‘सीएम पद छोड़ रहे हैं, बात समझ नहीं आ रही’:नीतीश का मैसेज और भाजपा का सरेंडर, पार्टी में विरोध के बीच कैसे CM बने सम्राट

‘सीएम पद छोड़ रहे हैं, बात समझ नहीं आ रही’:नीतीश का मैसेज और भाजपा का सरेंडर, पार्टी में विरोध के बीच कैसे CM बने सम्राट

‘वर्षों बरस तक जमीन पर मेहनत किए, पसीना बहाए, लहू बहाए, बलिदान दिए, आज कमल खिलाने का अवसर आया। भाजपा का सिपाही होने के नाते अपने कमांडर के आदेश के अनुसार गठबंधन की राजनीति को लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी का प्रस्ताव दिया।’ बिहार के डिप्टी सीएम रहे विजय सिन्हा ने ये बातें सम्राट चौधरी के विधायक दल के नेता चुने जाने के तुरंत बाद कहीं। ये बयान भले विजय सिन्हा ने दिया हो, लेकिन पार्टी के भीतर सभी मूल भाजपाइयों के सुर लगभग ऐसे ही हैं। सम्राट चौधरी आज मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे। भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में समझिए कैसे नीतीश ने बीजेपी की टॉप लीडरशिप को कड़ा मैसेज दिया। भाजपाइयों के भारी विरोध के बाद भी सम्राट कैसे पार्टी और सत्ता के शिखर पर पहुंचे… नीतीश ने क्यों लगाया वीटो? सम्राट चौधरी सीएम बनें। ये नीतीश कुमार भी चाहते थे। इसके सहारे नीतीश अपने वोटर्स को सीधा मैसेज दे गए कि सत्ता अपने परिवार में ट्रांसफर करने की जगह अपनी बिरादरी को ट्रांसफर किया। नीतीश के बाद अब उनके बेटे निशांत पॉलिटिक्स में आ गए हैं। नीतीश और उनकी कोर कमेटी के नेता इस बात को अच्छे से समझते हैं कि निशांत को एस्टेब्लिश करने के लिए उस कोर वोट बैंक का साथ बने रहना जरूरी है, जिनके सहारे अब तक पॉलिटिक्स करते आए हैं। अभी तक कुर्मी सीएम और कुशवाहा डिप्टी सीएम बनते आ रहे थे। अब कुशवाहा सीएम होंगे। अगर निशांत डिप्टी सीएम बनते हैं तो बात एक ही हो जाएगी। ऐसे में नीतीश के कोर वोट बैंक उनके साथ इंटैक्ट रहेंगे। जानिए, नीतीश ने क्या मैसेज दिया दरअसल, बिहार में नीतीश कुमार और बीजेपी के साथ हुई डील दिल्ली में बिगड़ने लगी थी। जदयू के राष्ट्रीय स्तर के एक नेता ने भास्कर को बताया कि 9 अप्रैल को नीतीश कुमार राज्यसभा की शपथ लेने दिल्ली गए थे। 10 अप्रैल को दिल्ली में उन्हें सम्राट की जगह दूसरे चेहरे पर भी विचार करने की बात कही गई। नीतीश नहीं माने, वे सम्राट पर अड़ गए। यही कारण है कि नीतीश को शपथ लेकर अगले दिन बिहार आना था, लेकिन वह 10 को ही लौट गए। जदयू सूत्रों की मानें तो जदयू और बीजेपी नेताओं की एक मीटिंग में नीतीश कुमार ने स्पष्ट मैसेज दिया कि सीएम की कुर्सी छोड़ रहे हैं, क्या ये बड़ी बात नहीं है। सम्राट चौधरी की तरफ से भी स्पष्ट कर दिया गया था कि वे टॉप लीडरशिप के फैसले के साथ रहेंगे। बाहरी-भीतरी के कारण पार्टी के भीतर टकराव रहा, शाह ने संभाला 5 मार्च को नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का फैसला लिया था। उस वक्त ही लगभग यह तय कर लिया गया था कि सम्राट उनके उत्तराधिकारी होंगे, लेकिन पार्टी के भीतर मूल भाजपाई इसे स्वीकार करने के लिए राजी नहीं हो रहे थे। मूल भाजपाई नेताओं की एक बड़ी टोली सम्राट चौधरी को सीएम बनने से रोकना चाहती थी। इसके लिए दिल्ली से लेकर पटना तक की लॉबिंग चली। सूत्रों की मानें तो केंद्र में एक मंत्री ने तो अपना पद छोड़ने तक का प्रस्ताव रख दिया था, लेकिन टॉप लीडरशिप ने उनकी सारी तर्कों को खारिज कर दिया। बीजेपी सूत्रों की मानें तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के फैसले के आगे स्टेट लीडरशिप को सरेंडर होना पड़ा। संघ में संघ के ही नेता ने सम्राट के लिए संभाला मोर्चा संघ के सूत्रों की मानें तो RSS बिहार में बीजेपी का पहला सीएम अपने स्वयंसेवक को बनाना चाहता था। संघ की तरफ से EBC लीडर को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया था। इसके लिए दीघा विधायक संजीव चौरसिया की बीजेपी के टॉप लीडरशिप के साथ मीटिंग भी हो गई थी, लेकिन संघ के ही एक धड़ा ने सम्राट के पक्ष में मोर्चा संभाला और उनके नाम को आगे किया। संघ के एक सूत्र ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि सम्राट चौधरी के बारे में संघ के भीतर दो अलग-अलग रिपोर्ट तैयार की गई थी। एक रिपोर्ट बिहार में बीजेपी के संगठन प्रभारी भीखू भाई दलसानिया ने भी बनाई थी। दलसानिया चाहते थे कि सम्राट को बिहार की कमान मिले और वे इसमें सफल रहे। अब 3 पॉइंट में समझिए, शाह ने सम्राट पर क्यों दाव लगाया 1- बिहार से यूपी को मैसेज, अखिलेश के PDA की काट , यूपी में यादव से ज्यादा कुर्मी विधायक बीजेपी के सामने अगला सबसे बड़ा टार्गेट यूपी का विधानसभा चुनाव है। यहां अखिलेश यादव अब यादव और मुस्लिम के अलावा गैर यादव ओबीसी को भी अपने पाले में लाने की कोशिश में जुटे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ उनका ये अभियान लोकसभा चुनाव में काफी हद तक सफल हुआ है। अगर आंकड़ों की देखें तो 2024 के लोकसभा चुनाव में कुर्मी जाति से बीजेपी से ज्यादा सपा से प्रत्याशी जीते। कुर्मी जाति से सपा के 7 तो बीजेपी के 3 सांसद हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में मामला इसके ठीक उलट था। ओबीसी समुदाय से सबसे ज्यादा कुर्मी विधायक चुने गए थे। जबकि वहां ओबीसी में उनकी आबादी यादव से कम है। यूपी में 41 कुर्मी विधायक जीते हैं। इनमें 27 बीजेपी गठबंधन से, 13 सपा गठबंधन और एक कांग्रेस पार्टी से जीते थे। गैर कुर्मी ओबीसी में बीजेपी ने बाजी मारी। भाजपा के 12 विधायक मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी जाति से हैं। वहीं, सपा गठबंधन से इन जातियों के दो उम्मीदवार ही जीते। यादव विधायक की कुल संख्या सदन में 27 है। इनमें 24 सपा और 3 बीजेपी के हैं। बीजेपी ने इस आंकड़े को देखते हुए चुनाव से एक साल पहले बिहार में सम्राट पर दांव लगाई है। 2- शाह ने भरोसा किया, पार्टी के हर टास्क को पूरा किया मौजूदा समय में बिहार में PM नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सबसे भरोसेमंद नेता सम्राट चौधरी हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनका टास्क मास्टर होना माना जाता है। टॉप लीडरशिप की तरफ से उन्हें जो भी टास्क मिला, उसे पूरा किया। सम्राट के तीन बड़े टास्क से इसे समझिए.. पहला- संगठन को नए सिरे से तैयार किया बिहार में अमित शाह के लिए सबसे टफ टास्क था पार्टी के कॉन्फिडेंस को हाई करना। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को जब पार्टी की कमान मिली तब बिहार BJP को नीतीश कुमार का पिछलग्गू कहा जाता था। पूरी पार्टी पर सुशील मोदी का एकछत्र राज था। इसे खत्म करने के लिए पार्टी ने कभी नित्यानंद राय तो कभी संजय जायसवाल जैसे नेता को कमान दी, लेकिन वे ऐसा करने में सफल नहीं रहे। इसके बाद ये जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को दी गई। उन्होंने इसे बखूबी निभाया और बिहार में BJP का संगठन नए सिरे से तैयार किया। दूसरा- लालू-नीतीश पर एक साथ हमले किए नीतीश कुमार ने 2022 में BJP का साथ छोड़ा और महागठबंधन का हिस्सा बन गए। ऐसे में सम्राट चौधरी ने न केवल लालू यादव के भ्रष्टाचार पर हमले किया, बल्कि नीतीश पर भी उसी आक्रामकता के साथ अटैक किए। अभी तक BJP के कोई नेता नीतीश के खिलाफ अग्रेशन नहीं दिखा पाते थे। सम्राट कई बार इस बात को दोहरा चुके हैं कि उन्होंने केवल पार्टी के निर्देश को फॉलो किया था। 