रगों में तीरंदाजी-सिस्टम ने तोड़ी कमान:मेवाड़ को दो दशक से एक भी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी नहीं मिला, मैदान तक छीनने की तैयारी

रगों में तीरंदाजी-सिस्टम ने तोड़ी कमान:मेवाड़ को दो दशक से एक भी अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी नहीं मिला, मैदान तक छीनने की तैयारी

मेवाड़-वागड़ के जनजाति अंचल में तीरंदाजी किसी के सिखाने से नहीं, बल्कि विरासत से आती है। इसी माटी ने देश को लिंबाराम और धूलचंद डामोर जैसे ओलंपिक स्तर के बड़े तीरंदाज दिए। लेकिन हकीकत यह है कि बीते दो दशक से इस क्षेत्र ने देश को एक भी अंतरराष्ट्रीय या बड़ा राष्ट्रीय खिलाड़ी नहीं दिया है। वजह सिस्टम की लापरवाही और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। उदयपुर में राजस्थान क्रीड़ा परिषद के माध्यम से 2016-17 से संचालित 15 बच्चों की बालक तीरंदाजी एकेडमी आज बदहाली पर आंसू बहा रही है। हैरान करने वाली बात ये कि महाराणा प्रताप खेलगांव, जहां ये बच्चे अभ्यास करते हैं, में अब अधिकारी तीरंदाजी के मैदान को ही छोटा कर 50 मीटर की शूटिंग राइफल रेंज बनाना चाहते हैं। गनीमत है कि इस बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोलकर इस खेल-विरोधी प्रक्रिया को फिलहाल रोक रखा है। 3 लाख के आधुनिक सेट के बजाय लकड़ी के तीर-कमान से निशाना आज दुनिया के तीरंदाज लाखों रुपए के फाइबर ग्लास और विदेशी उपकरणों से सटीक निशाना लगा रहे हैं, वहीं हमारी एकेडमी के होनहारों को लकड़ी के स्थानीय तीर-कमान थमाए गए हैं। जनजातीय विकास विभाग ने फाइबर ग्लास के विदेशी उपकरण खरीदे तो थे, लेकिन अब खत्म हो चुके हैं। एक पूरा रिकर्व या कंपाउंड सेट 3 लाख का आता है। कार्बन के जो तीर खरीदे थे, उनमें से अधिकांश टूट चुके हैं। लकड़ी के कमान से बच्चे नेशनल तक तो पहुंच जाते हैं, लेकिन वर्ल्ड स्कूल गेम्स या अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में आधुनिक उपकरणों के बिना उनका हाथ नहीं बैठता। किराये के मकान में भविष्य क्रीड़ा परिषद के पास बच्चों के रहने के लिए खुद का आवासीय भवन तक नहीं है। 17 वर्ष तक के इन खिलाड़ियों को किराये के मकान में रखा जा रहा है। खेलगांव में 100 छात्रों की क्षमता का खेल छात्रावास विशेष रूप से तीरंदाजी के लिए बना था, लेकिन इसका पूरा लाभ इन खिलाड़ियों को नहीं मिल रहा। उदयपुर एकेडमी के पास न स्थायी कोच, न रिकर्व सेट राज्य से आगे नहीं बढ़ पा रही प्रतिभाएं: खेल अकादमियों के वर्ष 2024-25 के आधिकारिक रिकॉर्ड और खिलाड़ी उपलब्धि विवरण (मई 2026) की समीक्षा करें तो हमारी प्रतिभाओं की लाचारी साफ दिखती है। एकेडमी के अधिकांश खिलाड़ी स्टेट लेवल पर सिर्फ हिस्सा लेकर (भाग लिया) लौट रहे हैं। भास्कर ने ऐसे ही कुछ चेहरों को तलाशा। महज एक खिलाड़ी ऐसा मिला, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्थान पाया है। विश्व में स्वर्णिम था हमारा इतिहास दर्द और दलीलें “खिलाड़ियों को पूरे साधन नहीं मिल रहे थे। टीएडी मद से जो बजट मिलता था, वह पूरा नहीं हो पाता था। अब सरकार पंच गौरव योजना लाई है।”
-धनेश्वर मईड़ा, अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी और बांसवाड़ा में मौजूदा कोच “हम उपकरणों के लिहाज से फिलहाल बाकी अकादमियों से पीछे हैं। जो भी कमियां हैं, उन्हें उच्च स्तर पर दूर कर अच्छे खिलाड़ी आगे लाने का प्रयास किया जा रहा है।”
-गिरधारी सिंह चौहान, तीरंदाजी एकेडमी कोच और पूर्व जिला खेल अधिकारी “हम लगातार प्रयासों में लगे हैं कि खेलगांव और एकेडमी में बेहतर स्थितियां फिर से लौटें, ताकि पिछले 20 साल से अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों का जो टोटा चल रहा है, उसे खत्म किया जा सके।”
-डॉ. महेश पालीवाल, जिला खेल अधिकारी, उदयपुर

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