भोपाल की 13 वर्षीय सेलर ध्रुवी पिछले 3 साल से वाटर स्पोर्ट्स में इंट्री के लिए चक्कर काट रही है, लेकिन उसे अब तक न्याय नहीं मिल पाया है। ध्रुवी ने दैनिक भास्कर को अपनी दर्द भरी कहानी बयां की। ध्रुवी ने बताया कि सब बच्चे खेलने जाते हैं। मुझे रोक दिया जाता है। जब एडमिशन लिया था तब तक सब ठीक था, फिर एक दिन मुझे ये कहकर निकाल दिया कि मैं लड़कों के साथ घूमती हूं। मैं सच कह रही हूं, मैं किसी के साथ नहीं घूमती थी। मेरे चरित्र पर सवाल उठाकर मुझे एकेडमी से बाहर किया गया। पिता रितेश टंडन ने बताया कि उनकी दो बेटियां सेलिंग और रोइंग खेलती हैं। बड़ी बेटी ध्रुवी को उन्होंने 2022 में 10 साल की उम्र में वाटर स्पोर्ट्स एकेडमी में एडमिशन कराया था। वह अब 13 साल की है। बीते 3 साल पहले से उसे खेलने से रोका जा रहा है। शिकायत करने पर दूसरी बेटी सिद्धि टंडन को भी प्रतियोगिताओं से दूर रखने की कोशिश की गई। वह 3 सालों से अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है। सब बच्चे खेलने जाते थे, मुझे ही रोक देते थे ध्रुवी टंडन ने बताया कि वह पहले नियमित रूप से खेलती थी। एक साल सब ठीक रहा था। पिछले 3 साल से उसे लगातार रोका जा रहा है। उसने कहा कि उसके साथ बाद में आए कई बच्चों को प्रतियोगिताओं में भेजा गया, लेकिन उसे अच्छे उपकरण तक नहीं दिए गए। शिलांग प्रतियोगिता में उसे फटा हुआ सेल (Sail) दिया गया, जिससे वह ठीक से रेस भी पूरी नहीं कर सकी थी। मुंबई में भी उनके साथ यही करने की तैयारी थी, पर पिता के विरोध पर उन्हें ठीक उपकरण दिए गए, जिससे उनका देश में 5वां स्थान आया। ध्रुवी ने रोते हुए कहा कि रोइंग से निकालने के बाद मैम ने कहा कि मैं किसी लड़के के साथ घूमती हूं। बच्ची के मुताबिक वह खुद समझ नहीं पाई कि आखिर उसके साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है। ध्रुवी अभी पे एंड प्ले में खेलती है, जिसका मतलब है उनके टूर का खर्चा उनके माता-पिता को देना होता है।
छोटी बहन बोली- “मेहनत के बाद भी रोक दिया ध्रुवी की छोटी बहन सिद्धि टंडन ने बताया कि उसने नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर मेडल जीते, लेकिन इसके बावजूद कई बार प्रतियोगिताओं में जाने से रोका गया। सिद्धि ने सिकंदराबाद, हैदराबाद और मैसूर में गोल्ड मेडल जीते, जबकि श्रीलंका और मुंबई की प्रतियोगिताओं में भी पदक हासिल किए। ओमान और सिंगापुर की प्रतियोगिताओं में भी उसने रैंक बनाई। परिवार का आरोप है कि Oman 2025 Optimist Asian and Oceanian Championship के लिए चयन होने के बावजूद उसका नाम सूची से हटा दिया गया और 50 हजार घूस की मांग की। पिता ने बताया कि अधिकारियों ने कहा कि बेटी खेलकर क्या कर लेगी, कौन सा मेडल आ जाएगा और कौन सी नौकरी लग जाएगी। यदि ध्रुवी को मौका मिलता तो वह भी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत सकती थी। छोटी बेटी को 4 दिन स्टेशन पर लेकर बैठे रहे माता-पिता मां ममता टंडन ने बताया कि चेन्नई में आयोजित इंटरनेशनल यूथ चैंपियनशिप में बेटी को भेजने के लिए परिवार को खुद संघर्ष करना पड़ा। वे बेटी को लेकर ट्रेन से चेन्नई पहुंचे और 4 दिन तक स्टेशन पर बैठे रहे। बाद में स्थानीय एसोसिएशन की मदद से रहने और खेलने की व्यवस्था हुई। ममता का कहना है कि अगर वे हार मान लेते तो बेटी प्रतियोगिता में हिस्सा ही नहीं ले पाती। पायल और मंगलसूत्र बेचकर बेटियों को भेजा ममता टंडन ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। पति की दुकान पहले अच्छी चलती थी, लेकिन बाद में कारोबार बंद जैसा हो गया। वह खुद आशा कार्यकर्ता का काम करती हैं। बेटियों को प्रतियोगिताओं में भेजने के लिए उनका पायल और मंगलसूत्र भी गिरवी रखना पड़ा है। लाड़ली योजना से मिलने वाली राशि भी बेटियों के खेल पर खर्च की गई। बेटी बचाओ सिर्फ भाषणों