रेलवे की जमीन पर खपरैल घर, मंदिर लाइट स्टडी लैंप:सूत काटने वाले का बेटा बनेगा IITian, JEE एडवांस में गयाजी के ओम की सक्सेस स्टोरी

रेलवे की जमीन पर खपरैल घर, मंदिर लाइट स्टडी लैंप:सूत काटने वाले का बेटा बनेगा IITian, JEE एडवांस में गयाजी के ओम की सक्सेस स्टोरी

JEE Advanced 2026 का रिजल्ट जारी कर दिया गया है। गयाजी के शुभम कुमार ने परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक-1 (AIR 1) हासिल की है। शुभम IIT दिल्ली जोन के छात्र हैं। उन्होंने कुल 360 में से 330 अंक प्राप्त किए हैं। वहीं, मानपुर पटवा टोली के रहने वाले एक मजूदर के बेटे ओम कुमार को भी सफलता मिली है। ओबीसी वर्ग में 10,668वीं रैंक हासिल किया है। ओम के पिता सुनील कुमार और मां बसंती देवी सूत करघे पर रोजाना 12-12 घंटे मजदूरी करते हैं, तब जाकर बमुश्किल 400 से 500 रुपए हाथ में आते हैं। इस महंगाई के दौर में इतने पैसों से घर चलाना ही किसी जंग से कम नहीं है। ​​यह कहानी सिर्फ एक रिजल्ट की नहीं है। बल्कि यह कहानी है उस पिता के आंसुओं की है जो दिन-रात खून-पसीना बहाता है। कहानी उस मां की जो तंगहाली में भी बेटे के सपनों को जिंदा रखती है। ओम के चाचा संतोष कुमार भावुक होते हुए कहते हैं कि हमारे पास रहने के लिए खुद की एक धुर जमीन तक नहीं है। रेलवे की जमीन पर किसी तरह एक छोटा सा खपड़े का मकान खड़ा किया गया है। जहां सुबह के बाद शाम के खाने का संकट है। उस घर में बड़े कॉलेजों की पढ़ाई के बारे में सोचना भी पाप था। लेकिन भतीजे की आंखों की चमक देखकर हमने हार नहीं मानी। मंदिर की लाइट बनी ‘स्टडी लैंप’, कोटा जाने के पैसे नहीं थे ओम के पास न तो अलग से कोई कमरा था और न ही पढ़ाई के लिए टेबल-कुर्सी। घर में दो छोटे भाई-बहन। 6 साल की खुशी और 4 साल का विष्णु है। सभी का पूरा जिम्मा पिता सुनील के ऊपर है। ​ऐसे में ओम ने अपनी राह खुद चुनी। वह दिन के 12 से 14 घंटे ‘वृक्ष बी द चेंज’ संस्था में जाकर पढ़ाई करता था। कोचिंग बंद होने के बाद ही लौटता था। घर में जगह नहीं बचती, तो मंदिर के पास लगी सरकारी वेपर लाइट(स्ट्रीट लाइट) के नीचे बैठ जाता और पूरी-पूरी रात किताबों में खोया रहता था। पैसों की तंगी इस कदर थी कि ओम चाहकर भी देश के सबसे बड़े कोचिंग हब ‘कोटा’ या फिर गयाजी के किसी कोचिंग सेंटर में नहीं जा सका। उसने इस कमी को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाया। कोचिंग के बड़े-बड़े दावों को दरकिनार कर ‘सेल्फ स्टडी’ को अपना सबसे अचूक हथियार बनाया। पहले ही प्रयास में IIT का दुर्ग फतह कर लिया। ओम ने पॉलिटेक्निक स्कूल से 10वीं और ग्रीन फील्ड स्कूल मानपुर से 12वीं की परीक्षा पास की है। ​सफलता के पीछे इन ‘सारथियों’ का रहा हाथ ​अपनी इस कामयाबी के बाद ओम के पैर जमीन पर हैं। उसने अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता के त्याग और अपने मार्गदर्शकों को दिया है। भावुक होते हुए कहा कि अगर उन्हें सही समय पर सही गाइडेंस नहीं मिलता, तो शायद वेपर लाइट के नीचे ही तपस्या अधूरी रह जाती। गुरु और मार्गदर्शक चंद्रकांत