Dholpur: हर रोज पानी की तलाश…पथरीले रास्ते पर 2 किमी चलने पर मजबूर महिलाएं

Dholpur: हर रोज पानी की तलाश…पथरीले रास्ते पर 2 किमी चलने पर मजबूर महिलाएं

धौलपुर. धौलपुर भले चंबल नदी किनारे बसा शहर हो लेकिन जिले सरमथुरा उपखंड का डांग इलाका आजादी के 75 साल बाद भी जल संकट से जूझ रहा है। डांग क्षेत्र के गांवों में हैंडपंप सूख चुके हैं और यह हवा छोड़ रहे हैं। ग्रामीण दूर-दराज पोखर और तालाबों के मटमैले और गंदे पानी पीकर जिंदगी बसर रहे हैं।

डांग क्षेत्र में अप्रेल से जून माह में भीषण गर्मी के दौरान तो कुछ गांवों में हालात विकट हो जाते हैं। डांग में महिलाएं पानी के लिए जद्दोजहद करती नजर आ जाएंगी। महिलाएं पथरीले इलाके में करीब डेढ़ से 2 किलोमीटर दूर से पानी लाने पर मजबूर हैं। कतारबद्ध पथरीले और ऊबड़ा-खाबड़ रास्ते से बर्तनों में पानी लाने के दृश्य आम हैं, केवल सरकारी सिस्टम को नहीं दिख रहे हैं। अप्रेल-मई माह की 42 से 46 डिग्री सेल्सियस के तापमान में डांग के आधा दर्जन गांवों के काफी लोग पशुधन के साथ पलायन कर जाते हैं। घरों पर केवल एक-दो बुजुर्ग पुरुष व महिला रह जाते हैं। इनकी वापसी बरसात के सीजन में ही होती है। यह कहानी हर साल की है। सालों से स्थानीय लोग घर के आंगन में जलधारा लगाने की उम्मीद लगाए हुए हैं, फिलहाल वो अभी दूर प्रतीत लग रहा है।

डांग क्षेत्र में बिगड़ रही स्थिति

सरमथुरा उपखंड के डांग क्षेत्र के झल्लू की झोर, बरूअर, विजलपुरा, महुआकी झोर और कोटरा गांव के हालात दिनों-दिन बदतर हो रहे हैं। यहां सुबह-शाम लोग पानी के लिए जूझ रहे हैं। डांग क्षेत्र में सरकार की जल जीवन मिशन योजना अधूरी पड़ी होन से लोग अब पलायन करने पर मजबूर हैं। जबकि कई लोग तो जा भी चुके हैं। रह गए लोग पोखर व तालाबों के तल में पहुंच चुके पानी पर निर्भर हैं। वो भी छान कर इस्तेमाल होता है।

अधर में जल जीवन मिशन योजना…

डांग क्षेत्र में पानी का संकट के चलते करीब आधा दर्जन गांवों में करीब सवा सौ परिवार प्रभावित हैं। राज्य सरकार की ओर से जल जीवन मिशन अन्तर्गत गांवों में हर घर नल के माध्यम से पानी पहुंचाने की कवायद की हो रही हैं लेकिन विभागीय उदासीनता के चलते यह योजना अधर में लटकी हुई है। गांव कोटरा में पेयजल पाइपलाइन अधूरी है, इस सीजन भी स्थानीय लोगों को पानी के लिए जूझना होगा। उपखंड के गौलारी, मदनपुर पंचायत में पानी की समस्या का तीन साल बाद भी समाधान नहीं हो पाया है। पेयजल लाइन बिछाने में वन विभाग का अडंगा लगने से योजनाएं लेट हो रही हैं।

साहब… आज भी तालाब, पोखर से ला रहे पानी

इन गांवों के लोग पोखर, तालाब व कुईया के गंदे व दुर्गंधयुक्त पानी से प्यास बुझाने पर निर्भर हैं। ग्रामीण रामखिलाड़ी, रामनाथ, रामवीर, भूपेन्द्र, हरेन्द्रसिंह ने बताया कि साहब… आजादी भले ही मिल गई हो तो लेकिन 75 साल बाद भी यहां कोई बदलाव नहीं आया। आज भी हम छान कर पानी पीने पर मजबूर हैं। वहीं, ग्रामीण रामखिलाड़ी बताता है कि 60 साल पहले पोखर, तालाबों में डबरों से पानी भरते थे, आज भी वो ही हालात हैं। गर्मी सीजन के साथ ही जेहन में केवल एक ही सवाल होता है कि यह दिन कैसे कटेंगे। महिलाओं के लिए स्थिति संघर्षपूर्ण हो जाती है, पानी लाने की जिम्मेदानी उन्हीं के कंधों पर है। ग्रामीण महिलाएं रोज सुबह करीब 2 किमी दूर से पानी लाने निकल जाती हैं, बर्तन भरने घर के कामकाज हो पाते हैं।

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