कोडरमा के मसनोडीह आम की अमेरिका तक मांग:बागान की 24 घंटे होती है पहरेदारी, दूर-दराज से खरीदारी के लिए पहुंचते हैं लोग

कोडरमा के मसनोडीह आम की अमेरिका तक मांग:बागान की 24 घंटे होती है पहरेदारी, दूर-दराज से खरीदारी के लिए पहुंचते हैं लोग

कोडरमा जिले के डोमचांच प्रखंड स्थित मसनोडीह गांव के आम बागान इन दिनों अपनी खास पहचान बना रहे हैं। यहां के आमों की बिक्री शुरू हो गई है, जिनकी मांग देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका तक है। इन मूल्यवान आमों की सुरक्षा के लिए बागानों में 24 घंटे सख्त पहरा रहता है, जिसमें तीन शिफ्ट में पहरेदारी की जाती है। विनय सिंह परिवार के इस विशाल बागान में एक हजार से अधिक आम के पेड़ हैं, जिनमें एक दर्जन से ज्यादा किस्में शामिल हैं। बागान की देखरेख कर रहे राजू मेहता ने बताया कि कुल सात बागानों में लगभग 3 हजार आम के पेड़ हैं। इन पेड़ों में मालदा, जर्दालु, गुलाब खास, बम्बईया, हिमसागर, किशुन भोग, बेलखास, मणिका, सीपिया, फ़ज़ली जैसी प्रमुख किस्में शामिल हैं। अचार के लिए प्रसिद्ध बिजुआ और सुकूल जैसी किस्में भी यहां उपलब्ध हैं। दूर-दराज से लोग खरीदारी के लिए पहुंचते हैं यहां प्राकृतिक रूप से पके ताजे आम सीधे पेड़ों से उपलब्ध होते हैं, जिससे दूर-दराज से लोग खरीदारी के लिए पहुंचते हैं। रांची से 150 किलोमीटर दूर और आसपास के 20-30 किलोमीटर के दायरे से भी ग्राहक आम खरीदने आते हैं। बिहार सहित अन्य जिलों के ग्राहक भी ट्रेन और बस के माध्यम से ऑर्डर पर आम मंगवाते हैं। राजू मेहता ने बताया कि पिछले 20 वर्षों से वे आम के कारोबार से जुड़े हैं। मसनोडीह के आम की मांग इतनी अधिक है कि एक बार जब एक नियमित ग्राहक को दूसरे स्थान का आम भेजा गया, तो उन्होंने उसे पसंद नहीं किया और अगले वर्ष फिर मसनोडीह के आम की ही मांग की। 30 किलो आम मंगवाया था
मसनोडीह के आम अब केवल कोडरमा या झारखंड तक सीमित नहीं हैं। यहां के आम दिल्ली तक भेजे जा चुके हैं। पिछले वर्ष कोडरमा के एक व्यक्ति ने अमेरिका में रहने वाले अपने परिचितों के लिए 30 किलो आम मंगवाया था, जिसे 10-10 किलो के पैकेट बनाकर भेजा गया था। विनय सिंह के परिवार द्वारा हर वर्ष आम तैयार होने पर जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों तथा विशिष्ट लोगों को भी भेंट स्वरूप आम भेजे जाते हैं। लोगों को हर साल इस बागान के आम का बेसब्री से इंतजार रहता है। एक सीजन में 4 से 5 लाख रुपए की आमदनी आम विक्रेता राजू कुमार ने बताया कि यहां के अलग-अलग आमों को वे 50 से 80 रुपए प्रति किलो तक की दर से बेचते हैं। उन्होंने बताया कि अगर आंधी-तूफान में आम नहीं गिरते हैं तो वे एक सीजन में लगभग 4 से 5 लाख रुपए की आमदनी हो जाती है। 