भाजपा का नितिन नवीन फॉर्मूला बंगाल में काम कर गया। 15 साल का ममता राज खत्म हो गया और भाजपा पहली बार सरकार बनाने जा रही है। नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के पीछे मोदी-शाह की बंगाल चुनाव को लेकर एक सोची-समझी रणनीति मानी गई थी। आज जब रिजल्ट आया तो यह फैसला सही साबित हुआ। नितिन नवीन ने बंगाल में भाजपा की पकड़ मजबूत करने में कई स्तरों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इलेक्शन एक्सप्लेनर में पढ़िए, भाजपा का नवीन फॉर्मूला बंगाल में कैसे हिट रहा। 1. नितिन के सहारे भाजपा ने ‘भद्रलोक’ को साधा नितिन नवीन कायस्थ समुदाय से आते हैं। बंगाल में इस समाज की 3% आबादी है, लेकिन इनका प्रभाव शहरी क्षेत्रों (विशेषकर कोलकाता और हावड़ा) की लगभग 40-50 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव है। बंगाल की राजनीति और संस्कृति में कायस्थों का ऐतिहासिक रूप से बड़ा प्रभाव रहा है (जैसे विधान चंद्र राय और ज्योति बसु)। भाजपा का मानना था कि नवीन के जरिए वे बंगाल के उस ‘भद्रलोक’ और सवर्ण समाज को साध सकते हैं, जो ममता बनर्जी से नाराज चल रहा था। 2. ‘हिंदी भाषी’ और ‘बिहारी’ वोटरों को एकजुट किया बंगाल चुनाव में ‘हिंदी भाषी बनाम बंगाली’ की जो बहस तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने छेड़ी थी, उसे काटने में नितिन नवीन की भूमिका महत्वपूर्ण रही। बंगाल के औद्योगिक क्षेत्रों (जैसे आसनसोल, दुर्गापुर, बैरकपुर और हावड़ा) में बिहार और उत्तर प्रदेश से आए मतदाताओं की भारी संख्या है। नितिन नवीन बिहार से आते हैं, जिससे वे इन मतदाताओं के साथ ‘रूट लेवल कनेक्टिविटी’ बनाने में सफल रहे। उन्होंने खुद को केवल एक ‘बिहारी नेता’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जो बंगाली संस्कृति और भाषा की बारीकियों को समझता है। इससे भाषाई ध्रुवीकरण की धार कम हुई। 3. संगठन को सक्रिय कर बूथ लेवल तक मैनेजमेंट ठीक किया 2021 के विधानसभा चुनावों में नितिन नवीन ने सह-प्रभारी के रूप में जमीनी स्तर पर काम किया था। इस अनुभव ने उन्हें कुछ प्रमुख ‘फैक्ट्स’ पर पकड़ बनाने में मदद की। नवीन ने 2021 की हार के कारणों का विश्लेषण कर ‘कमजोर बूथों’ की पहचान की। उन्होंने माइक्रो-मैनेजमेंट के जरिए उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जहां भाजपा की पकड़ 2021 में ढीली पड़ गई थी। भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय स्तर के पदों पर रहने के कारण नवीन के पास बंगाल के युवा कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का अनुभव था, जो TMC के ‘मसल पावर’ का मुकाबला करने के लिए आवश्यक था। बूथ से जिले तक का माइक्रो-मैनेजमेंट 4. कोर कैडर में भरोसा जगाया, ग्राउंड तक पहुंचे नितिन नवीन के RSS के साथ तालमेल ने बंगाल में भाजपा के लिए ‘सुरक्षा कवच’ की तरह काम किया। उन्होंने संघ की ‘मैन-मेकिंग’ प्रक्रिया को चुनावी ‘मशीनरी’ में तब्दील कर दिया, जिससे भाजपा का वह पारंपरिक कार्यकर्ता भी सक्रिय हो गया जो केवल चुनावी शोर में नहीं, बल्कि वैचारिक लड़ाई में विश्वास रखता था। संघ की पृष्ठभूमि के कारण नितिन नवीन को भाजपा के भीतर एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो संगठन सर्वोपरि के सिद्धांत पर चलता है। बंगाल जैसे राज्य में जहां गुटबाजी बड़ी चुनौती रही है, उनका यह अनुशासन कैडर को एक सूत्र में पिरोने में सहायक रहा। 