भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (IISR) मोदीपुरम में गुरुवार को “गन्ना-मूंगफली अंतःफसली खेती को बढ़ावा देने हेतु किसान-नीति निर्माता-वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें उत्तर प्रदेश के कृषि, कृषि शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने कहा कि गन्ने के साथ मूंगफली और दलहनी फसलों की खेती किसानों की आय बढ़ाने के साथ देश को तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
उन्होंने कहा कि भारत खाद्य तेलों के आयात पर हर वर्ष 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक खर्च करता है। गन्ना आधारित कृषि प्रणाली में मूंगफली जैसी तिलहनी फसलों को शामिल कर इस खर्च को कम किया जा सकता है। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने और “खेत बचाओ अभियान” से जुड़ने की अपील भी की। इसके साथ ही विशिष्ट अतिथि कृषि राज्य मंत्री बलदेव सिंह औलख ने कहा कि किसानों को केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय समेकित कृषि प्रणाली को अपनाना चाहिए। इससे आय के स्रोत बढ़ेंगे और तिलहन व दलहन उत्पादन में भी वृद्धि होगी।
आईसीएआर के उप महानिदेशक (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन) डॉ. अमरीश कुमार नायक ने बताया कि गन्ने के साथ दलहनी फसलों को जोड़ने पर किसानों को 40 से 50 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त आय मिल सकती है, जबकि मूंगफली की अंतःफसल से 70 हजार से 1 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर तक अतिरिक्त आमदनी संभव है। इससे मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण को भी लाभ मिलेगा। संस्थान के निदेशक डॉ. सुनील कुमार ने गन्ना फसल प्रणाली के विविधीकरण और किसानों की आय बढ़ाने के लिए किए जा रहे शोध कार्यों की जानकारी दी। वहीं भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के निदेशक डॉ. एस.एन. सुशील ने इस तकनीक के व्यापक प्रसार की रणनीति साझा की।
कार्यक्रम के दौरान अतिथियों ने कुसावली स्थित नीर आदर्श ऑर्गेनिक फार्म का दौरा कर गन्ने के साथ वैज्ञानिक पद्धति से उगाई गई मूंगफली की फसल का अवलोकन किया। किसानों से सीधे संवाद कर इस मॉडल के व्यावहारिक लाभों पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के 15 से अधिक जिलों से आए 600 से ज्यादा किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, कृषि विभाग के अधिकारियों, चीनी मिल प्रबंधकों, स्वयं सहायता समूहों, एफपीओ प्रतिनिधियों और नाबार्ड अधिकारियों ने भाग लिया।


