Ebola Vaccine Research: पूर्वी अफ्रीका में इबोला वायरस का प्रकोप तेजी से फैल रहा है। अफ्रीका सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने 15 मई को इस प्रकोप की घोषणा की थी। इसके दो दिन बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल माना। 2 जून तक कांगो में 321 से अधिक मामलों की पुष्टि हो चुकी थी और 62 लोगों की जान जा चुकी है। 350 से अधिक संदिग्ध मामलों की जांच की जा रही है, और 16 स्वास्थ्यकर्मियों के संक्रमित होने की खबर है। वहीं, पड़ोसी देश युगांडा में भी संक्रमण पहुंच चुका है, जहां कई नए मामले सामने आए हैं।
विशेषज्ञों को डर है कि अगर संक्रमण की रफ्तार इसी तरह बनी रही तो यह हाल के वर्षों के सबसे बड़े इबोला प्रकोपों में से एक बन सकता है। संक्रमण फैलाने वाला बुंडीबुग्यो (Bundibugyo) स्ट्रेन दुर्लभ है और इसके लिए अभी तक कोई मंजूरशुदा वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। तो आइए जानते हैं कि अभी तक कौन-कौन सी वैक्सीन पर चल रहा है।
कौन-कौन सी वैक्सीन पर चल रहा है काम?
मौजूदा इबोला प्रकोप को देखते हुए दुनिया की कई बड़ी स्वास्थ्य और रिसर्च संस्थाएं बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ वैक्सीन विकसित करने में जुटी हैं। इस काम के लिए कोएलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेयर्डनेस इनोवेशंस (CEPI) ने तीन अलग-अलग वैक्सीन प्रोजेक्ट्स को फंडिंग देने की घोषणा की है।
- मॉडर्ना की mRNA वैक्सीन
कोविड-19 महामारी के दौरान अपनी mRNA वैक्सीन के लिए चर्चा में रही कंपनी Moderna को इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग 50 मिलियन डॉलर की फंडिंग दी गई है। कंपनी उसी mRNA तकनीक का इस्तेमाल कर रही है, जिसने कोरोना वैक्सीन को तेजी से विकसित करने में मदद की थी। इस तकनीक में शरीर को वायरस से लड़ने के लिए जरूरी आनुवंशिक निर्देश दिए जाते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम संक्रमण के खिलाफ तैयार हो जाता है।
- ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (University of Oxford) को 8.6 मिलियन डॉलर की फंडिंग मिली है। यह टीम उसी प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रही है जिसका इस्तेमाल कोविड-19 के दौरान विकसित Oxford–AstraZeneca COVID-19 vaccine में किया गया था। इसमें एक संशोधित और सुरक्षित वायरस के जरिए शरीर में इम्यून प्रतिक्रिया पैदा की जाती है, ताकि भविष्य में असली वायरस से मुकाबला किया जा सके।
- IAVI की वैक्सीन
इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनिशिएटिव (IAVI) को 3.2 मिलियन डॉलर की सहायता दी गई है। यह संस्था ऐसी तकनीक पर काम कर रही है जिसमें एक कमजोर और हानिरहित वायरस का उपयोग करके शरीर को इबोला वायरस को पहचानने और उसके खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
भारत की क्या भूमिका है?
इन तीनों वैक्सीन उम्मीदवारों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की जिम्मेदारी भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को सौंपी गई है। सीरम इंस्टीट्यूट दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता माना जाता है और पहले भी कोविड-19 सहित कई वैश्विक टीकाकरण अभियानों में अहम भूमिका निभा चुका है।
वैक्सीन आने में कितना समय लग सकता है?
हालांकि इन वैक्सीनों पर तेजी से काम किया जा रहा है, लेकिन किसी भी नई वैक्सीन को आम लोगों तक पहुंचने से पहले कई चरणों के परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। वैज्ञानिकों को पहले यह साबित करना होगा कि वैक्सीन सुरक्षित है और बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के खिलाफ प्रभावी भी है। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि वैक्सीन उपलब्ध होने में अभी कई महीने या उससे भी अधिक समय लग सकता है। अगर ये वैक्सीन सफल रहती हैं, तो वे न सिर्फ मौजूदा प्रकोप को नियंत्रित करने में मदद करेंगी बल्कि भविष्य में इस दुर्लभ इबोला स्ट्रेन से बचाव का मजबूत हथियार भी बन सकती हैं।
क्यों मुश्किल हो रहा है संक्रमण को रोकना?
यह प्रकोप कांगो के उस पूर्वी हिस्से में फैला है जहां लंबे समय से हिंसा और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। कई इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही कमजोर हैं। ऐसे में मरीजों तक समय पर इलाज पहुंचाना और संक्रमित लोगों की पहचान करना मुश्किल हो रहा है। इसके अलावा, फंडिंग में कमी और कई अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों के क्षेत्र छोड़ने से भी हालात और चुनौतीपूर्ण हो गए हैं।
इस स्ट्रेन के लिए वैक्सीन क्यों नहीं है?
मौजूदा प्रकोप के लिए जिम्मेदार बुंडीबुग्यो स्ट्रेन पहली बार 2007 में युगांडा में सामने आया था और फिर 2012 में कांगो में देखा गया। यह तीसरी बार है जब इस वायरस ने बड़े स्तर पर लोगों को संक्रमित किया है। इसके प्रकोप बहुत कम होते हैं, इसलिए इस पर ज्यादा रिसर्च नहीं हो सकी। यही वजह है कि अभी तक इसके लिए कोई स्वीकृत वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। वहीं, इबोला के जायरे (Zaire) स्ट्रेन के लिए पहले से वैक्सीन मौजूद हैं क्योंकि उस स्ट्रेन ने अतीत में बड़े प्रकोप पैदा किए थे।
डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।




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