60:40 के अनुपात में आम के पेड़ की होती है डील आम बागान के मालिक विनय सिंह ने बताया कि अब आम के पेड़ों को बटैया (किराए पर) दे दिया गया है। इसके तहत इनके आम के पेड़ों को किराए पर लेने वाले पेड़ों से टूटने वाले प्रति 100 आमों में 60 आम इन्हें दे देते हैं, जबकि 40 आम वे बेच दिया करते हैं। आम की सुरक्षा के लिए दिन-रात पहरा बढ़ती मांग के साथ आम चोरी होने की आशंका भी बनी रहती है। इसी कारण पूरे बागान की सुरक्षा के लिए 24 घंटे निगरानी की व्यवस्था की गई है। उन्होंने बताया कि बागान की रखवाली तीन शिफ्टों में होती है। रात के समय बड़े टॉर्च की सहायता से पूरे बागान पर नजर रखी जाती है। सुरक्षा के लिए विभिन्न स्थानों पर बांस के मचान भी बनाए गए हैं। जहां बैठकर रखवाले लगातार निगरानी करते हैं। बाजार से महंगा पर शुद्धता पूरी इधर, आम खरीदने आए एक ग्राहक मुन्ना कुमार सिंह ने बताया कि बाजार में तो हर किस्म के आम उपलब्ध हैं लेकिन मसनोडीह के बगीचे के आम का एक अलग ही स्वाद है। एक ओर जहां बाजार के आम केमिकल युक्त होते हैं, वहीं मसनोडीह बगीचे का आम इससे अलग प्राकृतिक रूप से पका हुआ मिलता है। उन्होंने कहा कि हमलोग यहां आते हैं तो आम को पहले चखते हैं। इसके बाद आम की खरीदारी करते हैं। 63 साल पुरानी विरासत आज भी दे रही फल मसनोडीह का यह आम बागान रूपक सिंह परिवार के पूर्वजों द्वारा वर्ष 1963 में लगाया गया था। कुछ वर्षों बाद पेड़ों में फल आने शुरू हुए और तब से यह सिलसिला लगातार जारी है। छह दशक से अधिक समय बाद भी यह बागान न केवल स्वादिष्ट आमों का उत्पादन कर रहा है, बल्कि अपनी मिठास से लोगों के रिश्तों में भी मिठास घोलने का काम कर रहा है। यही वजह है कि मसनोडीह का नाम आज क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध आम बागानों में शुमार हो चुका है। कोडरमा जिले के डोमचांच प्रखंड स्थित मसनोडीह गांव के आम बागान इन दिनों अपनी खास पहचान बना रहे हैं। यहां के आमों की बिक्री शुरू हो गई है, जिनकी मांग देश ही नहीं, बल्कि अमेरिका तक है। इन मूल्यवान आमों की सुरक्षा के लिए बागानों में 24 घंटे सख्त पहरा रहता है, जिसमें तीन शिफ्ट में पहरेदारी की जाती है। विनय सिंह परिवार के इस विशाल बागान में एक हजार से अधिक आम के पेड़ हैं, जिनमें एक दर्जन से ज्यादा किस्में शामिल हैं। बागान की देखरेख कर रहे राजू मेहता ने बताया कि कुल सात बागानों में लगभग 3 हजार आम के पेड़ हैं। इन पेड़ों में मालदा, जर्दालु, गुलाब खास, बम्बईया, हिमसागर, किशुन भोग, बेलखास, मणिका, सीपिया, फ़ज़ली जैसी प्रमुख किस्में शामिल हैं। अचार के लिए प्रसिद्ध बिजुआ और सुकूल जैसी किस्में भी यहां उपलब्ध हैं। दूर-दराज से लोग खरीदारी के लिए पहुंचते हैं यहां प्राकृतिक रूप से पके ताजे आम सीधे पेड़ों से उपलब्ध होते हैं, जिससे दूर-दराज से लोग खरीदारी के लिए पहुंचते हैं। रांची से 150 किलोमीटर दूर और आसपास के 20-30 किलोमीटर के दायरे से भी ग्राहक आम खरीदने आते हैं। बिहार सहित अन्य जिलों के ग्राहक भी ट्रेन और बस के माध्यम से ऑर्डर पर आम मंगवाते हैं। राजू मेहता ने बताया कि पिछले 20 वर्षों से वे आम के कारोबार से जुड़े हैं। मसनोडीह के आम की मांग इतनी अधिक है कि एक बार जब एक नियमित ग्राहक को दूसरे स्थान का आम भेजा गया, तो उन्होंने उसे पसंद नहीं किया और अगले वर्ष फिर मसनोडीह के आम की ही मांग की। 30 किलो आम मंगवाया था
