जीविका दीदियों के आत्मनिर्भर बनने की कहानी:कोई दिल्ली से लौटकर चला रही दुकान, तो किसी ने नर्सरी और गौ-पालन कर कर आत्मनिर्भरता की कहानी लिखी

जीविका दीदियों के आत्मनिर्भर बनने की कहानी:कोई दिल्ली से लौटकर चला रही दुकान, तो किसी ने नर्सरी और गौ-पालन कर कर आत्मनिर्भरता की कहानी लिखी

मैं हराजी पंचायत के पुरुषोत्तमपुर गांव की पुनीत देवी हूं। पहले मैं पति और बच्चे के साथ दिल्ली में रहती थे। सास-ससूर बोलते थे कि यही आ जाओ, जीविका के माध्यम से काम करो। इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मन में डर था कि घर लौट जाऊंगी तो कुछ नहीं होगा, लेकिन सास-ससुर के बहुत कहने पर मैंने फैसला किया कि अब बिहार में रहकर ही कुछ काम करूंगी। 2016 में घर आई। इसी दौरान जीविका से जुड़ी और 30 हजार रुपए लोन लेकर ठेला खरीदा,फिर 50 हजार रुपए लोन लेकर समोसा लिट्टी की दुकान खोली। इसके बाद फिर 50 हजार रुपए लोन लेकर फ्रीज खरीदी। उसमें कोल्ड ड्रिंक्स, लस्सी और खाने के सामान रखती हूं। राजीव चौक पर दुकान अच्छी चल रही है। हराजी पंचायत की सीमा देवी बताती हैं कि मैं पहले घर से बाहर नहीं निकलती थी, लेकिन आत्मनिर्भर बनने की इच्छा थी। जीविका के बारे में जानकारी मिली। 2012 में जय बजरंग बली जीविका समूह से जुड़ी। जीविका समूह से पैसा लेकर दो कमरे में मशरूम का बैग तैयार करने लगी। आज हर रोज 4-5 हजार रुपए का मशरूम बेचती हूं। रोज 800 से 900 रुपए मुनाफा मिलता है। इलाके में मशरूम की डिमांड अधिक और सप्लाई कम है। आने वाले समय में मशरूम के 400 बैग लगाऊंगी। दिघवारा ब्लॉक के हजारी पंचायत के पकौलिया गांव की रीता देवी 2018 में जीविका से जुड़ी। उन्होंने बताया कि मैंने 2020 से नर्सरी का काम शुरू किया था। पहले साल वन विभाग से 10 हजार पौधे लगाए। फिर 20 हजार नर्सरी लगाएं। 2 और 4 आदमी इस काम में लगाए हुए हैं। साल में एक से डेढ़ लाख रुपए की बचत हो जाती है। रामपुर आमी पंचायत की सीमा देवी बताती हैं कि पहले मैं 5 रुपए के लिए भी तरसती थी। दूसरे के खेतों में काम करके खाना खाती थी। परिवार चलाती थी। वे बताती हैं – रहने के लिए घर तो छोड़िए, जमीन तक नहीं थी। पति दूसरे की गाड़ी चलाते हैं। 2020 में जीविका के साथ जुड़ी तो लोन लेकर एक गाय खरीदी। 6 साल बाद उसी गाय से दूसरी गाय खरीदी। आज दोनों गायों से 10-15 लीटर दूध होता है। बड़े आराम से घर चल रहा है। दूध बेचकर तीन बेटियों और 1 बेटा की पढ़ाई करा रही हूं। दैनिक भास्कर ने दिघवारा ब्लॉक की कुछ जीविका दीदियों से बात की..जिनका इस ग्रुप से जुड़कर जिंदगी बदल गई है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट….
