किडनी देकर बेटी को दी जिंदगी, रूबी के इलाज के लिए मां सोनादेवी ने घर व गाड़ी तक बेच दी

किडनी देकर बेटी को दी जिंदगी, रूबी के इलाज के लिए मां सोनादेवी ने घर व गाड़ी तक बेच दी

श्रीमती बृजलता श्रीवास्तव की पुत्री अंजली श्रीवास्तव की रिपोर्ट मां केवल जन्म ही नहीं देती, वह हर उस पल फिर से जिंदगी देती है, जब-जब उसका बच्चा टूटने लगता है। यह पंक्तियां शहर की रूबी यादव और उनकी मां सोनादेवी की कहानी पर बिल्कुल सटीक बैठती है। सोनादेवी ने अपनी बेटी को जन्म ही नहीं दिया, बल्कि अपनी किडनी देकर उसे नया जीवन भी दिया। सालों तक बीमारी, आर्थिक संकट और पारिवारिक दु:खों से जूझने के बाद भी इस मां सोनादेवी ने हार नहीं मानी।
साल 2019 में रूबी यादव की जिंदगी अचानक बदल गई। पिता की मौत के सदमे के समय गर्भवती थीं। तबीयत बिगड़ने पर जांच में पता चला कि उनकी दोनों किडनी खराब हो चुकी है। डॉक्टरों ने कहा था गर्भ में पल रहे शिशु को बचाना भी संभव नहीं हो सकेगा। ​बच्चे को खोने के बाद रूबी की जिंदगी डायलिसिस, इलाज और दर्द के बीच सिमट गई। कोरोना काल में स्थिति और गंभीर हो गई। रूबी के फेफड़ों में 75 प्रतिशत संक्रमण फैल गया और डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी, लेकिन उस कठिन दौर में मां सोनादेवी दिन-रात बेटी की सेवा में लगी रही। खुद कोविड संक्रमित होने के बावजूद उन्होंने बेटी का साथ नहीं छोड़ा। साल 2023 में डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट की सलाह दी। जब कोई मदद के लिए आगे नहीं आया, तब सोनादेवी ने खुद अपनी किडनी देने का फैसला किया। जांच में उनके सीने में गांठ मिलने के बाद डॉक्टरों ने जोखिम बताया, लेकिन मां का हौसला नहीं टूटा। इंदौर में उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पर बेटी को किडनी दी। ऑपरेशन थिएटर में उन्होंने डॉक्टरों से यहां तक कह दिया, “जरूरत पड़े तो मेरी दोनों किडनी निकाल लेना, बस मेरी बेटी को बचा लीजिए।” बेटे को भी बीमारी, उसका भी हौसला बनी इस संघर्ष में परिवार आर्थिक रूप से भी पूरी तरह टूट गया। किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लाखों रुपए की जरूरत थी। सोनादेवी ने मदद के लिए नेताओं और संस्थाओं के चक्कर लगाए। इनके साथ रूबी के पति धीरजसिंह भी हमेशा साथ रहे। वे एमआर हैं। कुछ सहायता जरूर मिली, लेकिन इलाज के लिए रुपए पूरे नहीं हो पाए। इसके लिए उन्होंने पहले कार बेची, फिर ब्याज पर रुपए लिए और फिर भी इंतजाम नहीं हो पाया तो घर तक बेचना पड़ा। इस संघर्ष के बीच बेटे शशिकांत की पेनक्रियाज डेमेज होने से मुश्किलें और बढ़ गई। शशिकांत के ऑपरेशन में अपनी पूरी राशि लगा दी और मां ने हार नहीं मानी। आज किराए के घर में रहने वाली सोनादेवी कहती हैं, “मेरे पास पैसा नहीं बचा, लेकिन मेरे दोनों बच्चे स्वस्थ हैं, यही मेरी सबसे बड़ी दौलत है।” रूबी सालों तक बीमारी से जूझने के बाद अब वे खुद का पार्लर संचालित कर रही हैं और भाई शशिकांत प्राइवेट नौकरी कर रहे हैं।

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