शैलेन्द्र अग्रवाल
जयपुर. नागौर में सांझ हो रही थी। सूरज ढलने को था। उसी वक्त राजस्थान की धरती पर लोकतंत्र की एक नई सुबह हो रही थी। मैदान में जुटी भीड़ के सामने प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। तारीख थी 2 अक्टूबर 1959 महात्मा गांधी की जयंती। नेहरू ने उस दिन सिर्फ एक नई व्यवस्था का उद्घाटन नहीं किया था। वे सत्ता को दिल्ली और राज्यों की राजधानियों से निकालकर गांव की चौपाल तक ले जाने के विचार को जमीन पर उतार रहे थे। पंचायतीराज की शुरुआत के लिए नागौर को चुना गया था। अपने संबोधन की शुरुआत में ही नेहरू ने गांधी को याद किया। कहा ‘हम देश में पंचायती राज की नींव रखने जा रहे हैं। यदि महात्मा गांधी आज जीवित होते, तो वे कितने प्रसन्न होते।’
पंचायतीराज का सफरनामा
जिस पंचायतीराज की नींव नागौर में रखी जा रही थी, उसके पीछे सिर्फ प्रशासनिक विकेंद्रीकरण का विचार नहीं था। उसके साथ गांव की अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करने का सपना भी जुड़ा था।
गांव की नई व्यवस्था की 3 सीढ़ियां
पहली: पंचायत… गांव के दैनिक प्रशासन में भागीदारी और स्थानीय फैसलों की जिम्मेदारी।
दूसरी: सहकारी संघ… गांव की आर्थिक गतिविधियों को संभालने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम।
तीसरी: विद्यालय… क्योंकि शिक्षा के बिना गांव आत्मनिर्भर नहीं हो सकता। नेहरू के लिए शिक्षा का मतलब सिर्फ इतना नहीं था कि गांव का युवा जयपुर या दिल्ली जाकर नौकरी करे। शिक्षा ऐसी हो, जिससे वह अपने गांव के काम आ सके।
आइए जानें… नागौर तक कैसे पहुंचा यह सफर
नागौर का वह दिन अचानक नहीं आया था। राजस्थान में पंचायतों की कहानी आजादी से पहले की रियासतों तक जाती है। कुछ रियासतों में स्थानीय स्तर पर पंचायतें पहले से मौजूद थीं। आजादी के बाद इन्हें एक व्यवस्थित रूप देने की जरूरत महसूस हुई। राजस्थान पंचायत अधिनियम, 1953 के जरिए राज्यभर में पंचायतों की स्थापना का रास्ता तैयार हुआ। फिर देश ने पंचायतीराज की जरूरत को नए सिरे से समझना शुरू किया। जनवरी 1957 में भारत सरकार ने बलवंतराय मेहता की अध्यक्षता में अध्ययन दल बनाया। नवंबर में उसकी रिपोर्ट आई। रिपोर्ट में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने की दिशा दिखाई गई। राजस्थान ने इसे आगे बढ़ाया और राजस्थान पंचायत समिति एवं जिला परिषद अधिनियम, 1959 अस्तित्व में आया। ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद… तीन स्तरों वाली व्यवस्था का ढांचा तैयार हुआ।
लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने का नाम नहीं
आज चुनाव हमारे लोकतंत्र का सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा है, लेकिन 1959 में नेहरू जिस सवाल पर जोर दे रहे थे, वह इससे आगे का था। उनका कहना था कि देश के नागरिकों को वोट का अधिकार मिल चुका है। लेकिन क्या इतना ही लोकतंत्र के लिए पर्याप्त है?
मचा था बवाल
नागौर में नेहरू के दौरे की तैयारियां मुद्दा बन गई थीं। हेलीपैड के विस्तार व डाक बंगले के सौंदर्यकरण के खर्च पर सवाल उठे। सरकार ने हेलीपैड के लिए 85 हजार व डाक बंगले के लिए ₹76,700 के प्रावधान की बात मानी। बीकानेर के तत्कालीन विधायक मुरलीधर व्यास ने आश्चर्य जताया और कहा कि यह राशि जोधपुर व बीकानेर के विकास कार्यों में लगाई जा सकती थी। सवाल उठा कि पीएम को जोधपुर से नागौर सड़क मार्ग से क्यों नहीं लाया जा सकता? मंत्री नाथूराम मिर्धा ने बाद में माना कि बड़े विमान उतारने के लिए अतिरिक्त काम कराया जा रहा है।

