औरंगाबाद में आज यूजीसी के नए प्रावधानों के विरोध में एक महापंचायत का आयोजन किया गया। शहर के एक निजी रिसॉर्ट में आयोजित इस कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में सवर्ण समाज के लोग शामिल हुए। महापंचायत का आयोजन सवर्ण एकता मंच के बैनर तले किया गया, जिसकी अध्यक्षता रामकेवल सिंह ने की। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने यूजीसी से जुड़े नियमों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संतुलन के लिए घातक बताया। महापंचायत में शामिल भाजपा प्रदेश कार्य समिति के सदस्य प्रवीण सिंह ने अपने संबोधन में यूजीसी के प्रावधानों को “काला कानून” करार दिया। प्रवीण सिंह ने कहा कि बिना पर्याप्त प्रमाण के केवल शिकायत के आधार पर किसी छात्र को संदेह के घेरे में लाना न्यायसंगत नहीं है। उनके अनुसार, इस प्रकार के नियम संविधान की ओर से प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं और शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस नियमावली के जरिए शिक्षा के क्षेत्र में जातिगत द्वेष और राजनीति को बढ़ावा मिल रहा है। अन्य वक्ताओं ने भी इसी तरह की चिंताएं व्यक्त कीं। उनका कहना था कि शिक्षा का मूल्यांकन केवल योग्यता, परिश्रम और नैतिकता के आधार पर होना चाहिए, न कि जाति के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने यह मुद्दा उठाया कि यदि कोई शिकायत झूठी साबित होती है, तो शिकायतकर्ता के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं होना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। इससे कानून के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है। समाज में बढ़ सकता है असंतोष वक्ताओं ने आरोप लगाया कि नए नियमों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को विशेष संरक्षण दिया गया है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को बिना पर्याप्त जांच के भी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इस तरह की असंतुलित व्यवस्था से समाज में असमानता और असंतोष बढ़ सकता है। कुछ वक्ताओं ने यह भी उल्लेख किया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों ने पूर्व में ऐसे कानूनों के संभावित दुरुपयोग पर चिंता जताई है। महापंचायत में शामिल लोगों ने कहा कि यह नियमावली समानता के नाम पर समाज को बांटने का काम कर रही है और इससे सामाजिक सौहार्द पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से इस कानून में संशोधन करने या इसे वापस लेने की मांग की। कानून में संशोधन नहीं करने पर आंदोलन की चेतावनी कार्यक्रम के अंत में मंच के सदस्यों ने सवर्ण समाज के लोगों से एकजुट रहने और अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठाने की अपील की। साथ ही चेतावनी दी गई कि यदि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देती है, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। मंच के पदाधिकारियों ने बताया कि आने वाले दिनों में जिले के सभी प्रखंडों में इसी तरह की महापंचायत आयोजित की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोगों को इस मुद्दे से अवगत कराया जा सके और राज्य स्तर पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया जा सके। औरंगाबाद में आज यूजीसी के नए प्रावधानों के विरोध में एक महापंचायत का आयोजन किया गया। शहर के एक निजी रिसॉर्ट में आयोजित इस कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में सवर्ण समाज के लोग शामिल हुए। महापंचायत का आयोजन सवर्ण एकता मंच के बैनर तले किया गया, जिसकी अध्यक्षता रामकेवल सिंह ने की। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने यूजीसी से जुड़े नियमों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संतुलन के लिए घातक बताया। महापंचायत में शामिल भाजपा प्रदेश कार्य समिति के सदस्य प्रवीण सिंह ने अपने संबोधन में यूजीसी के प्रावधानों को “काला कानून” करार दिया। प्रवीण सिंह ने कहा कि बिना पर्याप्त प्रमाण के केवल शिकायत के आधार पर किसी छात्र को संदेह के घेरे में लाना न्यायसंगत नहीं है। उनके अनुसार, इस प्रकार के नियम संविधान की ओर से प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं और शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करते हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस नियमावली के जरिए शिक्षा के क्षेत्र में जातिगत द्वेष और राजनीति को बढ़ावा मिल रहा है। अन्य वक्ताओं ने भी इसी तरह की चिंताएं व्यक्त कीं। उनका कहना था कि शिक्षा का मूल्यांकन केवल योग्यता, परिश्रम और नैतिकता के आधार पर होना चाहिए, न कि जाति के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने यह मुद्दा उठाया कि यदि कोई शिकायत झूठी साबित होती है, तो शिकायतकर्ता के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान नहीं होना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। इससे कानून के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है। समाज में बढ़ सकता है असंतोष वक्ताओं ने आरोप लगाया कि नए नियमों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों को विशेष संरक्षण दिया गया है, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को बिना पर्याप्त जांच के भी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इस तरह की असंतुलित व्यवस्था से समाज में असमानता और असंतोष बढ़ सकता है। कुछ वक्ताओं ने यह भी उल्लेख किया कि विभिन्न उच्च न्यायालयों ने पूर्व में ऐसे कानूनों के संभावित दुरुपयोग पर चिंता जताई है। महापंचायत में शामिल लोगों ने कहा कि यह नियमावली समानता के नाम पर समाज को बांटने का काम कर रही है और इससे सामाजिक सौहार्द पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने सरकार से इस कानून में संशोधन करने या इसे वापस लेने की मांग की। कानून में संशोधन नहीं करने पर आंदोलन की चेतावनी कार्यक्रम के अंत में मंच के सदस्यों ने सवर्ण समाज के लोगों से एकजुट रहने और अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठाने की अपील की। साथ ही चेतावनी दी गई कि यदि सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देती है, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। मंच के पदाधिकारियों ने बताया कि आने वाले दिनों में जिले के सभी प्रखंडों में इसी तरह की महापंचायत आयोजित की जाएगी, ताकि अधिक से अधिक लोगों को इस मुद्दे से अवगत कराया जा सके और राज्य स्तर पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया जा सके।


