लाइसेंस के बिना संचालित वाशिंग पिट से जलसंकट गहराने की आशंका, प्रतिदिन लाखों लीटर पानी बर्बाद, जिम्मेदार लापरवाह

लाइसेंस के बिना संचालित वाशिंग पिट से जलसंकट गहराने की आशंका, प्रतिदिन लाखों लीटर पानी बर्बाद, जिम्मेदार लापरवाह

भास्कर न्यूज|मधुबनी शहर एवं प्रखंड क्षेत्रों में बिना अधिकृत लाइसेंस के संचालित हो रहे वाहन वाशिंग पिट इन दिनों गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। छोटे और बड़े वाहनों की धुलाई के लिए संचालित इन केंद्रों में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में भू-जल का दोहन किया जा रहा है, जिससे भविष्य में जल संकट और गहराने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय संजीत कुमार, रमेश यादव, शंकर यादव व अन्य लोगों का कहना है कि गर्मी के मौसम में जहां आम नागरिकों को पेयजल की समस्या का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर वाशिंग पिटों में हज़ारों लीटर पानी की खुलेआम बर्बादी की जा रही है। शहर और आसपास के प्रखंड रहिका , पंडौल व अन्य क्षेत्रों में दर्जनों वाहन धुलाई केंद्र संचालित हैं। इनमें से अधिकांश के पास वैध लाइसेंस या संबंधित विभाग की अनुमति नहीं हैं। सबसे अधिक वाशिंग पिट शहरी क्षेत्रों में संचालित हो रहे हैं, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में दोपहिया, चारपहिया, मालवाहक एवं यात्री वाहन धुलते हैं। नाम ना बताने के शर्त पर एक वाशिंग पिट के संचालक ने कहा एक टू व्हीलर में 50 से 60 लीटर एक मध्यम आकार के चारपहिया वाहन की धुलाई में औसतन 150 से 250 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि बड़े मालवाहक ट्रक, बस या अन्य भारी वाहनों की धुलाई में 400 से 800 लीटर तक पानी उपयोग किया जाता है। यदि किसी वाशिंग पिट में प्रतिदिन 40 से 60 वाहन भी धुलते हैं तो वहां लगभग 10 हजार से 25 हजार लीटर पानी प्रतिदिन खर्च हो सकता है। शहर और प्रखंड क्षेत्रों के दर्जनों वाशिंग पिटों को मिलाकर यह आंकड़ा कई लाख लीटर तक पहुंच सकता है। चिंता की बात यह भी है कि अधिकांश केंद्रों पर पानी के पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) की कोई व्यवस्था नहीं है। धुलाई के बाद निकलने वाले अपशिष्टयुक्त पानी को सीधे नालों या खुले स्थानों में बहा दिया जाता है। कई स्थानों पर भू-जल पुनर्भरण के लिए सोखता (सोख पिट) तक नहीं बनाया गया है। इससे न केवल जल की बर्बादी हो रही है, बल्कि पर्यावरण प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है। वाहन धुलाई के लिए क्षमता वाले समरसेबल पंप और मोटरों का उपयोग किया जाता है, जो लगातार भू-जल का दोहन करते हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अनियंत्रित जल निकासी के कारण कई इलाकों में भू-जल स्तर नीचे जा रहा है। इसका असर हैंडपंप, चापाकल और घरेलू बोरिंग पर भी दिखाई देने लगा है।सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों ने प्रशासन से इस मामले की गंभीरता से जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि सभी वाशिंग पिटों के लाइसेंस, जल उपयोग की मात्रा तथा अपशिष्ट जल प्रबंधन की समीक्षा की जानी चाहिए। साथ ही अवैध रूप से संचालित केंद्रों पर कार्रवाई करते हुए जल संरक्षण संबंधी नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराया जाए। समय रहते इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आगे समस्या और बढ़ेगी। भास्कर न्यूज|मधुबनी शहर एवं प्रखंड क्षेत्रों में बिना अधिकृत लाइसेंस के संचालित हो रहे वाहन वाशिंग पिट इन दिनों गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। छोटे और बड़े वाहनों की धुलाई के लिए संचालित इन केंद्रों में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में भू-जल का दोहन किया जा रहा है, जिससे भविष्य में जल संकट और गहराने की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय संजीत कुमार, रमेश यादव, शंकर यादव व अन्य लोगों का कहना है कि गर्मी के मौसम में जहां आम नागरिकों को पेयजल की समस्या का सामना करना पड़ता है, वहीं दूसरी ओर वाशिंग पिटों में हज़ारों लीटर पानी की खुलेआम बर्बादी की जा रही है। शहर और आसपास के प्रखंड रहिका , पंडौल व अन्य क्षेत्रों में दर्जनों वाहन धुलाई केंद्र संचालित हैं। इनमें से अधिकांश के पास वैध लाइसेंस या संबंधित विभाग की अनुमति नहीं हैं। सबसे अधिक वाशिंग पिट शहरी क्षेत्रों में संचालित हो रहे हैं, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में दोपहिया, चारपहिया, मालवाहक एवं यात्री वाहन धुलते हैं। नाम ना बताने के शर्त पर एक वाशिंग पिट के संचालक ने कहा एक टू व्हीलर में 50 से 60 लीटर एक मध्यम आकार के चारपहिया वाहन की धुलाई में औसतन 150 से 250 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि बड़े मालवाहक ट्रक, बस या अन्य भारी वाहनों की धुलाई में 400 से 800 लीटर तक पानी उपयोग किया जाता है। यदि किसी वाशिंग पिट में प्रतिदिन 40 से 60 वाहन भी धुलते हैं तो वहां लगभग 10 हजार से 25 हजार लीटर पानी प्रतिदिन खर्च हो सकता है। शहर और प्रखंड क्षेत्रों के दर्जनों वाशिंग पिटों को मिलाकर यह आंकड़ा कई लाख लीटर तक पहुंच सकता है। चिंता की बात यह भी है कि अधिकांश केंद्रों पर पानी के पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) की कोई व्यवस्था नहीं है। धुलाई के बाद निकलने वाले अपशिष्टयुक्त पानी को सीधे नालों या खुले स्थानों में बहा दिया जाता है। कई स्थानों पर भू-जल पुनर्भरण के लिए सोखता (सोख पिट) तक नहीं बनाया गया है। इससे न केवल जल की बर्बादी हो रही है, बल्कि पर्यावरण प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है। वाहन धुलाई के लिए क्षमता वाले समरसेबल पंप और मोटरों का उपयोग किया जाता है, जो लगातार भू-जल का दोहन करते हैं। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि अनियंत्रित जल निकासी के कारण कई इलाकों में भू-जल स्तर नीचे जा रहा है। इसका असर हैंडपंप, चापाकल और घरेलू बोरिंग पर भी दिखाई देने लगा है।सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण प्रेमियों ने प्रशासन से इस मामले की गंभीरता से जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि सभी वाशिंग पिटों के लाइसेंस, जल उपयोग की मात्रा तथा अपशिष्ट जल प्रबंधन की समीक्षा की जानी चाहिए। साथ ही अवैध रूप से संचालित केंद्रों पर कार्रवाई करते हुए जल संरक्षण संबंधी नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराया जाए। समय रहते इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आगे समस्या और बढ़ेगी।  

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