15 दिन तक बंगाल में रहे शाह भाजपा का नितिन नवीन फॉर्मूला बंगाल में काम कर गया। 15 साल का ममता राज खत्म हो गया और भाजपा पहली बार सरकार बनाने जा रही है। नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के पीछे मोदी-शाह की बंगाल चुनाव को लेकर एक सोची-समझी रणनीति मानी गई थी। आज जब रिजल्ट आया तो यह फैसला सही साबित हुआ। नितिन नवीन ने बंगाल में भाजपा की पकड़ मजबूत करने में कई स्तरों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इलेक्शन एक्सप्लेनर में पढ़िए, भाजपा का नवीन फॉर्मूला बंगाल में कैसे हिट रहा। 1. नितिन के सहारे भाजपा ने ‘भद्रलोक’ को साधा नितिन नवीन कायस्थ समुदाय से आते हैं। बंगाल में इस समाज की 3% आबादी है, लेकिन इनका प्रभाव शहरी क्षेत्रों (विशेषकर कोलकाता और हावड़ा) की लगभग 40-50 विधानसभा सीटों पर सीधा प्रभाव है। बंगाल की राजनीति और संस्कृति में कायस्थों का ऐतिहासिक रूप से बड़ा प्रभाव रहा है (जैसे विधान चंद्र राय और ज्योति बसु)। भाजपा का मानना था कि नवीन के जरिए वे बंगाल के उस ‘भद्रलोक’ और सवर्ण समाज को साध सकते हैं, जो ममता बनर्जी से नाराज चल रहा था। 2. ‘हिंदी भाषी’ और ‘बिहारी’ वोटरों को एकजुट किया बंगाल चुनाव में ‘हिंदी भाषी बनाम बंगाली’ की जो बहस तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने छेड़ी थी, उसे काटने में नितिन नवीन की भूमिका महत्वपूर्ण रही। बंगाल के औद्योगिक क्षेत्रों (जैसे आसनसोल, दुर्गापुर, बैरकपुर और हावड़ा) में बिहार और उत्तर प्रदेश से आए मतदाताओं की भारी संख्या है। नितिन नवीन बिहार से आते हैं, जिससे वे इन मतदाताओं के साथ ‘रूट लेवल कनेक्टिविटी’ बनाने में सफल रहे। उन्होंने खुद को केवल एक ‘बिहारी नेता’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जो बंगाली संस्कृति और भाषा की बारीकियों को समझता है। इससे भाषाई ध्रुवीकरण की धार कम हुई। 3. संगठन को सक्रिय कर बूथ लेवल तक मैनेजमेंट ठीक किया 2021 के विधानसभा चुनावों में नितिन नवीन ने सह-प्रभारी के रूप में जमीनी स्तर पर काम किया था। इस अनुभव ने उन्हें कुछ प्रमुख ‘फैक्ट्स’ पर पकड़ बनाने में मदद की। नवीन ने 2021 की हार के कारणों का विश्लेषण कर ‘कमजोर बूथों’ की पहचान की। उन्होंने माइक्रो-मैनेजमेंट के जरिए उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जहां भाजपा की पकड़ 2021 में ढीली पड़ गई थी। भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय स्तर के पदों पर रहने के कारण नवीन के पास बंगाल के युवा कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का अनुभव था, जो TMC के ‘मसल पावर’ का मुकाबला करने के लिए आवश्यक था। बूथ से जिले तक का माइक्रो-मैनेजमेंट 4. कोर कैडर में भरोसा जगाया, ग्राउंड तक पहुंचे नितिन नवीन के RSS के साथ तालमेल ने बंगाल में भाजपा के लिए ‘सुरक्षा कवच’ की तरह काम किया। उन्होंने संघ की ‘मैन-मेकिंग’ प्रक्रिया को चुनावी ‘मशीनरी’ में तब्दील कर दिया, जिससे भाजपा का वह पारंपरिक कार्यकर्ता भी सक्रिय हो गया जो केवल चुनावी शोर में नहीं, बल्कि वैचारिक लड़ाई में विश्वास रखता था। संघ की पृष्ठभूमि के कारण नितिन नवीन को भाजपा के भीतर एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो संगठन सर्वोपरि के सिद्धांत पर चलता है। बंगाल जैसे राज्य में जहां गुटबाजी बड़ी चुनौती रही है, उनका यह अनुशासन कैडर को एक सूत्र में पिरोने में सहायक रहा। 15 दिन तक बंगाल में रहे शाह