पाटेश्वरी, ​दुगेश्वर प्रसाद,​ रंजीत कुमार का काफी योगजान रहा। घर चलाने में करनी पड़ती है मशक्कत ओम के पिता सूत कातने का काम करते हैं। मानपुर हैंडलूम की दुनिया में सूत कातने को ‘जोड़नी-जोड़ना’ कहा जाता है। मतलब जब हैंडलूम मशीन की रील में धागा खत्म होता है, तब नए धागे को रील पर जोड़ कर मशीन पर चढ़ाते हैं। एक रील पर ‘जोड़नी-जोड़ने’ के लिए 60 से 70 रुपए मिलते है। दिन भर में 6 से 7 काम मिल गया तो बड़ी बात मानी जाती है। ऐसा कभी कभार ही होता है। अक्सर दिनभर में वे 300 से 400 रुपए ही कमा पाते हैं। इतना कमाने में ही दिन भर का समय लग जाता है। विद्यारानी को भी मिली सफलता जिले में केवल ओम ही नहीं बल्कि विद्यारानी ने भी कमाल किया है। नाना के घर मानपुर में पली बढ़ी विद्यारानी भी इसी कोचिंग में पढ़ती है। ‘वृक्ष वी द चेंज कोंचिग’ में ही रहती है। दिन रात मेहनत कर आईआईटी की एडवांस फाइनल परीक्षा में 10517 रैंक (ओबीसी) हासिल की है। भास्कर से बातचीत में विद्यारानी ने बताया कि ‘वृक्ष द चेंज’ निशुल्क में बच्चे को पढ़ाता है। यहां सिर्फ शिक्षा ही नहीं दी जाती है, बल्कि संस्कार भी बच्चों में कूट-कूटकर भरा जाता है। यह बड़ी बात है। यही दुनिया के तमाम कोचिंग से इसे अलग बनाती है। कोचिंग के 10 बच्चों को मिली सफलता डायरेक्टर चंद्रकांत पाटेश्वरी का कहना है कि उनके संस्थान से 31 बच्चों ने Mains क्लियर किया था। इनमें से दस बच्चे एडवांस में सफल हुए हैं। इस बार मैं संतुष्ट नहीं हूं। ये बच्चे और अच्छे कर सकते थे, लेकिन कट ऑफ हाई जाने और निगेटिव मार्किंग में बदलाव किए जाने की वजह से रैंक पर असर पड़ा है। हम आगे और मेहनत करेंगे। JEE Advanced 2026 का रिजल्ट जारी कर दिया गया है। गयाजी के शुभम कुमार ने परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक-1 (AIR 1) हासिल की है। शुभम IIT दिल्ली जोन के छात्र हैं। उन्होंने कुल 360 में से 330 अंक प्राप्त किए हैं। वहीं, मानपुर पटवा टोली के रहने वाले एक मजूदर के बेटे ओम कुमार को भी सफलता मिली है। ओबीसी वर्ग में 10,668वीं रैंक हासिल किया है। ओम के पिता सुनील कुमार और मां बसंती देवी सूत करघे पर रोजाना 12-12 घंटे मजदूरी करते हैं, तब जाकर बमुश्किल 400 से 500 रुपए हाथ में आते हैं। इस महंगाई के दौर में इतने पैसों से घर चलाना ही किसी जंग से कम नहीं है। ​​यह कहानी सिर्फ एक रिजल्ट की नहीं है। बल्कि यह कहानी है उस पिता के आंसुओं की है जो दिन-रात खून-पसीना बहाता है। कहानी उस मां की जो तंगहाली में भी बेटे के सपनों को जिंदा रखती है। ओम के चाचा संतोष कुमार भावुक होते हुए कहते हैं कि हमारे पास रहने के लिए खुद की एक धुर जमीन तक नहीं है। रेलवे की जमीन पर किसी तरह एक छोटा सा खपड़े का मकान खड़ा किया गया है। जहां सुबह के बाद शाम के खाने का संकट है। उस घर में बड़े कॉलेजों की पढ़ाई के बारे में सोचना भी पाप था। लेकिन भतीजे की आंखों की चमक देखकर हमने हार नहीं मानी। मंदिर की लाइट बनी ‘स्टडी लैंप’, कोटा जाने के पैसे नहीं थे ओम के पास न तो अलग से कोई कमरा था और न ही पढ़ाई के लिए टेबल-कुर्सी। घर में दो छोटे भाई-बहन। 