माफ करना मां… 45% अपराध में अपने ही गुनहगार

माफ करना मां… 45% अपराध में अपने ही गुनहगार

श्रीमती नीलम श्रीवास्तव के पुत्र हिमांशु ललित की रिपोर्ट पटना | मदर्स डे पर समाज भले मां को देवी माने, लेकिन हकीकत में महिलाएं घर में ही सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। एनसीआरबी 2024 की रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। बिहार में महिलाओं को सड़क से ज्यादा खतरा अपने घर में है। राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 27,359 मामले दर्ज हुए। इनमें लगभग 45 प्रतिशत अपराध घर की चारदीवारी के भीतर हुए हैं। पति और परिवार ही जान के दुश्मन बन रहे हैं। 12,438 महिलाओं ने पति और ससुराल वालों की क्रूरता की शिकायत की है। इनके अलावा 6,224 महिलाओं की दहेज के लिए हत्या कर दी गई। मासूम बच्चे अनाथ हो रहे हैं। वहीं, अदालतों में महिलाओं पर अपराध के 1,44,844 मामले पेंडिंग हैं। कोर्ट में पेंडेंसी रेट 97.9 प्रतिशत है। ये आंकड़े सुरक्षित समाज के दावों की कसौटी पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते। बच्चे अनाथ हुए क्योंकि मर गई… मां एक मां की हत्या सिर्फ एक महिला की मौत नहीं होती। वह बच्चों की दुनिया उजड़ जाने का दस्तावेज है। घर के भीतर मां को मारा जाता है, तो बच्चे अनाथ हो जाते हैं। दहेज की वेदी पर 6,224 मौतें: बिहार में 2024 में 6,224 महिलाओं की दहेज के कारण हत्या कर दी गई। इन मौतों ने हजारों बच्चों से उनकी मां की छांव छीन ली। तिहरी मार झेलते बच्चे: पिता हत्यारा बनकर जेल चला जाता है और मां श्मशान या कब्रिस्तान पहुंच जाती है। बच्चे अवसाद, अकेलेपन सहने को मजबूर होते हैं। मानसिक आघात: अपने ही घर में पिता या रिश्तेदारों को मां का खून करते देखने वाले बच्चों का मानसिक आघात (ट्रॉमा) उन्हें ताउम्र के लिए डरा देता है। डायन, दहेज, दबंगई में मरती… मां एनसीआरबी रिपोर्ट डराती हे। इसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और माओं के खिलाफ अपराध ने एक संस्थागत और खौफनाक रूप लेता जा रहा है। हर दिन 17 दहेज हत्याएं: राज्य में 6,224 दहेज हत्याएं बताती हैं कि आज भी बहुओं और माओं को एक ‘प्रॉपर्टी’ या ‘बोझ’ की तरह तौला जा रहा है। अपहरण का खौफ: घर से बाहर निकलने पर भी सुरक्षा नहीं है। बिहार में महिलाओं के अपहरण और अगवा किए जाने के चौंकाने वाले 10,142 मामले सामने आए हैं। दबंगई और हिंसा: शराबी पतियों की हिंसा, जमीन विवाद में महिलाओं पर हमले और ‘डायन’ बताकर प्रताड़ित करने जैसे मामले माओं की जिंदगी को नर्क बना रहे हैं। केस से पहले हार जाती है… मां कोई पीड़ित मां हिम्मत करके पुलिस और कोर्ट की चौखट तक पहुंच भी जाए, तो वहां तारीखों और सुस्त सिस्टम के चक्रव्यूह में उलझा जाती है। अदालतों में दफन हैं 1.44 लाख चीखें: बिहार की अदालतों में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध के 1,44,844 मामले पेंडिंग पड़े हुए हैं। इंसाफ का इंतजार (97.9% पेंडेंसी): कोर्ट में पेंडेंसी रेट 97.9% है, जो बताता है कि न्याय की रफ्तार कितनी धीमी है। फैसले आते-आते पीड़िता की उम्र बीत जाती है। थानों में भी लटकी फाइलें: 2024 के अंत तक बिहार के थानों में महिलाओं से जुड़े 24,782 मामले पुलिस जांच के लिए अटके हुए थे। मदर्स डे पर विशेष }एनसीआरबी रिपोर्ट…महिलाओं से जुड़े अपराध