₹2 करोड़ के बजट में ‘द इंडियन लेनिन बाबू जगदेव’:गयाजी में डायरेक्टर बोले- सेंसर के 16 कट्स भी नहीं रोक पाई पब्लिसिटी

₹2 करोड़ के बजट में ‘द इंडियन लेनिन बाबू जगदेव’:गयाजी में डायरेक्टर बोले- सेंसर के 16 कट्स भी नहीं रोक पाई पब्लिसिटी

गया. शोषितों और वंचितों की आवाज को बुलंद करने वाले अमर शहीद बाबू जगदेव प्रसाद के विचारों पर बनी फिल्म ‘द इंडियन लेनिन बाबू जगदेव’ ने देश के सिनेमाघरों में दस्तक देते ही तहलका मचा दिया है। गया के ‘अयूज़ एरीना सिनेमाज़’ से लेकर पटना के ऐतिहासिक ‘वीना सिनेमा हॉल’ तक, फिल्म को देखने के लिए दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा है। आलम यह है कि शो लगातार हाउसफुल चल रहे हैं और टिकट न मिलने पर लोग दूसरे सिनेमाघरों का रुख करने को मजबूर हैं। 29 मई को पूरे भारत में रिलीज हुई इस फिल्म को सोशल मीडिया पर भी दर्शकों का अभूतपूर्व समर्थन और प्यार मिल रहा है। यह बातें फ़िल्म के डायरेक्टर प्रेम कुमार विद्यार्थी ने मीडिया के सामने कहीं। ​₹2 करोड़ का बजट, ₹200 करोड़ की फिल्मों को मात ​ फिल्म की इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए फिल्म की टीम ने अपने संघर्षों को साझा किया। विद्यार्थी ने बताया कि यह फिल्म महज 2 करोड़ के सीमित बजट में बनाई गई है। लेकिन अपनी बेजोड़ कहानी, गहन शोध अनुसंधान और जमीनी हकीकत के दम पर यह बॉलीवुड की ₹200 करोड़ की बड़ी-बड़ी फिल्मों को कड़ी टक्कर दे रही है। विद्यार्थी का कहना है कि यह निवेश किसी व्यावसायिक लाभ या आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव और वैचारिक चेतना जगाने के उद्देश्य से किया गया है। ​4 साल का लंबा इंतजार, तानें और सेंसर बोर्ड का कड़ा पहरा विद्यार्थी ने बताया कि ​इस फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने का सफर कांटों भरा रहा है। फिल्म निर्माण की राह में आई चुनौतियों का जिक्र करते हुए डायरेक्टर प्रेम कुमार विद्यार्थी ने बताया कि फिल्म को पूरे 4 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। यह फिल्म लंबे समय तक रिसर्च और सेंसर बोर्ड की पेचीदा प्रक्रियाओं में फंसी रही। ​इस देरी की वजह से टीम को भारी मानसिक और आर्थिक तनाव का सामना करना पड़ा। समाज के कुछ हिस्सों की ओर से झूठे प्रोपगैंडा फैलाए गए और निर्माताओं पर पैसे खाकर भागने जैसे बेबुनियाद आरोप भी लगे। लेकिन सच्चाई यह है कि फिल्म के सभी मुख्य निर्माताओं (जैसे आर्किटेक्ट सिद्धार्थ जी, सुभाष दांगी और मनोरंजन) ने एकजुट होकर टीम का साथ दिया। ​सेंसर बोर्ड की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। फिल्म को पहले ‘UA 16+’ सर्टिफिकेट दिया गया था, जिसे बाद में रिव्यू कमेटी ने रद्द कर दिया। इसके बाद फिल्म में 16 प्रमुख दृश्यों पर कट्स लगाए गए। इनमें एक ऐसा झकझोर देने वाला दृश्य भी शामिल था, जहां एक दलित बच्चे की परछाई पंडित जी पर पड़ने के कारण उसे प्रताड़ित किया जाता है। टीम ने सवाल उठाया कि देश का आम चुनाव खत्म होने के बाद ही फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट क्यों मिला? यह पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है। ​स्थानीय प्रतिभाओं को मिला एक मंच विद्यार्थी ने दावा किया कि ​इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके 80% कलाकार स्थानीय स्तर (बिहार) से लिए गए हैं, ताकि राज्य की छिपी हुई प्रतिभाओं को एक राष्ट्रीय मंच मिल सके। बाबू जगदेव प्रसाद के बचपन का मुख्य किरदार निभाने वाले बाल कलाकार सचिन तिवारी ने बताया कि उन्होंने अपने ग्रामीण और शहरी परिवेश में आज भी जाति के नाम पर होने वाले भेदभाव और शोषण को महसूस किया है, जिससे उन्हें इस भूमिका को जीवंत करने में मदद मिली। हालांकि, 4 साल की देरी के कारण बचपन का वो किरदार आज बड़ा हो चुका है। ​’90 बनाम 10′ की गूंज- वैचारिक क्रांति का प्रतीक उन्होंने बताया कि ​यह फिल्म बाबू जगदेव प्रसाद के जीवन की 95% सच्चाइयों को हूबहू पर्दे पर उतारती है। फिल्म अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, पाखंड और सामाजिक असमानता पर करारा प्रहार करती है। फिल्म में उनके ऐतिहासिक नारों को प्रमुखता से दिखाया गया है। विद्यार्थी ने दावा किया कि फिल्म देखकर निकलने वाले हर दर्शक का कहना है कि यह फिल्म हर एक मिनट बांधकर रखती है और समाज को अपनी मानसिकता बदलने पर मजबूर करती है। इस मौके पर फिल्म जगत व सामाजिक बुद्धिजीवियों ने देश के कोने-कोने में रहने वाले लोगों से इस क्रांतिकारी फिल्म को सिनेमाघरों में जाकर देखने की अपील भी विद्यार्थी ने की। गया. शोषितों और वंचितों की आवाज को बुलंद करने वाले अमर शहीद बाबू जगदेव प्रसाद के विचारों पर बनी फिल्म ‘द इंडियन लेनिन बाबू जगदेव’ ने देश के सिनेमाघरों में दस्तक देते ही तहलका मचा दिया है। गया के ‘अयूज़ एरीना सिनेमाज़’ से लेकर पटना के ऐतिहासिक ‘वीना सिनेमा हॉल’ तक, फिल्म को देखने के लिए दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा है। आलम यह है कि शो लगातार हाउसफुल चल रहे हैं और टिकट न मिलने पर लोग दूसरे सिनेमाघरों का रुख करने को मजबूर हैं। 