Israel Election: इजरायल में आम चुनाव की वोटिंग खत्म हो चुकी है। एग्जिट पोल बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता के करीब दिखा रहे हैं। उनके गठबंधन को 59, जबकि मुख्य विपक्षी नेता पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट को 49 सीटें मिलतीं नजर आ रही हैं. हालांकि, इजरायल में रहने वाले भारतीय मूल के यहूदियों के लिए यानिव अष्टमकर की जीत ज्यादा मायने रखती है। अगर अष्टमकर संसद यानी नेसेट तक पहुंचने में सफल रहते हैं, तो उनसे जुड़े मुद्दों को गंभीरता से सुना जा सकेगा। इजरायल के शहर किर्यत गैट से ताल्लुक रखने वाले यानिव अष्टमकर ‘त्जोमेट बेत यिसराएल’ पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मकसद भारतीय मूल के यहूदियों को राष्ट्रीय राजनीतिक में प्रतिनिधित्व दिलाना और उनकी चिंताओं को संसद में उठाना है।
महाराष्ट्र से है ‘बेने इजरायल’ का कनेक्शन
इजरायल में भारतीय मूल के यहूदी अलग-अलग समुदायों में बंटे हुए हैं। ‘बेने इजरायल’ समुदाय भारतीय मूल के यहूदियों का सबसे बड़ा समूह है। इनका इतिहास महाराष्ट्र, विशेषकर कोंकण से जुड़ा है। 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद, महाराष्ट्र से हजारों ‘बेने इजरायल’ लोग वहां जाकर बस गए। हालांकि, इजरायल में उनके धार्मिक दर्जे को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इजरायल के मूल निवासी भारत से आए यहूदियों को दिल से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। इस भेदभाव के चलते इजरायल में ‘धार्मिक फासीवादी शासन’ को खत्म करने की मांग तेज हुई और लगभग दो हजार भारतीय यहूदियों ने यरुशलम की सड़कों पर मार्च किया। उनका कहना था कि वे दो हजार साल तक भारत में वफादार यहूदियों की तरह रहे, लेकिन इजरायल आने पर उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा। अगस्त 1964 में, संसद ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें स्पष्ट किया गया कि ‘बेने इजरायल’ समुदाय के लोग हर लिहाज से यहूदी हैं।

बॉम्बे में जन्मे इस नेता ने पाया मुकाम
दक्षिणी इजरायल का डिमोना शहर, भारतीय यहूदियों का प्रमुख केंद्र बना। 1980 में बेने इजरायल के कार्यकर्ताओं ने ‘किडुम डिमोना’ नाम से एक नगरपालिका पार्टी बनाई और नगर परिषद में एक सीट जीती। इसके चार साल बाद समुदाय ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए ‘शिलुव’ नाम से पार्टी बनाई। पार्टी ने 11वीं नेसेट के चुनाव में हिस्सा लिया। मकसद साफ था– संसद में भारतीय यहूदियों का प्रतिनिधित्व। पार्टी को 5,499 वोट मिले, जो कुल वोटों का 0.3 प्रतिशत था। यह उस समय लागू 1 प्रतिशत के चुनावी थ्रेशोल्ड (न्यूनतम सीमा) से कम था। लिहाजा पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी और जल्द ही खत्म हो गई। हालांकि, भारत में जन्मे कुछ राजनेताओं ने मुख्यधारा की पार्टियों के जरिए ‘नेसेट’ में काम किया। इनमें से एक थे एली बेन मेनाकेम, जिनका जन्म 1947 में बॉम्बे में हुआ था और जो 1949 में अपने परिवार के साथ इजरायल चले गए थे। वह 1988 से 2006 तक ‘नेसेट’ का हिस्सा रहे। इस दौरान वे ‘अलाइनमेंट’, ‘लेबर पार्टी’ और ‘वन इजरायल’ गठबंधन का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उन्होंने सरकार में कई पदों पर भी काम किया और वह ‘नेसेट’ यानी संसद के डिप्टी स्पीकर भी रहे।
