इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर रिंग रोड परियोजना से जुड़ी सेंट्रल यूपी गैस लिमिटेड की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय महत्व की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के संरेखण में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा। कोर्ट ने कहा विशेषकर तब जब परियोजना अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी हो। न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह की खंडपीठ ने यह आदेश सुनाया। सीयूजीएल ने चकेरी स्थित अपने सीएनजी स्टेशन और पीएनजी पाइपलाइन नेटवर्क को बचाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। कंपनी का कहना था कि रिंग रोड परियोजना के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण से उसका बुनियादी ढांचा प्रभावित होगा, जिससे हजारों उपभोक्ताओं की गैस आपूर्ति बाधित हो सकती है। कंपनी ने परियोजना के संरेखण में बदलाव और अधिग्रहण पर रोक लगाने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान एनएचएआई ने बताया कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्ष 2022 में शुरू हुई थी और 2023 में अंतिम अधिसूचना जारी हो चुकी थी। साथ ही परियोजना का लगभग 50 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। अदालत ने माना कि राजमार्ग परियोजनाओं का संरेखण तकनीकी और प्रशासनिक विषय है, जिसमें विशेषज्ञों का निर्णय सर्वोपरि होता है। ऐसे उन्नत चरण में बदलाव से परियोजना में देरी और सार्वजनिक धन की बर्बादी होगी। हालांकि अदालत ने सीयूजीएल को राहत देने से इनकार कर दिया, लेकिन कहा कि कंपनी अपने बुनियादी ढांचे के स्थानांतरण और वैकल्पिक व्यवस्था के लिए एनएचएआई से पर्याप्त समय देने का अनुरोध कर सकती है। अदालत ने उम्मीद जताई कि एनएचएआई इस पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करेगा। इसके साथ ही याचिका को योग्यता के अभाव में खारिज कर दिया गया।