दिघवारा की जीविका दीदियों की कहानी जानने से पहले इन महिलाओं की आत्मनिर्भरता की कुछ तस्वीरें नीचें देखें;-

बिहार के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं बनी आत्मनिर्भर आज हम बात कुछ ऐसी महिलाओं की करेंगे, जिन्होंने जीविका समूह से जुड़कर न केवल अपनी तकदीर बदली, बल्कि परिवार और समाज की तस्वीर बदल रही हैं। बिहार में करीब डेढ़ करोड़ महिलाएं जीविका समूह से जुड़ी हैं। राजधानी पटना से करीब 70 किलोमीटर दूर सारण जिले के दिघवारा ब्लॉक की कुछ महिलाएं जीविका से जुड़ कर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। दिघवारा प्रखंड के हजारी पंचायत की कुछ महिलाओं की कहानी आम महिलाओं के लिए प्रेरणा है। रीता देवी, सीमा देवी, पुनीता देवी और सीमा देवी जीविका समूह से जुड़ने से पहले अपने घर की चूल्हा-चौका का काम करती थीं, लेकिन जब ये लोग इस समूह के साथ जुड़ी तो मानो इनके जीवन में उम्मीद की नई रोशनी जाग उठी। दिघवारा प्रखंड की ये दीदियां जीविका के फॉर्मर, नॉन फॉर्मर और लाइवलीहुड से जुड़कर आज एक नई इबारत लिख रही हैं। यहां के समूह के ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर अमरनाथ राम और एरिया कोऑर्डिनेटर प्रतिभा कुमारी का समय-समय पर सहयोग मिलता रहता है।
मेरी सास ने जीवन बदल दिया: पुनीत देवी हराजी पंचायत के पुरुषोत्तमपुर गांव की पुनीत देवी राजीव चौक पर समोसा और लिट्टी की दुकान चलाती हैं। हमने उनसे बात की। सवाल- जीविका में जुड़ने से पहले और बाद में जीवन में क्या बदलाव आया? पुनीत देवी- पूरा जीवन बदल गया। आज पूरा परिवार एक साथ रहकर पैसा कमा रहे हैं। पहले दिल्ली में रहती थी। सास-ससुर के कहने पर बिहार लौटी। अक्सर सास और बहू के बीच झगड़े की खबरें सुनती, लेकिन मेरी सास ने जीवन बदल दिया। अब अपने घर पर रहकर अच्छी कमाई कर रही हूं। सवाल- जीविका के जरिए कितना लाभ मिला, आगे क्या सोचा है? पुनीत देवी- दिल्ली से आने के बाद 2016 में जीविका समूह से जुड़ी। जीविका समूह से 30 हजार रुपए लिया और एक ठेला लेकर उसी पर काम शुरू किया। दूसरी बार 50 हजार रुपए लोन लिया और चौक पर दुकान लेकर समोसा-लिट्टी बेचने लगी। इस बार 50 हजार रुपए ली हूं। दुकान में फास्ट फूड और ठंडा रखूंगी, जिससे कमाई और बढ़ेगी। मशरूम बेचकर आत्मनिर्भर सीमा हूं, अब खर्च करने के लिए पति पर निर्भर नहीं हराजी पंचायत की सीमा देवी मशरूम की खेती करती हैं। हमने उनसे बात की। सवाल- मशरूम की खेती का आइडिया कैसे आया जीविका समूह से कैसे मदद मिली?
सीमा देवी- मैंने जीविका से पैसे लेकर मशरूम की खेती शुरू की। आज अच्छा मुनाफा कमा रही हूं। खर्च करने के लिए पति या बच्चों से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती है। खुद ही फैसला लेती हूं और जरूरत के हिसाब खर्च करती हूं। सवाल- मशरूम की खेती से क्या बदला है? आपको इससे क्या लाभ मिला है?
सीमा देवी- मशरूम की खेती दो साल से कर रही है। रोज 4000 से 5000 का मशरूम बेचती हूं। 800 से 900 रुपए फायदा होता है। मेरे पास इसकी इतनी डिमांड है कि पूरा नहीं कर पाती हूं। इस साल से अधिक मशरूम तैयार करने का प्लान बनाया है।
नर्सरी से आज अच्छी कमाई कर रही हूं: रीता देवी हराजी पंचायत की रीता देवी ने जीविका की मदद से नर्सरी का काम शुरू किया था। आज अच्छी कमाई कर रही हैं।

सवाल- जीविका से कब जुड़ी और नर्सरी का काम कैसे शुरू किया?