में रितेश टंडन ने कहा कि सरकार “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” की बात करती है, लेकिन उनकी बेटियों के साथ लगातार अन्याय हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि 11 बार उन्होंने सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत की है, पर हर बार केस बंद हो जाता है। बाल आयोग में भी शिकायत की, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। कलेक्टर से शिकायत की, पर कुछ फायदा नहीं हुआ। रितेश टंडन कहते हैं कि रात-रात को उठकर ईमेल चेक करता हूं। रात को नींद नहीं आती है। अगर पता होता की बेटियों को आगे बढ़ना इतना मुश्किल है तो मैं इन्हें कोख में ही मार देता । सरकार से एक ही मांग है कि वे मामले की जांच कराएं और मेरी बेटी को न्याय दिलाएं। पुरानी शिकायतों का बदला बेटियों से लिया जा रहा रितेश टंडन ने आरोप लगाया कि 2021-22 में उनका बेटा, जो कि कयाकिंग खेलता है, उसकी एटेंडेंस पूरी होने और परफॉर्मेंस भी ठीक होने के बाद भी उसे एकेडमी से निकाल दिया गया था। वह कयाकिंग के कोच पीयूष कांति बरोई के बेटे अंकित के कॉम्पटीशन में था। तब हमने शिप्रा श्रीवास्तव से शिकायत की, तो उन्होंने कोच पर कोई कार्रवाई नहीं की। जिसके बाद हमने मामले की शिकायत पीएमओ ऑफिस, राज्यपाल और मानवाधिकार आयोग में की। फिर हमारे बेटे को दोबारा रखा गया था। उस समय भी एमपी वॉटर स्पोर्ट्स एकेडमी की इंचार्ज शिप्रा श्रीवास्तव ही थीं। उसी समय से हमारे परिवार को परेशान किया जा रहा है। रितेश ने कहा कि इस मामले में एमपी वॉटर स्पोर्ट्स एकेडमी की इंचार्ज शिप्रा श्रीवास्तव, क्लब इंचार्ज दलबीर सिंह राजपूत, उनकी पत्नी, लाइफगार्ड शेखर बाथम, सेलिंग कोच नरेंद्र सिंह राजपूत तथा कोच पीयूष कांति बरोई पर कार्रवाई होनी चाहिए। अधिकारियों ने मामले में नहीं की बात दैनिक भास्कर ने जब मामले में आरोपों को लेकर मध्यप्रदेश वॉटर स्पोर्ट्स अकादमी और संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की। तो कोई सकारात्मक सहयोग नहीं मिला। मामले में शिप्रा श्रीवास्तव ने पहले तो भास्कर रिपोर्ट को मिलने बुलाया, लेकिन रिपोर्टर के ऑफिस पहुंचने पर वो ऑफिस में नहीं मिली। फोन पर उन्होंने कहा कि मैं इस पर कोई बयान नहीं दे सकती हूं। इसके लिए संचालक से बात करनी होगी। जो 2 जून तक छुट्टी पर हैं। संचालक अंशुमन सिंह यादव ने फोन पर हमसे बात कहा कि मैं अभी छुट्टी पर हूं, मुझे ये प्रकरण अभी याद नहीं है। उन्होंने ज्वाइंट सेकरेट्री बालू सिंह यादव से बात करने को कहा। ज्वाइंट सेकेट्री ने हमारा कॉल नहीं उठाया। ध्रुवी की बहन सिद्धि का प्रदर्शन ऐसे में दूसरे प्रदेश से खेलने लगते हैं खिलाड़ी MP में जॉब गारंटी न होना और ऐसे ही अन्य कारण सामने आने पर प्रदेश के प्रतिभावान खिलाड़ी दूसरे प्रदेशों से खेलने लगते हैं। बीते साल उत्तराखंड नेशनल गेम्स में भी ऐसा ही हुआ था। नेशनल गेम्स में मध्यप्रदेश ने 331 खिलाड़ी उतारे थे। जबकि 120 खिलाड़ी ऐसे थे, जो हैं तो मध्यप्रदेश के, लेकिन दूसरे राज्यों की ओर खेले। इनमें 68 खिलाड़ियों ने मेडल भी जीते। वाटर स्पोर्ट्स में कुल 58 खिलाड़ी पानी में उतरे थे। इसमें 25 मप्र के थे, लेकिन दूसरे राज्यों से खेल रहे थे। अकेले कयाकिंग-केनोइंग की ही बात करें तो साल 2023 से अब तक मध्यप्रदेश के 28 ऐसे खिलाड़ी हैं जो दूसरे राज्यों में चले गए। ये खबर भी पढ़ें… रोज एक ‘ट्विशा’ की मौत…दहेज हत्या में MP नंबर-3 पर ट्विशा को न्याय दिलाने लोग इंस्टाग्राम पर स्टोरी लगा रहे हैं। आर्मी से रिटायर्ड लोग रैली निकाल रहे हैं। ट्विशा की मौत क्यों हुई, कैसे हुई, यह अभी किसी को नहीं पता। ससुराल पक्ष उसे नशा करने वाला बता रहा है, जबकि मायके पक्ष का कहना है कि हमने स्कॉर्पियो दी थी, लेकिन उन्हें फॉर्च्यूनर चाहिए थी। पूरी खबर पढ़ें


