लेते दिखाई दिए। मजदूर रामअवतार बताते हैं- सुबह से शाम तक धूप में काम करते हैं। कई बार हालत खराब हो जाती है। यहां कुछ देर बैठने से शरीर को राहत मिलती है। ऐसा लगता है जैसे गर्मी से थोड़ी देर की छुट्टी मिल गई हो। हरकेश, जो दिहाड़ी मजदूर हैं, कहते हैं- ऐसे सेंटर पूरे शहर में होने चाहिए। सबसे ज्यादा जरूरत हम जैसे लोगों को है जो दिनभर धूप में रहते हैं। सेंटर स्टाफ अंजली के अनुसार यहां रोजाना 100 से ज्यादा लोग आते हैं। इनमें मजदूर, ऑटो चालक, डिलीवरी एजेंट, पार्सल कर्मी और राहगीर शामिल हैं। यह मॉडल इसलिए भी महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह राजस्थान की पारंपरिक हवेलियों और बावड़ियों की उसी तकनीक को आधुनिक रूप में वापस लाता है, जहां पानी, हवा और छाया के जरिए तापमान नियंत्रित किया जाता था। महिला हाउसिंग ट्रस्ट की प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर रचना शर्मा ने बताया कि जयपुर में नेट कूलिंग सेंटर स्थापित करने में लगभग 12 से 13 लाख का खर्चा आया है। राजस्थान में टोटल चार जगहों पर इन्हें लगाया गया है। एक जयपुर में दो जोधपुर में और एक चूरू में है। राजस्थान के अन्य शहरों में भी हम प्रयास कर रहे हैं। ये हमारा पायलट प्रोजेक्ट था, जिसे काफी सराहना मिली है।

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