में ज्यादातर आरोपी पति और परिवार के लोग ही श्रीमती नीलम श्रीवास्तव के पुत्र हिमांशु ललित की रिपोर्ट पटना | मदर्स डे पर समाज भले मां को देवी माने, लेकिन हकीकत में महिलाएं घर में ही सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। एनसीआरबी 2024 की रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। बिहार में महिलाओं को सड़क से ज्यादा खतरा अपने घर में है। राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 27,359 मामले दर्ज हुए। इनमें लगभग 45 प्रतिशत अपराध घर की चारदीवारी के भीतर हुए हैं। पति और परिवार ही जान के दुश्मन बन रहे हैं। 12,438 महिलाओं ने पति और ससुराल वालों की क्रूरता की शिकायत की है। इनके अलावा 6,224 महिलाओं की दहेज के लिए हत्या कर दी गई। मासूम बच्चे अनाथ हो रहे हैं। वहीं, अदालतों में महिलाओं पर अपराध के 1,44,844 मामले पेंडिंग हैं। कोर्ट में पेंडेंसी रेट 97.9 प्रतिशत है। ये आंकड़े सुरक्षित समाज के दावों की कसौटी पर पूरी तरह खरे नहीं उतरते। बच्चे अनाथ हुए क्योंकि मर गई… मां एक मां की हत्या सिर्फ एक महिला की मौत नहीं होती। वह बच्चों की दुनिया उजड़ जाने का दस्तावेज है। घर के भीतर मां को मारा जाता है, तो बच्चे अनाथ हो जाते हैं। दहेज की वेदी पर 6,224 मौतें: बिहार में 2024 में 6,224 महिलाओं की दहेज के कारण हत्या कर दी गई। इन मौतों ने हजारों बच्चों से उनकी मां की छांव छीन ली। तिहरी मार झेलते बच्चे: पिता हत्यारा बनकर जेल चला जाता है और मां श्मशान या कब्रिस्तान पहुंच जाती है। बच्चे अवसाद, अकेलेपन सहने को मजबूर होते हैं। मानसिक आघात: अपने ही घर में पिता या रिश्तेदारों को मां का खून करते देखने वाले बच्चों का मानसिक आघात (ट्रॉमा) उन्हें ताउम्र के लिए डरा देता है। डायन, दहेज, दबंगई में मरती… मां एनसीआरबी रिपोर्ट डराती हे। इसके अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और माओं के खिलाफ अपराध ने एक संस्थागत और खौफनाक रूप लेता जा रहा है। हर दिन 17 दहेज हत्याएं: राज्य में 6,224 दहेज हत्याएं बताती हैं कि आज भी बहुओं और माओं को एक ‘प्रॉपर्टी’ या ‘बोझ’ की तरह तौला जा रहा है। अपहरण का खौफ: घर से बाहर निकलने पर भी सुरक्षा नहीं है। बिहार में महिलाओं के अपहरण और अगवा किए जाने के चौंकाने वाले 10,142 मामले सामने आए हैं। दबंगई और हिंसा: शराबी पतियों की हिंसा, जमीन विवाद में महिलाओं पर हमले और ‘डायन’ बताकर प्रताड़ित करने जैसे मामले माओं की जिंदगी को नर्क बना रहे हैं। केस से पहले हार जाती है… मां कोई पीड़ित मां हिम्मत करके पुलिस और कोर्ट की चौखट तक पहुंच भी जाए, तो वहां तारीखों और सुस्त सिस्टम के चक्रव्यूह में उलझा जाती है। अदालतों में दफन हैं 1.44 लाख चीखें: बिहार की अदालतों में महिलाओं के खिलाफ हुए अपराध के 1,44,844 मामले पेंडिंग पड़े हुए हैं। इंसाफ का इंतजार (97.9% पेंडेंसी): कोर्ट में पेंडेंसी रेट 97.9% है, जो बताता है कि न्याय की रफ्तार कितनी धीमी है। फैसले आते-आते पीड़िता की उम्र बीत जाती है। थानों में भी लटकी फाइलें: 2024 के अंत तक बिहार के थानों में महिलाओं से जुड़े 24,782 मामले पुलिस जांच के लिए अटके हुए थे। मदर्स डे पर विशेष }एनसीआरबी रिपोर्ट…महिलाओं से जुड़े अपराध में ज्यादातर आरोपी पति और परिवार के लोग ही  

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