झज्जर में गुलिया खाप की बैठक में इस बार किसानों की जमीन का मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा। बैठक में पहुंचे कई किसानों ने रिलायंस एमईटी सिटी परियोजना से जुड़े भूमि विवादों को उठाते हुए कंपनी पर जमीन कब्जाने और किसानों को न्याय नहीं मिलने के आरोप लगाए। वहीं कंपनी की ओर से इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया गया। बैठक के दौरान गांव निमाना निवासी किसान नवीन कुमार ने अपनी समस्या रखते हुए कहा कि उसकी करीब डेढ़ किल्ला जमीन पर पिछले आठ वर्षों से रिलायंस का कब्जा है। उन्होंने कहा कि न तो उन्हें जमीन के बदले जमीन दी गई और न ही कोई मुआवजा मिला। नवीन कुमार ने खाप की बैठक में कहा, मैं वर्षों से अधिकारियों के चक्कर काट रहा हूं। आज मेरे साथ हो रहा है, कल किसी और किसान के साथ होगा। मेरे जैसे कई किसान हैं जिनकी जमीन औने-पौने दामों में खरीदी गई या जिनकी समस्याओं का आज तक समाधान नहीं हुआ। किसान की बात सुनने के बाद बैठक में मौजूद अन्य लोगों ने भी जमीन से जुड़े अपने मुद्दे उठाए। कई किसानों ने भूमि विवाद और मुआवजे से संबंधित शिकायतों का जिक्र किया। इसके बाद यह मुद्दा बैठक का प्रमुख विषय बन गया। गुलिया खाप के पदाधिकारियों ने किसानों की समस्याएं सुनने के बाद आश्वासन दिया कि मामले को संबंधित अधिकारियों और प्रशासन के समक्ष उठाकर समाधान का प्रयास किया जाएगा। करीब 8 हजार एकड़ जमीन पर विकसित हुई परियोजना जानकारी के अनुसार झज्जर जिले में रिलायंस ने एमईटी सिटी परियोजना के लिए करीब 8 हजार एकड़ भूमि खरीदी थी। यह भूमि तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान, जब भूपेंद्र सिंह हुड्डा मुख्यमंत्री थे, विभिन्न किसानों से खरीदी गई थी। आज इस क्षेत्र में बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान, वेयरहाउस और अनेक कंपनियां स्थापित हो चुकी हैं। गुरुग्राम रोड, दादरी तोय, याकूबपुर और बादली रोड तक का क्षेत्र तेजी से औद्योगिक विकास का केंद्र बन चुका है। रिलायंस की परियोजना के आसपास बड़े स्तर पर प्लॉटिंग और रियल एस्टेट गतिविधियां भी बढ़ी हैं, जिससे पूरे इलाके का स्वरूप बदल गया है। हालांकि विकास की इस तस्वीर के बीच कई किसान आज भी अपनी जमीन से जुड़े मामलों को लेकर परेशान हैं और समाधान के लिए अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। कंपनी का पक्ष: किसी किसान की जमीन पर कब्जा नहीं वहीं रिलायंस एमईटी सिटी के डीजीएम लोकेश कापसे ने किसानों द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि परियोजना के लिए किसी भी किसान की जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया था। कंपनी ने केवल उन्हीं किसानों से जमीन खरीदी थी जिन्होंने अपनी सहमति से भूमि बेचने का निर्णय लिया था। उन्होंने बताया कि वर्ष 2006 के आसपास क्षेत्र में जमीन का बाजार भाव करीब 2 से 3 लाख रुपए प्रति एकड़ था, जबकि कंपनी ने किसानों को लगभग 22 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से भुगतान किया था। इसके अलावा भूमि बेचने वाले किसानों को 33 वर्षों तक वार्षिकी (एन्युटी) देने की व्यवस्था भी की गई थी। कापसे के अनुसार एमईटी सिटी परियोजना के कारण क्षेत्र में 40 हजार से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर मिले हैं। कंपनी शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और अन्य सामाजिक विकास कार्यों के माध्यम से भी आसपास के गांवों में योगदान दे रही है। उन्होंने कहा कि यदि किसी किसान या स्थानीय नागरिक को भूमि संबंधी कोई शिकायत या शंका है तो वह कंपनी कार्यालय में संपर्क कर सकता है। कंपनी संवाद और समाधान की प्रक्रिया में विश्वास रखती है।