रीता देवी- मुझे 2018 में जीविका समूह के बारे में पता लगा। उसी समय से जुड़ी हूं। 2020 में नर्सरी लगाने का आइडिया आया। मैंने परिवार में इस पर विचार किया। परिवार से मुझे समर्थन मिला। पहले 10 हजार पौधा लगाया। स्वरोजगार का काम अच्छा लगा। मुझे यह काम पहले से पसंद था, तो जीविका से पैसे लेकर काम शुरू किया। सवाल- अभी नर्सरी का काम कैसा चल रहा है? कितनी की बचत होती है?
रीता देवी- नर्सरी का काम बढ़िया चल रहा है। मैंने 5-10 लोगों को रोजगार दिया। साल में 1- 1.50 लाख रुपए बच जाते हैं। जीविका से जुड़ने से मुझे बहुत फायदा हुआ है। आज मैं अपने पैरों पर खड़ी हूं।
गाय पालकर बच्चों को पढ़ा रही हूं, पति के लिए गाड़ी खरीदनी है: सीमा देवी रामपुर आमी पंचायत की सीमा देवी गायों का दूध बेचकर बच्चों की पढ़ाई करा रही हैं। कहती हैं कि जल्द गाड़ी खरीदकर पति को चलाने के लिए दूंगी। सवाल- जीविका से जुड़ने से पहले और बाद में आपके जीवन में क्या बदला है? सीमा देवी- पहले 5-5 रुपए के लिए तरसती थी। जीविका से जुड़ने के बाद आज मुझे किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता है। रहने के लिए घर और जमीन नहीं थी। सवाल- जीविका के जरिए आपने कैसे स्वरोजगार किया और आगे क्या सपना है?
सीमा देवी- मैंने जीविका से पैसा लेकर पहले 1 गाय खरीदी। उसी गाय के दूध बेचकर मिले पैसे से दूसरी गाय खरीदी। दोनों गायों से मिलने वाले दूध को बेचकर आज तीन बेटी और 1 बेटे को पढ़ा रही हूं। मेरा एक सपना है कि अपने पति को गाड़ी खरीद कर दूं ताकि वो दूसरे की नहीं, अपनी गाड़ी चलाएं। मैं हराजी पंचायत के पुरुषोत्तमपुर गांव की पुनीत देवी हूं। पहले मैं पति और बच्चे के साथ दिल्ली में रहती थे। सास-ससूर बोलते थे कि यही आ जाओ, जीविका के माध्यम से काम करो। इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मन में डर था कि घर लौट जाऊंगी तो कुछ नहीं होगा, लेकिन सास-ससुर के बहुत कहने पर मैंने फैसला किया कि अब बिहार में रहकर ही कुछ काम करूंगी। 2016 में घर आई। इसी दौरान जीविका से जुड़ी और 30 हजार रुपए लोन लेकर ठेला खरीदा,फिर 50 हजार रुपए लोन लेकर समोसा लिट्टी की दुकान खोली। इसके बाद फिर 50 हजार रुपए लोन लेकर फ्रीज खरीदी। उसमें कोल्ड ड्रिंक्स, लस्सी और खाने के सामान रखती हूं। राजीव चौक पर दुकान अच्छी चल रही है। हराजी पंचायत की सीमा देवी बताती हैं कि मैं पहले घर से बाहर नहीं निकलती थी, लेकिन आत्मनिर्भर बनने की इच्छा थी। जीविका के बारे में जानकारी मिली। 2012 में जय बजरंग बली जीविका समूह से जुड़ी। जीविका समूह से पैसा लेकर दो कमरे में मशरूम का बैग तैयार करने लगी। आज हर रोज 4-5 हजार रुपए का मशरूम बेचती हूं। रोज 800 से 900 रुपए मुनाफा मिलता है। इलाके में मशरूम की डिमांड अधिक और सप्लाई कम है। आने वाले समय में मशरूम के 400 बैग लगाऊंगी। दिघवारा ब्लॉक के हजारी पंचायत के पकौलिया गांव की रीता देवी 2018 में जीविका से जुड़ी। उन्होंने बताया कि मैंने 2020 से नर्सरी का काम शुरू किया था। पहले साल वन विभाग से 10 हजार पौधे लगाए। फिर 20 हजार नर्सरी लगाएं। 