2022 में नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने के प्रण के साथ सम्राट ने मुरेठा बांधा था। 3 जुलाई 2024 को उन्होंने अयोध्या में सरयू नदी में डुबकी लगाई और मुरेठा सिर से हटा दिया। कहा, ‘अयोध्या नगरी में आकर सरयू नदी में स्नान कर, ये मुरेठा जो मैंने 22-23 महीने से बांध रखा था, अब भगवान राम के चरणों में समर्पित करूंगा।’ सम्राट ने कहा- ‘हमारा कमिटमेंट नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने का था। यह संकल्प 28 जनवरी को पूरा हुआ। महागठबंधन से हटकर वो हमारे साथ आकर मुख्यमंत्री बने। हमने इसका स्वागत किया था। 28 जनवरी को बिहार में एनडीए की सरकार बनी।’ तीसरा- सरकार बनी तो नीतीश कुमार के साथ साए की तरह रहे नीतीश जब NDA में वापस आए तो सम्राट ने उनके साथ नंबर-2 की हैसियत से काम किया। उनके साथ साए की तरह मजबूती से खड़ा रहे। हर फैसले को सराहा। उनकी उपलब्धियां गिनाई। स्थिति ये बनी कि 2005 के बाद नीतीश कुमार ने पहली बार सम्राट के लिए गृह विभाग तक छोड़ दिया। 3- पार्टी से लेकर सरकार चलाने तक का अनुभव सम्राट चौधरी के पास न केवल संगठन बल्कि सरकार चलाने का भी अनुभव है। वह राबड़ी देवी, जीतन राम मांझी और नीतीश सरकार में मंत्री रहे हैं। इनके पास कृषि, पंचायती राज से लेकर वित्त और गृह विभाग में बतौर मंत्री काम करने का अनुभव है। दो बार से लगातार डिप्टी CM हैं। सरकार के साथ-साथ वे विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा चुके हैं। वहीं, संगठन की बात करें तो पार्टी के भीतर सचिव, उपाध्यक्ष लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक रह चुके हैं। ‘वर्षों बरस तक जमीन पर मेहनत किए, पसीना बहाए, लहू बहाए, बलिदान दिए, आज कमल खिलाने का अवसर आया। भाजपा का सिपाही होने के नाते अपने कमांडर के आदेश के अनुसार गठबंधन की राजनीति को लेकर चलने के लिए हमने सम्राट चौधरी जी का प्रस्ताव दिया।’ बिहार के डिप्टी सीएम रहे विजय सिन्हा ने ये बातें सम्राट चौधरी के विधायक दल के नेता चुने जाने के तुरंत बाद कहीं। ये बयान भले विजय सिन्हा ने दिया हो, लेकिन पार्टी के भीतर सभी मूल भाजपाइयों के सुर लगभग ऐसे ही हैं। सम्राट चौधरी आज मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे। भास्कर की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में समझिए कैसे नीतीश ने बीजेपी की टॉप लीडरशिप को कड़ा मैसेज दिया। भाजपाइयों के भारी विरोध के बाद भी सम्राट कैसे पार्टी और सत्ता के शिखर पर पहुंचे… नीतीश ने क्यों लगाया वीटो? सम्राट चौधरी सीएम बनें। ये नीतीश कुमार भी चाहते थे। इसके सहारे नीतीश अपने वोटर्स को सीधा मैसेज दे गए कि सत्ता अपने परिवार में ट्रांसफर करने की जगह अपनी बिरादरी को ट्रांसफर किया। नीतीश के बाद अब उनके बेटे निशांत पॉलिटिक्स में आ गए हैं। नीतीश और उनकी कोर कमेटी के नेता इस बात को अच्छे से समझते हैं कि निशांत को एस्टेब्लिश करने के लिए उस कोर वोट बैंक का साथ बने रहना जरूरी है, जिनके सहारे अब तक पॉलिटिक्स करते आए हैं। अभी तक कुर्मी सीएम और कुशवाहा डिप्टी सीएम बनते आ रहे थे। अब कुशवाहा सीएम होंगे। अगर निशांत डिप्टी सीएम बनते हैं तो बात एक ही हो जाएगी। ऐसे में नीतीश के कोर वोट बैंक उनके साथ इंटैक्ट रहेंगे। जानिए, नीतीश ने क्या मैसेज दिया दरअसल, बिहार में नीतीश कुमार और बीजेपी के साथ हुई डील दिल्ली में बिगड़ने लगी थी। जदयू के राष्ट्रीय स्तर के एक नेता ने भास्कर को बताया कि 9 अप्रैल को नीतीश कुमार राज्यसभा की शपथ लेने दिल्ली गए थे। 