भारत में विदेशी निवेश को लेकर इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिला हैं। मौजूद जानकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिका भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश बन गया हैं। अमेरिका ने इस मामले में मॉरीशस को पीछे छोड़ दिया हैं, जबकि सिंगापुर अब भी पहले स्थान पर बना हुआ हैं।
बता दें कि पिछले कुछ वर्षों में ज्यादातर अमेरिकी कंपनियां मॉरीशस जैसे टैक्स में राहत देने वाले देशों के जरिए भारत में निवेश करती थीं, लेकिन अब कंपनियां सीधे भारत में पैसा लगा रही हैं। इसी वजह से अमेरिकी निवेश में बड़ी तेजी दर्ज की गई हैं।
आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका से भारत में इक्विटी निवेश दोगुना से ज्यादा बढ़कर 11 अरब डॉलर के पार पहुंच गया हैं। वहीं सिंगापुर से भी निवेश में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिली हैं और कुल विदेशी निवेश का करीब एक तिहाई हिस्सा वहीं से आया है।
गौरतलब है कि भारत और मॉरीशस के बीच टैक्स समझौते में बदलाव के बाद निवेशकों का रुख धीरे-धीरे सिंगापुर और सीधे निवेश की तरफ बढ़ा हैं। हालांकि टैक्स राहत वाले देशों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं हुआ हैं। केमैन आइलैंड्स से भी निवेश में अचानक बड़ा उछाल देखने को मिला हैं। वहां से निवेश बढ़कर 37 करोड़ डॉलर से करीब 2.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया हैं। अधिकारियों का मानना है कि यह कुछ बड़े सौदों की वजह से हुआ है।
विदेशी निवेश के क्षेत्रों में भी इस बार बदलाव देखने को मिला हैं। पिछले वित्त वर्ष में कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर क्षेत्र सबसे ज्यादा निवेश आकर्षित करने वाला सेक्टर बनकर सामने आया हैं। इसने सेवा क्षेत्र को पीछे छोड़ दिया हैं। माना जा रहा है कि देश में तेजी से बढ़ रहे डाटा सेंटर कारोबार की वजह से इस क्षेत्र में निवेश बढ़ा है।
इसके अलावा खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में भी पांच गुना से ज्यादा निवेश बढ़ा हैं। वहीं समुद्री परिवहन और जहाज से जुड़े कारोबार में करीब 30 गुना तक निवेश बढ़ने की जानकारी सामने आई हैं। इस क्षेत्र में लगभग 2 अरब डॉलर का निवेश हुआ है।
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा था कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिकी कंपनियों ने भारत में करीब 60 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता दिखाई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार निवेश बढ़ाने के लिए लगातार नई योजनाओं और प्रस्तावों पर काम कर रही है।
पीयूष गोयल के मुताबिक भारत उन क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा हैं जहां आपूर्ति श्रृंखला कुछ चुनिंदा देशों पर ज्यादा निर्भर हैं। सरकार का फोकस अब ऐसी नीतियां बनाने पर है जिससे विदेशी कंपनियों को भारत में कारोबार करना और आसान हो सके है।


