सिटी पैलेस, जयपुर में ब्रिगेडियर महाराजा सवाई भवानी सिंह की 15वीं पुण्यतिथि के अवसर पर उनकी स्मृति में एक गरिमामय पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रदेशभर से आए अतिथियों, सैन्य अधिकारियों और विशिष्ट व्यक्तियों ने भाग लेकर उनके जीवन, सैन्य सेवाओं और सांस्कृतिक योगदान को श्रद्धापूर्वक याद किया। कार्यक्रम की शुरुआत लेफ्टिनेंट जनरल ठाकुर दौलत सिंह शेखावत और प्रोफेसर आर.एस. खंगारोत के परिचयात्मक उद्बोधन से हुई, जिसमें उन्होंने भवानी सिंह के व्यक्तित्व और उनके बहुआयामी योगदान पर प्रकाश डाला। इसके बाद आयोजित पैनल चर्चा में उनके सैन्य करियर, व्यक्तिगत संस्मरणों और जयपुर की विरासत संरक्षण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तार से चर्चा की गई।
चर्चा के दौरान पैनलिस्ट ने कहा कि एक तरफ जहां वो एक विशाल रियासत के महाराजा थे, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने राजमहल की सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर मातृभूमि की रक्षा और सैन्य जीवन को अपना परम धर्म माना। दिसंबर 1971 के युद्ध में उन्होंने जिस असाधारण शौर्य का परिचय दिया, वह सैन्य इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उस समय लेफ्टिनेंट कर्नल के रूप में उनके नेतृत्व में 10 पैरा कमांडो ने पाकिस्तान के सिंध प्रांत में दुश्मन की सीमा के अंदर लगभग 80 किलोमीटर गहराई तक घुसकर ‘छाछरो’ पर शानदार कब्जा कर लिया था। रेगिस्तान में हुई इस सर्जिकल स्ट्राइक ने दुश्मनों की कमर तोड़ कर रख दी थी। युद्ध के मैदान में उनके इस अदम्य साहस, निडरता और उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए भारत सरकार की ओर से उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘महावीर चक्र’ (MVC) से अलंकृत किया गया। पैनल में मेजर जनरल दलवीर सिंह, कर्नल वी.एस. चंद्रावत, कर्नल हेम सिंह शेखावत और ठाकुर दुर्गा सिंह (मंडावा) जैसे प्रतिष्ठित वक्ताओं ने भाग लिया। वक्ताओं ने 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनके साहसिक नेतृत्व, 10वीं पैराशूट रेजिमेंट में उनकी भूमिका और देश सेवा के प्रति उनके समर्पण को याद किया। साथ ही जयपुर की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित और विकसित करने में उनके योगदान को भी रेखांकित किया गया। सत्र का संचालन सिटी पैलेस संग्रहालय के मानद सलाहकार डॉ. जाइल्स टिलोटसन ने किया, जिन्होंने विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा को आगे बढ़ाया। इस दौरान विरासत प्रबंधन और जनसहभागिता के क्षेत्र में भवानी सिंह के विजन की आज भी प्रासंगिकता पर जोर दिया गया। इस अवसर पर सवाई पद्मनाभ सिंह ने कहा कि उनके नाना भवानी सिंह ने हमेशा देश और जयपुर को सर्वोपरि रखा। उन्होंने कहा कि इस तरह की चर्चा के माध्यम से उनकी विरासत को समझना और आगे बढ़ाना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह भी कहा कि विरासत स्थलों को संवाद और सहभागिता के केंद्र के रूप में विकसित करना उनके नाना की सोच का हिस्सा था।


