हिंदू सनातन धर्म में मृत्यु के बाद होने वाले श्राद्धकर्म और श्रद्धांजलि सभा को एक बेहद गंभीर, शांत और शोक संतप्त माहौल का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धांजलि सभा में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर भक्ति, भजन-कीर्तन या गरुड़ पुराण के पाठ का आयोजन किया जाता है। बदलते दौर में कुछ ऐसी तस्वीरें भी सामने आ रही हैं, जो सामाजिक परंपराओं और मर्यादाओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है। ऐसा ही एक मामला मामला बेगूसराय के दियारा इलाके बलिया थाना क्षेत्र के शिवनगर गांव से सामने आया है। जहां मां के श्राद्धकर्म में बेटा ने भजन की जगह पूरी रात लौंडा डांस का आयोजन किया। पूरी रात चला नाच-गान का कार्यक्रम मैना देवी उर्फ जानकी का निधन 19 मई को हो गया था। इसके बाद 30 मई को द्वादशा एवं श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था। श्राद्धकर्म में मृतका के पुत्र महाराणा प्रताप पासवान ने पारंपरिक भजन-मंडली या साधु-संतों को बुलाने के बजाय डांसर्स को आमंत्रित किया। मंच पर बकायदा भावपूर्ण श्रद्धांजलि का एक बड़ा बैनर टंगा हुआ था, जिस पर मृतका की तस्वीर लगी थी। उसी तस्वीर और बैनर के ठीक आगे रात भर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजते रहे। लौंडा डांसर ठुमके लगाते रहे। कार्यक्रम की शुरुआत तो सामान्य हुई, लेकिन रात ढलते ही पूरा माहौल किसी शादी-ब्याह के जश्न या ऑर्केस्ट्रा प्रोग्राम में तब्दील हो गया। कार्यक्रम में बुलाए गए डांसर्स ने हिंदी और भोजपुरी के कई लोक प्रचलित और फूहड़ गानों पर जमकर डांस किया। इस दौरान कार्यक्रम में मौजूद ग्रामीणों और मेहमानों ने भी शालीनता की हदें पार कर दी। मृतका के परिजन जश्न में डूबे रहे। लोगों ने शर्मनाक बताया गमगीन माहौल के लिए रखे गए इस कार्यक्रम में लोग पूरी रात झूमते और आनंद लेते नजर आए, जिसे देख हर कोई हैरान है। अब इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो सामने आने के बाद लोग इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। इसे कलयुग की पराकाष्ठा बता रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि इस तरह का फूहड़ प्रदर्शन करना बेहद शर्मनाक है। ग्रामीणों ने भी जताई नाराजगी गांव के लोग कहते हैं कि श्राद्ध जैसे पवित्र और गंभीर कर्मकांड में इस तरह के अश्लील आयोजनों का होना समाज में नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं के लगातार हो रहे पतन को दर्शाता है। श्राद्धकर्म दिवंगत आत्मा की सद्गति की प्रार्थना के लिए होता है, न कि मनोरंजन और जश्न मनाने के लिए। आधुनिकता और मनोरंजन की अंधी दौड़ में हम अपनी मूल संवेदनाओं और संस्कारों को किस हद तक पीछे छोड़ते जा रहे हैं। हिंदू सनातन धर्म में मृत्यु के बाद होने वाले श्राद्धकर्म और श्रद्धांजलि सभा को एक बेहद गंभीर, शांत और शोक संतप्त माहौल का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धांजलि सभा में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर भक्ति, भजन-कीर्तन या गरुड़ पुराण के पाठ का आयोजन किया जाता है। बदलते दौर में कुछ ऐसी तस्वीरें भी सामने आ रही हैं, जो सामाजिक परंपराओं और मर्यादाओं पर गंभीर सवाल खड़े करती है। ऐसा ही एक मामला मामला बेगूसराय के दियारा इलाके बलिया थाना क्षेत्र के शिवनगर गांव से सामने आया है। जहां मां के श्राद्धकर्म में बेटा ने भजन की जगह पूरी रात लौंडा डांस का आयोजन किया। पूरी रात चला नाच-गान का कार्यक्रम मैना देवी उर्फ जानकी का निधन 19 मई को हो गया था। इसके बाद 30 मई को द्वादशा एवं श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया था। श्राद्धकर्म में मृतका के पुत्र महाराणा प्रताप पासवान ने पारंपरिक भजन-मंडली या साधु-संतों को बुलाने के बजाय डांसर्स को आमंत्रित किया। मंच पर बकायदा भावपूर्ण श्रद्धांजलि का एक बड़ा बैनर टंगा हुआ था, जिस पर मृतका की तस्वीर लगी थी। उसी तस्वीर और बैनर के ठीक आगे रात भर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजते रहे। लौंडा डांसर ठुमके लगाते रहे। कार्यक्रम की शुरुआत तो सामान्य हुई, लेकिन रात ढलते ही पूरा माहौल किसी शादी-ब्याह के जश्न या ऑर्केस्ट्रा प्रोग्राम में तब्दील हो गया। कार्यक्रम में बुलाए गए डांसर्स ने हिंदी और भोजपुरी के कई लोक प्रचलित और फूहड़ गानों पर जमकर डांस किया। इस दौरान कार्यक्रम में मौजूद ग्रामीणों और मेहमानों ने भी शालीनता की हदें पार कर दी। मृतका के परिजन जश्न में डूबे रहे। लोगों ने शर्मनाक बताया गमगीन माहौल के लिए रखे गए इस कार्यक्रम में लोग पूरी रात झूमते और आनंद लेते नजर आए, जिसे देख हर कोई हैरान है। अब इस पूरी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो सामने आने के बाद लोग इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। इसे कलयुग की पराकाष्ठा बता रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि इस तरह का फूहड़ प्रदर्शन करना बेहद शर्मनाक है। ग्रामीणों ने भी जताई नाराजगी गांव के लोग कहते हैं कि श्राद्ध जैसे पवित्र और गंभीर कर्मकांड में इस तरह के अश्लील आयोजनों का होना समाज में नैतिक मूल्यों और सांस्कृतिक परंपराओं के लगातार हो रहे पतन को दर्शाता है। श्राद्धकर्म दिवंगत आत्मा की सद्गति की प्रार्थना के लिए होता है, न कि मनोरंजन और जश्न मनाने के लिए। आधुनिकता और मनोरंजन की अंधी दौड़ में हम अपनी मूल संवेदनाओं और संस्कारों को किस हद तक पीछे छोड़ते जा रहे हैं।