29 मई को पूरे भारत में रिलीज हुई इस फिल्म को सोशल मीडिया पर भी दर्शकों का अभूतपूर्व समर्थन और प्यार मिल रहा है। यह बातें फ़िल्म के डायरेक्टर प्रेम कुमार विद्यार्थी ने मीडिया के सामने कहीं। ​₹2 करोड़ का बजट, ₹200 करोड़ की फिल्मों को मात ​ फिल्म की इस ऐतिहासिक कामयाबी के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए फिल्म की टीम ने अपने संघर्षों को साझा किया। विद्यार्थी ने बताया कि यह फिल्म महज 2 करोड़ के सीमित बजट में बनाई गई है। लेकिन अपनी बेजोड़ कहानी, गहन शोध अनुसंधान और जमीनी हकीकत के दम पर यह बॉलीवुड की ₹200 करोड़ की बड़ी-बड़ी फिल्मों को कड़ी टक्कर दे रही है। विद्यार्थी का कहना है कि यह निवेश किसी व्यावसायिक लाभ या आर्थिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव और वैचारिक चेतना जगाने के उद्देश्य से किया गया है। ​4 साल का लंबा इंतजार, तानें और सेंसर बोर्ड का कड़ा पहरा विद्यार्थी ने बताया कि ​इस फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने का सफर कांटों भरा रहा है। फिल्म निर्माण की राह में आई चुनौतियों का जिक्र करते हुए डायरेक्टर प्रेम कुमार विद्यार्थी ने बताया कि फिल्म को पूरे 4 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। यह फिल्म लंबे समय तक रिसर्च और सेंसर बोर्ड की पेचीदा प्रक्रियाओं में फंसी रही। ​इस देरी की वजह से टीम को भारी मानसिक और आर्थिक तनाव का सामना करना पड़ा। समाज के कुछ हिस्सों की ओर से झूठे प्रोपगैंडा फैलाए गए और निर्माताओं पर पैसे खाकर भागने जैसे बेबुनियाद आरोप भी लगे। लेकिन सच्चाई यह है कि फिल्म के सभी मुख्य निर्माताओं (जैसे आर्किटेक्ट सिद्धार्थ जी, सुभाष दांगी और मनोरंजन) ने एकजुट होकर टीम का साथ दिया। ​सेंसर बोर्ड की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। फिल्म को पहले ‘UA 16+’ सर्टिफिकेट दिया गया था, जिसे बाद में रिव्यू कमेटी ने रद्द कर दिया। इसके बाद फिल्म में 16 प्रमुख दृश्यों पर कट्स लगाए गए। इनमें एक ऐसा झकझोर देने वाला दृश्य भी शामिल था, जहां एक दलित बच्चे की परछाई पंडित जी पर पड़ने के कारण उसे प्रताड़ित किया जाता है। टीम ने सवाल उठाया कि देश का आम चुनाव खत्म होने के बाद ही फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट क्यों मिला? यह पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है। ​स्थानीय प्रतिभाओं को मिला एक मंच विद्यार्थी ने दावा किया कि ​इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके 80% कलाकार स्थानीय स्तर (बिहार) से लिए गए हैं, ताकि राज्य की छिपी हुई प्रतिभाओं को एक राष्ट्रीय मंच मिल सके। बाबू जगदेव प्रसाद के बचपन का मुख्य किरदार निभाने वाले बाल कलाकार सचिन तिवारी ने बताया कि उन्होंने अपने ग्रामीण और शहरी परिवेश में आज भी जाति के नाम पर होने वाले भेदभाव और शोषण को महसूस किया है, जिससे उन्हें इस भूमिका को जीवंत करने में मदद मिली। हालांकि, 4 साल की देरी के कारण बचपन का वो किरदार आज बड़ा हो चुका है। ​’90 बनाम 10′ की गूंज- वैचारिक क्रांति का प्रतीक उन्होंने बताया कि ​यह फिल्म बाबू जगदेव प्रसाद के जीवन की 95% सच्चाइयों को हूबहू पर्दे पर उतारती है। फिल्म अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, पाखंड और सामाजिक असमानता पर करारा प्रहार करती है। फिल्म में उनके ऐतिहासिक नारों को प्रमुखता से दिखाया गया है। विद्यार्थी ने दावा किया कि फिल्म देखकर निकलने वाले हर दर्शक का कहना है कि यह फिल्म हर एक मिनट बांधकर रखती है और समाज को अपनी मानसिकता बदलने पर मजबूर करती है। इस मौके पर फिल्म जगत व सामाजिक बुद्धिजीवियों ने देश के कोने-कोने में रहने वाले लोगों से इस क्रांतिकारी फिल्म को सिनेमाघरों में जाकर देखने की अपील भी विद्यार्थी ने की।  

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