मसनोडीह के आम अब केवल कोडरमा या झारखंड तक सीमित नहीं हैं। यहां के आम दिल्ली तक भेजे जा चुके हैं। पिछले वर्ष कोडरमा के एक व्यक्ति ने अमेरिका में रहने वाले अपने परिचितों के लिए 30 किलो आम मंगवाया था, जिसे 10-10 किलो के पैकेट बनाकर भेजा गया था। विनय सिंह के परिवार द्वारा हर वर्ष आम तैयार होने पर जनप्रतिनिधियों, प्रशासनिक अधिकारियों तथा विशिष्ट लोगों को भी भेंट स्वरूप आम भेजे जाते हैं। लोगों को हर साल इस बागान के आम का बेसब्री से इंतजार रहता है। एक सीजन में 4 से 5 लाख रुपए की आमदनी आम विक्रेता राजू कुमार ने बताया कि यहां के अलग-अलग आमों को वे 50 से 80 रुपए प्रति किलो तक की दर से बेचते हैं। उन्होंने बताया कि अगर आंधी-तूफान में आम नहीं गिरते हैं तो वे एक सीजन में लगभग 4 से 5 लाख रुपए की आमदनी हो जाती है। 60:40 के अनुपात में आम के पेड़ की होती है डील आम बागान के मालिक विनय सिंह ने बताया कि अब आम के पेड़ों को बटैया (किराए पर) दे दिया गया है। इसके तहत इनके आम के पेड़ों को किराए पर लेने वाले पेड़ों से टूटने वाले प्रति 100 आमों में 60 आम इन्हें दे देते हैं, जबकि 40 आम वे बेच दिया करते हैं। आम की सुरक्षा के लिए दिन-रात पहरा बढ़ती मांग के साथ आम चोरी होने की आशंका भी बनी रहती है। इसी कारण पूरे बागान की सुरक्षा के लिए 24 घंटे निगरानी की व्यवस्था की गई है। उन्होंने बताया कि बागान की रखवाली तीन शिफ्टों में होती है। रात के समय बड़े टॉर्च की सहायता से पूरे बागान पर नजर रखी जाती है। सुरक्षा के लिए विभिन्न स्थानों पर बांस के मचान भी बनाए गए हैं। जहां बैठकर रखवाले लगातार निगरानी करते हैं। बाजार से महंगा पर शुद्धता पूरी इधर, आम खरीदने आए एक ग्राहक मुन्ना कुमार सिंह ने बताया कि बाजार में तो हर किस्म के आम उपलब्ध हैं लेकिन मसनोडीह के बगीचे के आम का एक अलग ही स्वाद है। एक ओर जहां बाजार के आम केमिकल युक्त होते हैं, वहीं मसनोडीह बगीचे का आम इससे अलग प्राकृतिक रूप से पका हुआ मिलता है। उन्होंने कहा कि हमलोग यहां आते हैं तो आम को पहले चखते हैं। इसके बाद आम की खरीदारी करते हैं। 63 साल पुरानी विरासत आज भी दे रही फल मसनोडीह का यह आम बागान रूपक सिंह परिवार के पूर्वजों द्वारा वर्ष 1963 में लगाया गया था। कुछ वर्षों बाद पेड़ों में फल आने शुरू हुए और तब से यह सिलसिला लगातार जारी है। छह दशक से अधिक समय बाद भी यह बागान न केवल स्वादिष्ट आमों का उत्पादन कर रहा है, बल्कि अपनी मिठास से लोगों के रिश्तों में भी मिठास घोलने का काम कर रहा है। यही वजह है कि मसनोडीह का नाम आज क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध आम बागानों में शुमार हो चुका है।  

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