अंतरराष्ट्रीय कानून की असली ताकत संधियों और अदालतों से ज्यादा देशों के बीच भरोसे, संवाद और साझा मूल्यों में है। राष्ट्रों के बीच विश्वास नहीं होगा तो कागज पर स्वीकार किए गए नियम भी व्यवहार में प्रभावी नहीं हो पाएंगे। यह बात बेल्जियम के हैसेल्ट विश्वविद्यालय और चीन के शंघाई जियाओ टोंग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो प्रो. मैथियास वैनहुलेबुश ने कही। वे बुधवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के विधि संकाय में आयोजित ऑनलाइन अतिथि व्याख्यान में बोल रहे थे। उन्होंने ‘द थ्योरी ऑन द रिलेशनल नॉर्मेटिविटी ऑफ इंटरनेशनल लॉ’ विषय पर व्याख्यान दिया। कार्यक्रम कुलपति प्रो. जय प्रकाश सैनी, विधि संकाय के अधिष्ठाता प्रो. रमेश कुमार वर्मा के संरक्षण और निदेशक प्रो. वरुण छाछर के निर्देशन में किया गया। बदलती विश्व व्यवस्था में नए नजरिए की जरूरत प्रो. वैनहुलेबुश ने कहा कि 21वीं सदी में वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है। अब दुनिया को प्रभावित करने वाले फैसले केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं रह सकते। कई गैर-पश्चिमी शक्तियां वैश्विक व्यवस्था में अहम भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने कहा कि पश्चिमी संस्कृति को पूरी दुनिया के लिए सार्वभौमिक मानना उचित नहीं है। अलग-अलग समाज वास्तविकता को अलग नजरिए से देखते हैं। पूरब-पश्चिम की सोच में अंतर मनोवैज्ञानिक रिचर्ड निस्बेट के अध्ययन का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि पश्चिमी सोच किसी वस्तु को अलग करके देखने पर जोर देती है, जबकि एशियाई सोच उसके संदर्भ और संबंधों को महत्व देती है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों को देशों के बीच संबंधों को भी उतना ही महत्व देना होगा। भरोसे से मजबूत होगा अंतरराष्ट्रीय कानून उन्होंने चीनी विद्वान किन याछिंग की ‘रिलेशनल गवर्नेंस’ अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि आपसी भरोसा, साझा मानदंड और नैतिकता सहयोग को मजबूत करते हैं। ब्रेक्सिट, आसियान, यूरोपीय संघ-कनाडा व्यापार समझौते और बेल्ट एंड रोड पहल जैसे उदाहरणों से उन्होंने इसे समझाया। प्रो. वरुण छाछर ने कहा कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय अकादमिक संवाद से वैश्विक शोध और विचार लखनऊ के विद्यार्थियों तक पहुंच रहे हैं। कार्यक्रम में शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी ऑनलाइन जुड़े।