2 और 4 आदमी इस काम में लगाए हुए हैं। साल में एक से डेढ़ लाख रुपए की बचत हो जाती है। रामपुर आमी पंचायत की सीमा देवी बताती हैं कि पहले मैं 5 रुपए के लिए भी तरसती थी। दूसरे के खेतों में काम करके खाना खाती थी। परिवार चलाती थी। वे बताती हैं – रहने के लिए घर तो छोड़िए, जमीन तक नहीं थी। पति दूसरे की गाड़ी चलाते हैं। 2020 में जीविका के साथ जुड़ी तो लोन लेकर एक गाय खरीदी। 6 साल बाद उसी गाय से दूसरी गाय खरीदी। आज दोनों गायों से 10-15 लीटर दूध होता है। बड़े आराम से घर चल रहा है। दूध बेचकर तीन बेटियों और 1 बेटा की पढ़ाई करा रही हूं। दैनिक भास्कर ने दिघवारा ब्लॉक की कुछ जीविका दीदियों से बात की..जिनका इस ग्रुप से जुड़कर जिंदगी बदल गई है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट….
दिघवारा की जीविका दीदियों की कहानी जानने से पहले इन महिलाओं की आत्मनिर्भरता की कुछ तस्वीरें नीचें देखें;-

बिहार के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं बनी आत्मनिर्भर आज हम बात कुछ ऐसी महिलाओं की करेंगे, जिन्होंने जीविका समूह से जुड़कर न केवल अपनी तकदीर बदली, बल्कि परिवार और समाज की तस्वीर बदल रही हैं। बिहार में करीब डेढ़ करोड़ महिलाएं जीविका समूह से जुड़ी हैं। राजधानी पटना से करीब 70 किलोमीटर दूर सारण जिले के दिघवारा ब्लॉक की कुछ महिलाएं जीविका से जुड़ कर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। दिघवारा प्रखंड के हजारी पंचायत की कुछ महिलाओं की कहानी आम महिलाओं के लिए प्रेरणा है। रीता देवी, सीमा देवी, पुनीता देवी और सीमा देवी जीविका समूह से जुड़ने से पहले अपने घर की चूल्हा-चौका का काम करती थीं, लेकिन जब ये लोग इस समूह के साथ जुड़ी तो मानो इनके जीवन में उम्मीद की नई रोशनी जाग उठी। दिघवारा प्रखंड की ये दीदियां जीविका के फॉर्मर, नॉन फॉर्मर और लाइवलीहुड से जुड़कर आज एक नई इबारत लिख रही हैं। यहां के समूह के ब्लॉक प्रोजेक्ट मैनेजर अमरनाथ राम और एरिया कोऑर्डिनेटर प्रतिभा कुमारी का समय-समय पर सहयोग मिलता रहता है।
मेरी सास ने जीवन बदल दिया: पुनीत देवी हराजी पंचायत के पुरुषोत्तमपुर गांव की पुनीत देवी राजीव चौक पर समोसा और लिट्टी की दुकान चलाती हैं। हमने उनसे बात की। सवाल- जीविका में जुड़ने से पहले और बाद में जीवन में क्या बदलाव आया? पुनीत देवी- पूरा जीवन बदल गया। आज पूरा परिवार एक साथ रहकर पैसा कमा रहे हैं। पहले दिल्ली में रहती थी। सास-ससुर के कहने पर बिहार लौटी। अक्सर सास और बहू के बीच झगड़े की खबरें सुनती, लेकिन मेरी सास ने जीवन बदल दिया। अब अपने घर पर रहकर अच्छी कमाई कर रही हूं। सवाल- जीविका के जरिए कितना लाभ मिला, आगे क्या सोचा है? पुनीत देवी- दिल्ली से आने के बाद 2016 में जीविका समूह से जुड़ी। जीविका समूह से 30 हजार रुपए लिया और एक ठेला लेकर उसी पर काम शुरू किया। दूसरी बार 50 हजार रुपए लोन लिया और चौक पर दुकान लेकर समोसा-लिट्टी बेचने लगी। इस बार 50 हजार रुपए ली हूं। दुकान में फास्ट फूड और ठंडा रखूंगी, जिससे कमाई और बढ़ेगी। मशरूम बेचकर आत्मनिर्भर सीमा हूं, अब खर्च करने के लिए पति पर निर्भर नहीं हराजी पंचायत की सीमा देवी मशरूम की खेती करती हैं। हमने उनसे बात की। सवाल- मशरूम की खेती का आइडिया कैसे आया जीविका समूह से कैसे मदद मिली?
