विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पटना के वरिष्ठ कैंसर सर्जन डॉ. वी.पी. सिंह ने पर्यावरण प्रदूषण और कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच गहरे संबंध को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि बढ़ता प्रदूषण कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में लगातार वृद्धि का एक प्रमुख कारण बन रहा है। उन्होंने कहा कि आज प्रदूषित हवा, दूषित पानी, रासायनिक अपशिष्ट और जहरीले तत्वों से प्रभावित खाद्य पदार्थ केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गए हैं, बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुके हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि पर्यावरण संरक्षण के लिए समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में कैंसर मरीजों की संख्या और तेजी से बढ़ सकती है। वायु प्रदूषण बना फेफड़ों के कैंसर का बड़ा कारण हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर देखा जा रहा है। प्रदूषित हवा, दूषित जल स्रोत, रासायनिक अपशिष्ट और जहरीले तत्वों से प्रभावित खाद्य पदार्थ अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुके हैं। डॉ. वी.पी. सिंह ने विशेष रूप से वायु प्रदूषण को फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा कारण बताया। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण आज वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। स्वच्छ हवा और शुद्ध पानी ही बचाव – डॉ. सिंह डॉ. सिंह के अनुसार, पहले यह बीमारी मुख्य रूप से धूम्रपान करने वालों में पाई जाती थी, लेकिन अब ऐसे मरीज भी सामने आ रहे हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। इसका एक प्रमुख कारण प्रदूषित वातावरण को माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि महानगरों के साथ-साथ छोटे शहरों और कस्बों में भी वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है, जिससे आम लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि स्वच्छ हवा और शुद्ध पानी ही इस गंभीर स्वास्थ्य संकट से बचाव का सबसे बड़ा उपाय है। दूषित पानी भी बढ़ा रहा कैंसर का जोखिम डॉ. सिंह ने कहा कि स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता आज भी देश के कई हिस्सों में बड़ी चुनौती बनी हुई है। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, भारी धातुओं और औद्योगिक रसायनों की बढ़ती मौजूदगी लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रही है। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक दूषित पानी के सेवन से लीवर, ब्लैडर, पेट और त्वचा के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। बिहार सहित देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोतों की गुणवत्ता चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे में सुरक्षित और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। डॉ. सिंह ने कहा कि लोगों को अपने घरों और समुदायों में जल संरक्षण के साथ-साथ जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाने के लिए भी जागरूक होना चाहिए। रासायनिक खेती का असर खाद्य पदार्थों पर कृषि क्षेत्र में बढ़ते रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग पर चिंता जताते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि अधिक उत्पादन की होड़ में खेतों में विभिन्न प्रकार के रसायनों का अत्यधिक प्रयोग किया जा रहा है। इनका प्रभाव केवल मिट्टी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि फसलों और खाद्य पदार्थों के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंचता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक खेती को बढ़ावा देना और रसायनों के संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। इससे न केवल मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होगी बल्कि लोगों को सुरक्षित खाद्य पदार्थ भी उपलब्ध हो सकेंगे। पर्यावरण संरक्षण को बनाना होगा जन आंदोलन डॉ. वी.पी. सिंह ने कहा कि कैंसर केवल चिकित्सा विज्ञान से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौती भी है। यदि समाज को कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाना है तो पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर छोटे-छोटे कदम उठाकर बड़ा बदलाव ला सकता है। पेड़ लगाना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना, जल संरक्षण करना, कचरे का सही प्रबंधन करना और रसायनों के अनावश्यक उपयोग से बचना जैसे उपाय पर्यावरण को सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। स्वस्थ पर्यावरण ही सुरक्षित भविष्य की नींव विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर डॉ. सिंह ने कहा कि यह दिन केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे संकल्प दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ और सुरक्षित जीवन देने के लिए पर्यावरण संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। उन्होंने कहा कि पर्यावरण और स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो समाज भी स्वस्थ रहेगा। इसलिए सभी नागरिकों, सामाजिक संगठनों और सरकारी संस्थाओं को मिलकर स्वच्छ और हरित भारत के निर्माण की दिशा में काम करना चाहिए। डॉ. सिंह ने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति की रक्षा ही मानव जीवन की रक्षा है। स्वस्थ पर्यावरण ही स्वस्थ समाज, सुरक्षित भविष्य और कैंसर-मुक्त भारत की सबसे मजबूत नींव साबित हो सकता है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पटना के वरिष्ठ कैंसर सर्जन डॉ. वी.