भास्कर एनालिसिस बिहार में इस साल अक्टूबर-नवंबर में पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं। लेकिन अब इन चुनावों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। चुनाव टलने की आशंका भी जताई जा रही है। राज्य के मुखिया, सरपंच और त्रिस्तरीय पंचायत प्रतिनिधियों ने राज्य निर्वाचन आयोग में अहम शिकायत दर्ज कराई है। मामले में 15 मई को आयोग में सुनवाई होनी है। प्रतिनिधियों का सवाल है कि जब बिहार में 2022-23 का जाति आधारित सर्वे हो चुका है, तो फिर 1991 के पुराने आंकड़ों के आधार पर परिसीमन और चुनाव क्यों कराए जा रहे हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और पटना हाईकोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला दिया है। प्रतिनिधियों का कहना है कि अगर 15 मई को आयोग उनकी मांगें नहीं मानता, तो मामला पटना हाईकोर्ट में और गहराएगा। इससे पंचायत चुनाव टल सकते हैं। मुखिया महासंघ अध्यक्ष मिथिलेश राय का कहना है कि सरकार बिना ‘ट्रिपल टेस्ट’ पूरा किए चुनाव कराने की तैयारी में है। यूपी में भी इसी वजह से पंचायत चुनाव टल गए थे। अब प्रतिनिधि इस मामले को लेकर पटना हाईकोर्ट पहुंच चुके हैं। बिना ‘ट्रिपल टेस्ट’ संकट में फंस सकते हैं चुनाव बिहार पंचायत चुनाव में सबसे बड़ा कानूनी पेंच सुप्रीम कोर्ट का ‘ट्रिपल टेस्ट’ नियम और पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल है। 1991 के डेटा के आधार पर चुनाव कराने पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि राज्य में जाति आधारित नया सर्वे हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण देने से पहले ‘ट्रिपल टेस्ट’ पूरा करना जरूरी है। अगर यह प्रक्रिया पूरी किए बिना चुनाव कराए गए, तो पूरा चुनाव कानूनी विवाद में फंस सकता है। आपत्तियों के दो कारण 1 पुराने परिसीमन पर सवाल मुखिया महासंघ अध्यक्ष मिथिलेश राय और पंच-सरपंच संघ अध्यक्ष आमोद निराला का कहना है कि चुनाव अभी भी 1991 की जनगणना और 1994 के परिसीमन पर आधारित हैं। यह गलत है। प्रतिनिधियों की दो बड़ी मांगें पहली मांग है कि 2022-23 के जाति आधारित सर्वे के आधार पर पंचायतों की नई आरक्षण सूची तैयार की जाए। इसमें अपडेटेड और मान्य आंकड़ों का इस्तेमाल हो। दूसरी मांग है कि नए सिरे से परिसीमन पूरा होने तक पंचायत चुनाव 2026 की सभी प्रक्रियाओं पर रोक लगाई जाए। मुखिया और सरपंचों ने खोला मोर्चा; 15 मई को राज्य निर्वाचन आयोग में सुनवाई 2 ‘ट्रिपल टेस्ट’ का पेंच सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ‘ट्रिपल टेस्ट’ के बिना ओबीसी आरक्षण देना असंवैधानिक माना जाएगा। अगर यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो ओबीसी आरक्षित सीटों को सामान्य श्रेणी मान चुनाव कराना पड़ सकता है। भास्कर एनालिसिस बिहार में इस साल अक्टूबर-नवंबर में पंचायत चुनाव प्रस्तावित हैं। लेकिन अब इन चुनावों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। चुनाव टलने की आशंका भी जताई जा रही है। राज्य के मुखिया, सरपंच और त्रिस्तरीय पंचायत प्रतिनिधियों ने राज्य निर्वाचन आयोग में अहम शिकायत दर्ज कराई है। मामले में 15 मई को आयोग में सुनवाई होनी है। प्रतिनिधियों का सवाल है कि जब बिहार में 2022-23 का जाति आधारित सर्वे हो चुका है, तो फिर 1991 के पुराने आंकड़ों के आधार पर परिसीमन और चुनाव क्यों कराए जा रहे हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और पटना हाईकोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला दिया है। प्रतिनिधियों का कहना है कि अगर 15 मई को आयोग उनकी मांगें नहीं मानता, तो मामला पटना हाईकोर्ट में और गहराएगा। इससे पंचायत चुनाव टल सकते हैं। मुखिया महासंघ अध्यक्ष मिथिलेश राय का कहना है कि सरकार बिना ‘ट्रिपल टेस्ट’ पूरा किए चुनाव कराने की तैयारी में है। यूपी में भी इसी वजह से पंचायत चुनाव टल गए थे। अब प्रतिनिधि इस मामले को लेकर पटना हाईकोर्ट पहुंच चुके हैं। बिना ‘ट्रिपल टेस्ट’ संकट में फंस सकते हैं चुनाव बिहार पंचायत चुनाव में सबसे बड़ा कानूनी पेंच सुप्रीम कोर्ट का ‘ट्रिपल टेस्ट’ नियम और पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल है। 1991 के डेटा के आधार पर चुनाव कराने पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि राज्य में जाति आधारित नया सर्वे हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देश है कि स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण देने से पहले ‘ट्रिपल टेस्ट’ पूरा करना जरूरी है। अगर यह प्रक्रिया पूरी किए बिना चुनाव कराए गए, तो पूरा चुनाव कानूनी विवाद में फंस सकता है। आपत्तियों के दो कारण 1 पुराने परिसीमन पर सवाल मुखिया महासंघ अध्यक्ष मिथिलेश राय और पंच-सरपंच संघ अध्यक्ष आमोद निराला का कहना है कि चुनाव अभी भी 1991 की जनगणना और 1994 के परिसीमन पर आधारित हैं। यह गलत है। प्रतिनिधियों की दो बड़ी मांगें पहली मांग है कि 2022-23 के जाति आधारित सर्वे के आधार पर पंचायतों की नई आरक्षण सूची तैयार की जाए। इसमें अपडेटेड और मान्य आंकड़ों का इस्तेमाल हो। दूसरी मांग है कि नए सिरे से परिसीमन पूरा होने तक पंचायत चुनाव 2026 की सभी प्रक्रियाओं पर रोक लगाई जाए। मुखिया और सरपंचों ने खोला मोर्चा; 15 मई को राज्य निर्वाचन आयोग में सुनवाई 2 ‘ट्रिपल टेस्ट’ का पेंच सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक ‘ट्रिपल टेस्ट’ के बिना ओबीसी आरक्षण देना असंवैधानिक माना जाएगा। अगर यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो ओबीसी आरक्षित सीटों को सामान्य श्रेणी मान चुनाव कराना पड़ सकता है।


