मध्य प्रदेश सरकार यूसीसी लागू करने की तैयारी में है। प्रस्तावित नियम शादी, तलाक, संपत्ति और लिव इन रिलेशनशिप में उत्तराखंड और गुजरात मॉडल जैसे हो सकते हैं। सरकार ने ड्राफ्ट के लिए कमेटी बनाने की मंजूरी दी है। इसकी जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना प्रकाश देसाई को दिए जाने की संभावना है। एमपी की अलग सामाजिक संरचना के कारण लागू करने में चुनौतियां आ सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रमुख चुनौतियां जनजातीय आबादी और लिव इन रिलेशनशिप रजिस्ट्रेशन हैं। 1. जनजातीय बहुल राज्य मध्य प्रदेश जनजातीय बहुल राज्य है। लगभग 21% आबादी अनुसूचित जनजातियों की है। 46 से अधिक जनजातियां अपनी परंपराओं के साथ रहती हैं। उत्तराखंड में यह आंकड़ा 2.9% और गुजरात में करीब 15% है। इन राज्यों ने संवैधानिक अधिकारों के तहत जनजातीय समुदाय को यूसीसी से बाहर रखा है। ऐसे में सवाल है कि क्या मध्य प्रदेश भी यही करेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मुद्दा जनजातीय आबादी और चुनावी प्रभाव से जुड़ा है। एक्सपर्ट की राय: एमपी में यूसीसी लागू करने में संतुलन जरूरी वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह के अनुसार, बीजेपी की विचारधारा में लंबे समय से यूसीसी शामिल रहा है। यह जनसंघ काल से प्रमुख मुद्दा रहा है। मध्य प्रदेश में हर पांचवां मतदाता जनजातीय वर्ग से है, जिनके अपने नियम और रीति-रिवाज हैं। ऐसे में संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। खासकर जब जनजातीय क्षेत्रों में पकड़ कमजोर रही है। उनका कहना है कि यूसीसी लागू करने में सरकार को सावधानी बरतनी होगी। यदि सभी समुदाय शामिल नहीं हुए तो इसकी संवैधानिक वैधता पर सवाल उठ सकते हैं। सीनियर एडवोकेट वाहिद खान के अनुसार, जनजातीय समुदाय को यूसीसी में शामिल करना चुनौतीपूर्ण होगा, इसलिए संतुलित रास्ता अपनाया जा सकता है। उनका मानना है कि सरकार बिना भावनाएं आहत किए उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश करेगी। सीनियर एडवोकेट सुधीर दुबे के अनुसार, एमपी में दो साल बाद चुनाव हैं, इसलिए जनजातियों को बाहर रखा जा सकता है। हालांकि, उनके अनुसार यह कानून बिना उन्हें शामिल किए भी प्रदेश के हित में हो सकता है। 2. लिव-इन रिलेशनशिप रजिस्ट्रेशन का मुद्दा मध्य प्रदेश में यूसीसी लागू होने पर लिव इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो सकता है। सहमति से साथ रहने वाले जोड़ों को नजदीकी रजिस्ट्रार के पास रजिस्ट्रेशन कराना होगा। क्या हो सकते हैं प्रावधान लिव इन रिलेशनशिप रजिस्ट्रेशन: प्रमुख चुनौतियां उत्तराखंड मॉडल पर सवाल: आंकड़ों के अनुसार, अनिवार्य रजिस्ट्रेशन के बावजूद एक साल में केवल 70 रजिस्ट्रेशन हुए और दो रद्द हुए। रजिस्ट्रार द्वारा स्वत: संज्ञान लेकर नोटिस भेजने का कोई सार्वजनिक उदाहरण नहीं है। सरकार की ओर से विस्तृत आधिकारिक डेटा भी उपलब्ध नहीं है। इससे क्रियान्वयन पर सवाल उठते हैं। प्राइवेसी की चिंता: इन प्रावधानों में निजी जानकारी सार्वजनिक होने का जोखिम है। 21 वर्ष से कम उम्र के जोड़ों के लिए माता-पिता की सहमति जरूरी होगी और जानकारी स्थानीय प्रशासन तक पहुंच सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस प्रावधान की वैधता को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि पारिवारिक आपत्तियों में काउंसलिंग का विकल्प अपनाया जा सकता है। कानूनी जटिलताएं: उत्तराखंड में कई लोगों ने लिव-इन रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को जटिल बताया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ दंपती ने इसे दखलंदाजी माना, जबकि वकीलों के मुताबिक कई युवाओं ने गोपनीयता को लेकर चिंता जताई है। सामाजिक स्वीकार्यता: फैमिली काउंसलर शैल अवस्थी के अनुसार, समाज में लिव-इन रिलेशनशिप को अभी व्यापक स्वीकृति नहीं मिली है। इसके कारण कई युवा इसे छिपाते हैं। पारिवारिक और सामाजिक दबाव से जोड़ों में असुरक्षा रहती है। भारतीय समाज इसे विवाह के समान मान्यता नहीं देता।