10 अप्रैल को दिल्ली में उन्हें सम्राट की जगह दूसरे चेहरे पर भी विचार करने की बात कही गई। नीतीश नहीं माने, वे सम्राट पर अड़ गए। यही कारण है कि नीतीश को शपथ लेकर अगले दिन बिहार आना था, लेकिन वह 10 को ही लौट गए। जदयू सूत्रों की मानें तो जदयू और बीजेपी नेताओं की एक मीटिंग में नीतीश कुमार ने स्पष्ट मैसेज दिया कि सीएम की कुर्सी छोड़ रहे हैं, क्या ये बड़ी बात नहीं है। सम्राट चौधरी की तरफ से भी स्पष्ट कर दिया गया था कि वे टॉप लीडरशिप के फैसले के साथ रहेंगे। बाहरी-भीतरी के कारण पार्टी के भीतर टकराव रहा, शाह ने संभाला 5 मार्च को नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का फैसला लिया था। उस वक्त ही लगभग यह तय कर लिया गया था कि सम्राट उनके उत्तराधिकारी होंगे, लेकिन पार्टी के भीतर मूल भाजपाई इसे स्वीकार करने के लिए राजी नहीं हो रहे थे। मूल भाजपाई नेताओं की एक बड़ी टोली सम्राट चौधरी को सीएम बनने से रोकना चाहती थी। इसके लिए दिल्ली से लेकर पटना तक की लॉबिंग चली। सूत्रों की मानें तो केंद्र में एक मंत्री ने तो अपना पद छोड़ने तक का प्रस्ताव रख दिया था, लेकिन टॉप लीडरशिप ने उनकी सारी तर्कों को खारिज कर दिया। बीजेपी सूत्रों की मानें तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के फैसले के आगे स्टेट लीडरशिप को सरेंडर होना पड़ा। संघ में संघ के ही नेता ने सम्राट के लिए संभाला मोर्चा संघ के सूत्रों की मानें तो RSS बिहार में बीजेपी का पहला सीएम अपने स्वयंसेवक को बनाना चाहता था। संघ की तरफ से EBC लीडर को आगे बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया था। इसके लिए दीघा विधायक संजीव चौरसिया की बीजेपी के टॉप लीडरशिप के साथ मीटिंग भी हो गई थी, लेकिन संघ के ही एक धड़ा ने सम्राट के पक्ष में मोर्चा संभाला और उनके नाम को आगे किया। संघ के एक सूत्र ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि सम्राट चौधरी के बारे में संघ के भीतर दो अलग-अलग रिपोर्ट तैयार की गई थी। एक रिपोर्ट बिहार में बीजेपी के संगठन प्रभारी भीखू भाई दलसानिया ने भी बनाई थी। दलसानिया चाहते थे कि सम्राट को बिहार की कमान मिले और वे इसमें सफल रहे। अब 3 पॉइंट में समझिए, शाह ने सम्राट पर क्यों दाव लगाया 1- बिहार से यूपी को मैसेज, अखिलेश के PDA की काट , यूपी में यादव से ज्यादा कुर्मी विधायक बीजेपी के सामने अगला सबसे बड़ा टार्गेट यूपी का विधानसभा चुनाव है। यहां अखिलेश यादव अब यादव और मुस्लिम के अलावा गैर यादव ओबीसी को भी अपने पाले में लाने की कोशिश में जुटे हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ उनका ये अभियान लोकसभा चुनाव में काफी हद तक सफल हुआ है। अगर आंकड़ों की देखें तो 2024 के लोकसभा चुनाव में कुर्मी जाति से बीजेपी से ज्यादा सपा से प्रत्याशी जीते। कुर्मी जाति से सपा के 7 तो बीजेपी के 3 सांसद हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में मामला इसके ठीक उलट था। ओबीसी समुदाय से सबसे ज्यादा कुर्मी विधायक चुने गए थे। जबकि वहां ओबीसी में उनकी आबादी यादव से कम है। यूपी में 41 कुर्मी विधायक जीते हैं। इनमें 27 बीजेपी गठबंधन से, 13 सपा गठबंधन और एक कांग्रेस पार्टी से जीते थे। गैर कुर्मी ओबीसी में बीजेपी ने बाजी मारी। भाजपा के 12 विधायक मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी जाति से हैं। वहीं, सपा गठबंधन से इन जातियों के दो उम्मीदवार ही जीते। यादव विधायक की कुल संख्या सदन में 27 है। इनमें 24 सपा और 3 बीजेपी के हैं। बीजेपी ने इस आंकड़े को देखते हुए चुनाव से एक साल पहले बिहार में सम्राट पर दांव लगाई है। 