सीमा देवी- मैंने जीविका से पैसे लेकर मशरूम की खेती शुरू की। आज अच्छा मुनाफा कमा रही हूं। खर्च करने के लिए पति या बच्चों से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती है। खुद ही फैसला लेती हूं और जरूरत के हिसाब खर्च करती हूं। सवाल- मशरूम की खेती से क्या बदला है? आपको इससे क्या लाभ मिला है?
सीमा देवी- मशरूम की खेती दो साल से कर रही है। रोज 4000 से 5000 का मशरूम बेचती हूं। 800 से 900 रुपए फायदा होता है। मेरे पास इसकी इतनी डिमांड है कि पूरा नहीं कर पाती हूं। इस साल से अधिक मशरूम तैयार करने का प्लान बनाया है।
नर्सरी से आज अच्छी कमाई कर रही हूं: रीता देवी हराजी पंचायत की रीता देवी ने जीविका की मदद से नर्सरी का काम शुरू किया था। आज अच्छी कमाई कर रही हैं।

सवाल- जीविका से कब जुड़ी और नर्सरी का काम कैसे शुरू किया?
रीता देवी- मुझे 2018 में जीविका समूह के बारे में पता लगा। उसी समय से जुड़ी हूं। 2020 में नर्सरी लगाने का आइडिया आया। मैंने परिवार में इस पर विचार किया। परिवार से मुझे समर्थन मिला। पहले 10 हजार पौधा लगाया। स्वरोजगार का काम अच्छा लगा। मुझे यह काम पहले से पसंद था, तो जीविका से पैसे लेकर काम शुरू किया। सवाल- अभी नर्सरी का काम कैसा चल रहा है? कितनी की बचत होती है?
रीता देवी- नर्सरी का काम बढ़िया चल रहा है। मैंने 5-10 लोगों को रोजगार दिया। साल में 1- 1.50 लाख रुपए बच जाते हैं। जीविका से जुड़ने से मुझे बहुत फायदा हुआ है। आज मैं अपने पैरों पर खड़ी हूं।
गाय पालकर बच्चों को पढ़ा रही हूं, पति के लिए गाड़ी खरीदनी है: सीमा देवी रामपुर आमी पंचायत की सीमा देवी गायों का दूध बेचकर बच्चों की पढ़ाई करा रही हैं। कहती हैं कि जल्द गाड़ी खरीदकर पति को चलाने के लिए दूंगी। सवाल- जीविका से जुड़ने से पहले और बाद में आपके जीवन में क्या बदला है? सीमा देवी- पहले 5-5 रुपए के लिए तरसती थी। जीविका से जुड़ने के बाद आज मुझे किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता है। रहने के लिए घर और जमीन नहीं थी। सवाल- जीविका के जरिए आपने कैसे स्वरोजगार किया और आगे क्या सपना है?
सीमा देवी- मैंने जीविका से पैसा लेकर पहले 1 गाय खरीदी। उसी गाय के दूध बेचकर मिले पैसे से दूसरी गाय खरीदी। दोनों गायों से मिलने वाले दूध को बेचकर आज तीन बेटी और 1 बेटे को पढ़ा रही हूं। मेरा एक सपना है कि अपने पति को गाड़ी खरीद कर दूं ताकि वो दूसरे की नहीं, अपनी गाड़ी चलाएं।  

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