‘मुसलमानों को नहीं दिखाया बुरा’ कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने प्रोपेगैंडा बताकर, आदित्य धर की नीयत पर उठाए ऐसे सवाल

‘मुसलमानों को नहीं दिखाया बुरा’ कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने प्रोपेगैंडा बताकर, आदित्य धर की नीयत पर उठाए ऐसे सवाल

Congress Spokesperson Shama Mohamed Hits Back As Aditya Dhar: फिल्म ‘धुरंधर‘ को लेकर एक बड़े विवाद ने सोशल मीडिया पर जोर पकड़ लिया है। इंडियन नेशनल कांग्रेस (AICC) की नेशनल स्पोक्सपर्सन शमा मोहम्मद ने फिल्म के निर्देशन की तारीफ करते हुए इसे बहुत बढ़िया बताया, लेकिन इस पोस्ट पर एक यूजर, शोएब अली मोहम्मद, जिनका दावा है कि वे IIT और IIM के ग्रेजुएट हैं, इन्होंने फिल्म को प्रोपेगैंडा बताया और कहा कि इसमें मुसलमानों को गलत तरीके से बुरे रूप में दिखाया गया है।

फिल्म में मुसलमानों को नहीं बल्कि पाकिस्तानियों को बुरा बताया गया है

शमा मोहम्मद ने इस आरोप का जवाब देते हुए साफ किया कि फिल्म में मुसलमानों को नहीं बल्कि पाकिस्तानियों को बुरी रोशनी में दिखाया गया है। साथ ही, उन्होंने आरोप लगाने वाले यूजर को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि वे दोनों को समझने में गलती कर रहे हैं और ये गलत है। साथ ही, शमा ने कहा, “आप जैसे लोग भारत में मुसलमानों का नाम खराब करते हैं।” इसके बाद उन्होंने यूजर को भारत छोड़कर पाकिस्तान की नागरिकता लेने का सुझाव भी दिया, जिसे लेकर विवाद और बढ़ गया।

इतना ही नहीं, एक यूजर ने इस सुझाव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “तुम कौन होते हो मुझे पाकिस्तान जाने के लिए कहने वाले? मेरे परदादा ने इस देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी और वे भारत के सच्चे बेटे थे, तुम्हारी तरह नहीं जिनमें मुगलों के जीन मिले हैं।” इस तरह टकराव एक व्यक्तिगत विवाद का रूप ले गया।

फिल्म में फिक्शन के साथ पॉलिटिकल मैसेजिंग का गलत कॉम्बो है

इस फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर बनी बहस का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर था कि क्या धुरंधर एक सही और तथ्यात्मक फिल्म है या फिर इसमें फिक्शन के साथ पॉलिटिकल मैसेजिंग का गलत कॉम्बो है। साथ ही, यूट्यूबर ध्रुव राठी और फिल्म क्रिटिक प्रथ्यूष परशुरामन ने इस फिल्म को प्रोपेगैंडा बताया और कहा कि इसकी कहानी में तथ्य और फिक्शन के बीच की लाइन धुंधली कर दी गई है। तो वहीं दूसरी ओर, फिल्म की इंडस्ट्री के कई जानकारों ने इसे कड़ा बचाव दिया है। उनका मानना है कि ये फिल्म एक क्रिएटिव एक्सप्रेशन है और इसे राजनीतिक संदेश के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

ये विवाद इस बात को दर्शाता है कि आज के डिजिटल दौर में फिल्मों और उनके संदेशों पर चर्चा किस प्रकार तीव्र और व्यक्तिगत हो जाती है। जहां कुछ लोग इसे कला और मनोरंजन का हिस्सा मानते हैं, तो वहीं कुछ इसे राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों से जोड़ देते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *