प्रदेश में 2003 के बाद बने बिजली संकट के बाद इससे उबरने के लिए सरकार द्वारा पॉवर जनरेशन करने वाली कम्पनियों ने मनमानी समझौते किए जा रहे थे। इसके चलते बिजली सप्लाई और डिमांड की स्थिति तो सुधरी, लेकिन कई ऐसे समझौते भी हुए जो सरकार के लिए फजीहत की वजह भी बने। स्थिति यह है कि वर्तमान में बिजली खरीद के लिए राज्य सरकार की पॉवर मैनेजमेंट कम्पनी ने 1795 बिजली खरीद समझौते (पॉवर परचेजिंग एग्रीमेंट) कर रखे हैं। इसलिए अब सरकार ने तय किया है कि कैबिनेट की मंजूरी के बिना अब कोई भी पॉवर परचेजिंग एग्रीमेंट नहीं किया जाएगा। राज्य सरकार इस समय बिजली के मामले में सरप्लस स्टेट में शामिल है। यहां सोलर एनर्जी ने सरकार की एनर्जी सेक्टर में मजबूती बढ़ाई है। इसे देखते हुए मध्यप्रदेश पॉवर मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड ने निर्णय लिया है कि नए लांग टर्म और मिड टर्म बिजली खरीद समझौते (PPA) और बिजली आपूर्ति समझौते (PSA) मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में होने वाली कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही लागू किये जा सकेंगे। अब तक समझौते कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा अनुमोदित किए जाते थे, लेकिन अब सभी नए समझौतों के लिए कैबिनेट स्तर की मंजूरी लेना जरूरी होगा। बताया जाता है कि ऊर्जा विभाग और राज्य सरकार पहले से लगभग 1,795 छोटे, बड़े एवं लघु तथा लांग टर्म के बिजली खरीद समझौते कर चुका है। इसके चलते 26,012 मेगावाट की क्षमता के फलस्वरूप वर्तमान में प्रदेश में निर्बाध विद्युत सप्लाई पावर जनरेटिंग कम्पनी कर रही है। साथ ही मध्यप्रदेश एनर्जी सरप्लस राज्य के रूप में कार्य कर रहा है। इसलिए बदल रहे पॉलिसी पहले ऊर्जा मंत्री का लेंगे अनुमोदन, फिर कैबिनेट में लाएंगे प्रस्ताव अपर मुख्य सचिव ऊर्जानीरज मंडलोई ने बताया कि बोर्ड ने गहन विचार-विमर्श के बाद वर्तमान ऊर्जा की उपलब्धता और राज्य की ऊर्जा आवश्यकताओं की वर्तमान एवं भविष्य की व्यवस्था को देखते हुए यह निर्णय लिया है। उन्होंने यह भी बताया कि बोर्ड का यह प्रस्ताव ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर के समक्ष रखा जाएगा। उसके बाद मुख्य सचिव के माध्यम से मुख्यमंत्री की अनुमति प्राप्त करने के लिए भेजा जाएगा।


