आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी बेचने के केंद्र सरकार के फैसले को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। शुक्रवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली पिछली सरकारों पर बैंकों के कामकाज में राजनीतिक दखल देने और कर्ज बांटने में नियमों की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जब एनडीए सरकार सत्ता में आई थी, तब आईडीबीआई बैंक की हालत काफी खराब थी।
कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की ओर से बैंक की प्रस्तावित बिक्री का विरोध किए जाने के बाद वित्त मंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपनी बात रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस की सरकारों ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों को निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया। बैंक कर्मचारियों पर राजनीतिक पसंद के आधार पर कर्ज देने का दबाव बनाया गया और कई मामलों में कर्ज देने के तय नियमों को नजरअंदाज किया गया।
निर्मला सीतारमण ने अपने आरोपों के समर्थन में कई पुराने मामलों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि 1957 में कांग्रेस नेताओं के प्रभाव के चलते हरिदास मूंदड़ा को भारतीय जीवन बीमा निगम से पैसा मिला था। 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष आरके तलवार को पद से हटा दिया था। वित्त मंत्री के मुताबिक, तलवार ने संजय गांधी के करीबी लोगों से जुड़ी एक कंपनी को कर्ज देने के नियमों में ढील देने के राजनीतिक दबाव को मानने से इनकार किया था।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संजय गांधी ने मारुति के लिए कर्ज दिलाने के मामले में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पर दबाव बनाया था। इसके अलावा, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकारों में वित्त राज्य मंत्री रहे बी. जनार्दन पुजारी पर 1980 के दशक में बैंक कर्मचारियों से कर्ज जारी करवाने का दबाव बनाने का आरोप लगाया। निर्मला सीतारमण ने यूपीए सरकार के दौरान मंत्री रहे पवन कुमार बंसल का नाम लेते हुए कहा कि उन्होंने अपने परिवार से जुड़े कारोबारों के लिए केनरा बैंक से कर्ज दिलाने का दबाव बनाया था।
वित्त मंत्री ने आईडीबीआई बैंक की खराब हालत के लिए भी पिछली सरकारों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि बैंक को वीडियोकॉन, विनसम, एबीजी शिपयार्ड और किंगफिशर जैसे बड़े कारोबारी समूहों को कर्ज देने के लिए मजबूर किया गया। उनके मुताबिक, ये कर्ज बाद में फंस गए और बैंक को भारी नुकसान उठाना पड़ा। सरकार ने इन खराब कर्जों को पहचानकर बैंक की स्थिति सुधारने की दिशा में कदम उठाए।
इससे पहले शुक्रवार को राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में एक पत्र साझा किया था। बैंक यूनियनों और राजनीतिक दलों के विरोध के बीच उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में देश के उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए आईडीबीआई की स्थापना हुई थी, जबकि मौजूदा सरकार के समय बैंक को बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। उन्होंने कहा कि वह बैंक कर्मचारियों के साथ खड़े हैं।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने एक दिन पहले बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया को रणनीतिक पुनर्गठन बताया था। सरकार का कहना है कि बिक्री की प्रक्रिया तय नियमों के अनुसार और संबंधित सरकारी समितियों की मंजूरी के बाद शुरू की गई है। प्रस्ताव के तहत बैंक की हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की एक सहायक कंपनी को बेचने की बात है।
यह तीन दिनों में राहुल गांधी और निर्मला सीतारमण के बीच दूसरा बड़ा राजनीतिक टकराव है। इससे पहले बुधवार को टाटा समूह के भीतर चल रहे विवाद को लेकर दोनों नेताओं के बीच बयानबाजी हुई थी। राहुल ने आरोप लगाया था कि सरकार टाटा समूह को नुकसान पहुंचाने की अनुमति दे रही है। इस पर वित्त मंत्री ने उन्हें हर कारोबारी और कानूनी मामले को राजनीति से जोड़ने से बचने की सलाह दी थी। इस तरह आईडीबीआई बैंक की बिक्री का मुद्दा अब बैंक कर्मचारियों के भविष्य के साथ-साथ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय भी बन गया हैं।