6 साल की खुशी और 4 साल का विष्णु है। सभी का पूरा जिम्मा पिता सुनील के ऊपर है। ​ऐसे में ओम ने अपनी राह खुद चुनी। वह दिन के 12 से 14 घंटे ‘वृक्ष बी द चेंज’ संस्था में जाकर पढ़ाई करता था। कोचिंग बंद होने के बाद ही लौटता था। घर में जगह नहीं बचती, तो मंदिर के पास लगी सरकारी वेपर लाइट(स्ट्रीट लाइट) के नीचे बैठ जाता और पूरी-पूरी रात किताबों में खोया रहता था। पैसों की तंगी इस कदर थी कि ओम चाहकर भी देश के सबसे बड़े कोचिंग हब ‘कोटा’ या फिर गयाजी के किसी कोचिंग सेंटर में नहीं जा सका। उसने इस कमी को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाया। कोचिंग के बड़े-बड़े दावों को दरकिनार कर ‘सेल्फ स्टडी’ को अपना सबसे अचूक हथियार बनाया। पहले ही प्रयास में IIT का दुर्ग फतह कर लिया। ओम ने पॉलिटेक्निक स्कूल से 10वीं और ग्रीन फील्ड स्कूल मानपुर से 12वीं की परीक्षा पास की है। ​सफलता के पीछे इन ‘सारथियों’ का रहा हाथ ​अपनी इस कामयाबी के बाद ओम के पैर जमीन पर हैं। उसने अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता के त्याग और अपने मार्गदर्शकों को दिया है। भावुक होते हुए कहा कि अगर उन्हें सही समय पर सही गाइडेंस नहीं मिलता, तो शायद वेपर लाइट के नीचे ही तपस्या अधूरी रह जाती। गुरु और मार्गदर्शक चंद्रकांत पाटेश्वरी, ​दुगेश्वर प्रसाद,​ रंजीत कुमार का काफी योगजान रहा। घर चलाने में करनी पड़ती है मशक्कत ओम के पिता सूत कातने का काम करते हैं। मानपुर हैंडलूम की दुनिया में सूत कातने को ‘जोड़नी-जोड़ना’ कहा जाता है। मतलब जब हैंडलूम मशीन की रील में धागा खत्म होता है, तब नए धागे को रील पर जोड़ कर मशीन पर चढ़ाते हैं। एक रील पर ‘जोड़नी-जोड़ने’ के लिए 60 से 70 रुपए मिलते है। दिन भर में 6 से 7 काम मिल गया तो बड़ी बात मानी जाती है। ऐसा कभी कभार ही होता है। अक्सर दिनभर में वे 300 से 400 रुपए ही कमा पाते हैं। इतना कमाने में ही दिन भर का समय लग जाता है। विद्यारानी को भी मिली सफलता जिले में केवल ओम ही नहीं बल्कि विद्यारानी ने भी कमाल किया है। नाना के घर मानपुर में पली बढ़ी विद्यारानी भी इसी कोचिंग में पढ़ती है। ‘वृक्ष वी द चेंज कोंचिग’ में ही रहती है। दिन रात मेहनत कर आईआईटी की एडवांस फाइनल परीक्षा में 10517 रैंक (ओबीसी) हासिल की है। भास्कर से बातचीत में विद्यारानी ने बताया कि ‘वृक्ष द चेंज’ निशुल्क में बच्चे को पढ़ाता है। यहां सिर्फ शिक्षा ही नहीं दी जाती है, बल्कि संस्कार भी बच्चों में कूट-कूटकर भरा जाता है। यह बड़ी बात है। यही दुनिया के तमाम कोचिंग से इसे अलग बनाती है। कोचिंग के 10 बच्चों को मिली सफलता डायरेक्टर चंद्रकांत पाटेश्वरी का कहना है कि उनके संस्थान से 31 बच्चों ने Mains क्लियर किया था। इनमें से दस बच्चे एडवांस में सफल हुए हैं। इस बार मैं संतुष्ट नहीं हूं। ये बच्चे और अच्छे कर सकते थे, लेकिन कट ऑफ हाई जाने और निगेटिव मार्किंग में बदलाव किए जाने की वजह से रैंक पर असर पड़ा है। हम आगे और मेहनत करेंगे।  

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