आगरा में अनुपम खेर ने सुनाया संघर्षों का सफर:“कुछ भी हो सकता है” के 501वें मंचन में दर्शकों संग साझा किए जीवन अनुभव

आगरा में अनुपम खेर ने सुनाया संघर्षों का सफर:“कुछ भी हो सकता है” के 501वें मंचन में दर्शकों संग साझा किए जीवन अनुभव

अभिनेता अनुपम खेर ने आगरा में अपने चर्चित शो “कुछ भी हो सकता है” के 501वें मंचन में संघर्ष, असफलता और सफलता के किस्से साझा कर दर्शकों को भावुक कर दिया। करीब दो घंटे तक चले शो में उन्होंने थिएटर से बॉलीवुड तक के सफर को हास्य, संवेदनाओं और प्रेरक प्रसंगों के जरिए प्रस्तुत किया। सूरसदन प्रेक्षागृह में स्पाइसी शुगर संस्था की ओर से आयोजित एकल नाट्य प्रस्तुति “कुछ भी हो सकता है” में अभिनेता अनुपम खेर ने अपने जीवन के संघर्षों और सफलताओं को दर्शकों के सामने बेहद सहज अंदाज में रखा। कार्यक्रम में शहर के प्रबुद्ध नागरिकों, कला प्रेमियों और विभिन्न क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियों की बड़ी मौजूदगी रही। कार्यक्रम की शुरुआत अलग अंदाज में हुई। जैसे ही प्रेक्षागृह की लाइट बंद हुई, अनुपम खेर अचानक दर्शकों के बीच से मंच तक पहुंचे। मंच पर आते ही उन्होंने कहा, “आगरा के सारे गुड लुकिंग लोग आ गए।” उनके इस संवाद पर पूरा सभागार तालियों और ठहाकों से गूंज उठा। शो के दौरान उन्होंने दर्शकों से सीधे संवाद बनाए रखा और कई बार हास्य के जरिए माहौल को हल्का भी किया। उन्होंने बताया कि 21 वर्ष पहले शुरू हुए इस शो का यह 501वां मंचन है। साथ ही 25 मई को उनके फिल्मी करियर के भी 42 वर्ष पूरे हुए। उन्होंने अपने बचपन, स्कूल जीवन, पहले प्यार और एक्टिंग सीखने के संघर्षों का जिक्र करते हुए कहा कि अभिनय स्कूल में प्रवेश पाने के लिए उन्होंने महिला पात्र की एक्टिंग की थी। घर से निकलते समय मां के मंदिर से 100 रुपये लेने की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि वही हिम्मत उनके संघर्ष का आधार बनी। अनुपम खेर ने बताया कि 27 जुलाई 1974 को वह शिमला छोड़कर थिएटर सीखने निकले थे। शुरुआती दिनों में उन्हें कहा गया कि उन्हें स्टेज पर चलना तक नहीं आता, लेकिन लगातार मेहनत के बाद उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा और थिएटर के दिनों को याद करते हुए उन्होंने अपने संघर्षों को विस्तार से साझा किया। उन्होंने कहा कि मुंबई पहुंचने के बाद महीनों तक संघर्ष करना पड़ा। फिल्म “गांधी” में नेहरू की भूमिका मिलने के बाद भी उनसे वह रोल छिन गया था। आर्थिक तंगी और असफलताओं के बीच उन्होंने हार नहीं मानी। बाद में फिल्म “सारांश” में 28 वर्ष की उम्र में 65 वर्षीय वृद्ध का किरदार निभाने का मौका मिला। इसके लिए उन्होंने सिर मुंडवाया और महीनों तैयारी की। यही फिल्म उनके करियर का टर्निंग पॉइंट बनी। उन्होंने बताया कि सफलता मिलने के बाद उन्होंने एक सप्ताह में 57 फिल्में साइन कर ली थीं। इस दौरान उनमें घमंड भी आ गया था, लेकिन Amitabh Bachchan की सादगी ने उन्हें फिर जमीन से जोड़ा। कार्यक्रम में उन्होंने Dilip Kumar, Sanjeev Kumar, Satish Kaushik और अपने दादाजी को भी याद किया। उन्होंने अपने जीवन के कठिन दौर का जिक्र करते हुए बताया कि लगातार काम करने से उनके चेहरे पर असर पड़ गया था और लंबे समय तक इलाज चला। इसके बाद विशेष बच्चों के साथ बिताए अनुभवों ने उन्हें जिंदगी को नए नजरिए से देखने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि उन बच्चों की मुस्कान ने उन्हें सबसे ज्यादा सकारात्मक ऊर्जा दी। अपने प्रोडक्शन हाउस, कर्ज और असफलताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जिंदगी में ऐसे समय भी आते हैं जब सारे रास्ते बंद नजर आते हैं, लेकिन समय हमेशा बदलता है। बाद में निर्देशन, अभिनय और नए प्रोजेक्ट्स के जरिए उन्होंने खुद को दोबारा स्थापित किया। पूरे शो के दौरान उन्होंने बार-बार यही संदेश दिया कि “लाइफ में कुछ भी हो सकता है।” उन्होंने कहा कि अगर एक साधारण इंसान देश को आजादी दिला सकता है तो कोई भी व्यक्ति अपने सपनों को पूरा कर सकता है। कार्यक्रम में डीआईजी शैलेश पांडे, वाईके गुप्ता, मधु बघेल, शलभ गुप्ता समेत शहर की कई प्रमुख हस्तियां मौजूद रहीं।

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