इजरायल में भारतीय मूल के इतने यहूदी
तेल अवीव में भारतीय दूतावास के अनुसार, इजरायल में भारतीय मूल के लगभग 85,000 यहूदी रहते हैं। एक करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में 85 हजार कोई खास बड़ा आंकड़ा नहीं है, इसलिए भारतीय मूल के लोगों की आवाज अक्सर दब जाती है। महाराष्ट्र के ‘बेने इजराइल’, केरल के ‘कोचीन यहूदी’, ‘बगदादी यहूदी’ और हाल के वर्षों में पूर्वोत्तर भारत से आए लोग इजरायल में रह रहे हैं। भारतीय मूल के इजराइली राफी भोंकर, ‘इंडियन ज्यूइश हेरिटेज सेंटर’ के अध्यक्ष हैं। यह केंद्र भारत से आए यहूदी समुदायों का प्रतिनिधित्व करता है। भोंकर का कहना है कि यह समुदाय आमतौर पर राजनीति में बहुत कम सक्रिय रहा है। भारतीय मूल के यहूदियों को अपनी भारतीय विरासत पर गर्व है, लेकिन वे इजराइली समाज में पूरी तरह से घुल-मिल गए हैं। इस बार का आम चुनाव अन्य इजरायली नागरिकों की तरह, भारतीय मूल के अधिकांश यहूदियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इजरायल में रहने वाले भारतीय मानते हैं कि आबादी में कम हिस्सेदारी के चलते प्रमुख राजनीतिक दलों ने उन तक पहुंचने के लिए कोई विशेष अभियान नहीं चलाया। ऐसे में यानिव अष्टमकर का जीतना समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है।

इस तरह भारत पहुंचा था ‘बेने इजरायल’ समुदाय
‘बेने इजरायल’ समुदाय का भारत से रिश्ता दशकों पुराना है। बताया जाता है कि सेल्यूसिड साम्राज्य के राजा एंटीओकस एपिफेन्स (Antiochus Epiphanes) के शासनकाल में यहूदियों पर अत्याचार होता था। इससे बचने के लिए कुछ परिवार एक जहाज पर सवार होकर भाग निकले। हालांकि, जहाज भारत के पश्चिमी तट पर टूट गया, ये जगह महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के नजदीक है। 7 पुरुष और 7 महिलाओं को छोड़कर जहाज़ पर सवार सभी लोगों की मौत हो गई। सभी जीवित बचे लोग नवगांव नामक गांव पहुंचे और यहीं पर उन्होंने अपनों के शव दफन किया। भारत में यहूदियों का पहला कब्रिस्तान यही था। यहूदी महाराष्ट्र में बस गए और यहां की भाषा एवं संस्कृति को अपना लिया।
इजरायल के यहूदी समुदाय द्वारा ‘बेने इजरायल’ के लोगों को दिल से स्वीकार न करने की प्रमुख वजह ये रही कि उनका धार्मिक ग्रंथों से जुड़ाव नहीं था और वे यहूदी परंपरा से भी लगभग कट गए थे। हालांकि, उनकी मजबूरी को नहीं समझा गया। जिन हालातों में इस समुदाय का भारत आना हुआ, उनके पास उनकी अपनी पवित्र पुस्तकें नहीं थीं, इसीलिए अपने धार्मिक ग्रंथों से उनका जुड़ाव कमजोर होता चला गया। ब्रिटिश राज में महाराष्ट्र के कोंकण में बसे कई इजरायली मुंबई पहुंचे और वहीं रहने लगे। 1948 में जब इजरायल अस्तित्व में आया तो दुनिया भर में यहूदी समुदाय के लोगों से वापसी की अपील की गई। इसके बाद बड़ी संख्या में बेने इजरायल समुदाय के लोगों ने भारत से इजरायल का रुख किया।