2- शाह ने भरोसा किया, पार्टी के हर टास्क को पूरा किया मौजूदा समय में बिहार में PM नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सबसे भरोसेमंद नेता सम्राट चौधरी हैं। इसका सबसे बड़ा कारण उनका टास्क मास्टर होना माना जाता है। टॉप लीडरशिप की तरफ से उन्हें जो भी टास्क मिला, उसे पूरा किया। सम्राट के तीन बड़े टास्क से इसे समझिए.. पहला- संगठन को नए सिरे से तैयार किया बिहार में अमित शाह के लिए सबसे टफ टास्क था पार्टी के कॉन्फिडेंस को हाई करना। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को जब पार्टी की कमान मिली तब बिहार BJP को नीतीश कुमार का पिछलग्गू कहा जाता था। पूरी पार्टी पर सुशील मोदी का एकछत्र राज था। इसे खत्म करने के लिए पार्टी ने कभी नित्यानंद राय तो कभी संजय जायसवाल जैसे नेता को कमान दी, लेकिन वे ऐसा करने में सफल नहीं रहे। इसके बाद ये जिम्मेदारी सम्राट चौधरी को दी गई। उन्होंने इसे बखूबी निभाया और बिहार में BJP का संगठन नए सिरे से तैयार किया। दूसरा- लालू-नीतीश पर एक साथ हमले किए नीतीश कुमार ने 2022 में BJP का साथ छोड़ा और महागठबंधन का हिस्सा बन गए। ऐसे में सम्राट चौधरी ने न केवल लालू यादव के भ्रष्टाचार पर हमले किया, बल्कि नीतीश पर भी उसी आक्रामकता के साथ अटैक किए। अभी तक BJP के कोई नेता नीतीश के खिलाफ अग्रेशन नहीं दिखा पाते थे। सम्राट कई बार इस बात को दोहरा चुके हैं कि उन्होंने केवल पार्टी के निर्देश को फॉलो किया था। 2022 में नीतीश कुमार को सत्ता से हटाने के प्रण के साथ सम्राट ने मुरेठा बांधा था। 3 जुलाई 2024 को उन्होंने अयोध्या में सरयू नदी में डुबकी लगाई और मुरेठा सिर से हटा दिया। कहा, ‘अयोध्या नगरी में आकर सरयू नदी में स्नान कर, ये मुरेठा जो मैंने 22-23 महीने से बांध रखा था, अब भगवान राम के चरणों में समर्पित करूंगा।’ सम्राट ने कहा- ‘हमारा कमिटमेंट नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाने का था। यह संकल्प 28 जनवरी को पूरा हुआ। महागठबंधन से हटकर वो हमारे साथ आकर मुख्यमंत्री बने। हमने इसका स्वागत किया था। 28 जनवरी को बिहार में एनडीए की सरकार बनी।’ तीसरा- सरकार बनी तो नीतीश कुमार के साथ साए की तरह रहे नीतीश जब NDA में वापस आए तो सम्राट ने उनके साथ नंबर-2 की हैसियत से काम किया। उनके साथ साए की तरह मजबूती से खड़ा रहे। हर फैसले को सराहा। उनकी उपलब्धियां गिनाई। स्थिति ये बनी कि 2005 के बाद नीतीश कुमार ने पहली बार सम्राट के लिए गृह विभाग तक छोड़ दिया। 3- पार्टी से लेकर सरकार चलाने तक का अनुभव सम्राट चौधरी के पास न केवल संगठन बल्कि सरकार चलाने का भी अनुभव है। वह राबड़ी देवी, जीतन राम मांझी और नीतीश सरकार में मंत्री रहे हैं। इनके पास कृषि, पंचायती राज से लेकर वित्त और गृह विभाग में बतौर मंत्री काम करने का अनुभव है। दो बार से लगातार डिप्टी CM हैं। सरकार के साथ-साथ वे विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभा चुके हैं। वहीं, संगठन की बात करें तो पार्टी के भीतर सचिव, उपाध्यक्ष लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक रह चुके हैं।  

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