पी. सिंह ने पर्यावरण प्रदूषण और कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच गहरे संबंध को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि बढ़ता प्रदूषण कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में लगातार वृद्धि का एक प्रमुख कारण बन रहा है। उन्होंने कहा कि आज प्रदूषित हवा, दूषित पानी, रासायनिक अपशिष्ट और जहरीले तत्वों से प्रभावित खाद्य पदार्थ केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गए हैं, बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुके हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि पर्यावरण संरक्षण के लिए समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में कैंसर मरीजों की संख्या और तेजी से बढ़ सकती है। वायु प्रदूषण बना फेफड़ों के कैंसर का बड़ा कारण हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्यावरण पर दबाव बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर देखा जा रहा है। प्रदूषित हवा, दूषित जल स्रोत, रासायनिक अपशिष्ट और जहरीले तत्वों से प्रभावित खाद्य पदार्थ अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुके हैं। डॉ. वी.पी. सिंह ने विशेष रूप से वायु प्रदूषण को फेफड़ों के कैंसर का एक बड़ा कारण बताया। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण आज वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। स्वच्छ हवा और शुद्ध पानी ही बचाव – डॉ. सिंह डॉ. सिंह के अनुसार, पहले यह बीमारी मुख्य रूप से धूम्रपान करने वालों में पाई जाती थी, लेकिन अब ऐसे मरीज भी सामने आ रहे हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। इसका एक प्रमुख कारण प्रदूषित वातावरण को माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि महानगरों के साथ-साथ छोटे शहरों और कस्बों में भी वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है, जिससे आम लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। डॉ. सिंह ने जोर देकर कहा कि स्वच्छ हवा और शुद्ध पानी ही इस गंभीर स्वास्थ्य संकट से बचाव का सबसे बड़ा उपाय है। दूषित पानी भी बढ़ा रहा कैंसर का जोखिम डॉ. सिंह ने कहा कि स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता आज भी देश के कई हिस्सों में बड़ी चुनौती बनी हुई है। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, भारी धातुओं और औद्योगिक रसायनों की बढ़ती मौजूदगी लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रही है। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक दूषित पानी के सेवन से लीवर, ब्लैडर, पेट और त्वचा के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। बिहार सहित देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्रोतों की गुणवत्ता चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे में सुरक्षित और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। डॉ. सिंह ने कहा कि लोगों को अपने घरों और समुदायों में जल संरक्षण के साथ-साथ जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बचाने के लिए भी जागरूक होना चाहिए। रासायनिक खेती का असर खाद्य पदार्थों पर कृषि क्षेत्र में बढ़ते रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग पर चिंता जताते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि अधिक उत्पादन की होड़ में खेतों में विभिन्न प्रकार के रसायनों का अत्यधिक प्रयोग किया जा रहा है। इनका प्रभाव केवल मिट्टी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि फसलों और खाद्य पदार्थों के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंचता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक खेती को बढ़ावा देना और रसायनों के संतुलित उपयोग को सुनिश्चित करना समय की आवश्यकता है। इससे न केवल मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होगी बल्कि लोगों को सुरक्षित खाद्य पदार्थ भी उपलब्ध हो सकेंगे। पर्यावरण संरक्षण को बनाना होगा जन आंदोलन डॉ. वी.पी. सिंह ने कहा कि कैंसर केवल चिकित्सा विज्ञान से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौती भी है। यदि समाज को कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाना है तो पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देनी होगी। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर छोटे-छोटे कदम उठाकर बड़ा बदलाव ला सकता है। पेड़ लगाना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना, जल संरक्षण करना, कचरे का सही प्रबंधन करना और रसायनों के अनावश्यक उपयोग से बचना जैसे उपाय पर्यावरण को सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। स्वस्थ पर्यावरण ही सुरक्षित भविष्य की नींव विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर डॉ. सिंह ने कहा कि यह दिन केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे संकल्प दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए। आने वाली पीढ़ियों को स्वस्थ और सुरक्षित जीवन देने के लिए पर्यावरण संरक्षण को जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा। उन्होंने कहा कि पर्यावरण और स्वास्थ्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो समाज भी स्वस्थ रहेगा। इसलिए सभी नागरिकों, सामाजिक संगठनों और सरकारी संस्थाओं को मिलकर स्वच्छ और हरित भारत के निर्माण की दिशा में काम करना चाहिए। डॉ. सिंह ने कहा कि विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति की रक्षा ही मानव जीवन की रक्षा है। स्वस्थ पर्यावरण ही स्वस्थ समाज, सुरक्षित भविष्य और कैंसर-मुक्त भारत की सबसे मजबूत नींव साबित हो सकता है।


