जामताड़ा में महाष्टमी पर दंडवत करते मंदिर पहुंचे श्रद्धालु:नारायणपुर के गढ़ दुर्गा मंदिर में सुबह 5 बजे से लगी भीड़, 56 प्रकार के भोग चढ़ाए गए

जामताड़ा में महाष्टमी पर दंडवत करते मंदिर पहुंचे श्रद्धालु:नारायणपुर के गढ़ दुर्गा मंदिर में सुबह 5 बजे से लगी भीड़, 56 प्रकार के भोग चढ़ाए गए

जामताड़ा जिले में महाष्टमी पर रविवार को मां दुर्गा की आराधना के लिए पूजा पंडालों और प्राचीन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। नारायणपुर बाजार स्थित गढ़ दुर्गा मंदिर में सुबह पांच बजे से ही भक्त पहुंचने लगे। श्रद्धालुओं ने पहले महतो अहरा तालाब में स्नान किया। इसके बाद दंडवत देते हुए मां के दरबार तक पहुंचे। भक्तों ने दंडवत प्रणाम कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। मंदिर में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। वैष्णवी परंपरा से जुड़े इस प्राचीन मंदिर में महाष्टमी के अवसर पर मां दुर्गा को 56 प्रकार के भोग अर्पित किए गए। महाआरती के बाद श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। नारायणपुर गढ़ दुर्गा मंदिर का इतिहास करीब 450 साल पुराना बताया जाता है। इसकी स्थापना 16वीं सदी में राज परिवार ने की थी। महाष्टमी पर मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए सुबह से ही भक्तों का पहुंचना जारी रहा। नाला के नीचेपाड़ा में 491 वर्षों से हो रही पूजा जामताड़ा जिले के ग्रामीण इलाकों में भी दुर्गापूजा की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। नाला प्रखंड के नीचेपाड़ा हाटतला स्थित गढ़ेर मां दुर्गा मंदिर में करीब 491 वर्षों से पूजा होने की परंपरा है। मंदिर के शिलापट्ट पर 1535 अंकित है, जो इस पूजा के प्राचीन इतिहास की पहचान बताता है। यहां आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां दुर्गा की आराधना की जाती है। महा नवमी और विजयादशमी के अवसर पर नारायणपुर के गढ़ दुर्गा मंदिर में दो दिवसीय मेले का आयोजन भी होता है। पूजा के साथ मेले में बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की परंपरा रही है। इन प्राचीन धार्मिक स्थलों पर पूजा-अर्चना केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ी है। पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के कारण इन मंदिरों में नवरात्र के दौरान विशेष उत्साह देखने को मिलता है। मंझलाडीह में छह पीढ़ियों से पूजा की परंपरा फतेहपुर प्रखंड के मंझलाडीह गांव में करीब 450 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा हो रही है। इस परंपरा की शुरुआत जमींदार आनंद सिंह ने की थी। इसके बाद सिंह परिवार की छह पीढ़ियां पूजा की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। बताया जाता है कि पहले यह पूजा महज 20 रुपए के खर्च में होती थी, जबकि अब इसका बजट करीब डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच गया है। यहां महासप्तमी के अवसर पर नवपत्रिका को पालकी में सजाकर मंदिर लाने की विशेष परंपरा है। पूजा की यह रस्म आज भी पारंपरिक तरीके से निभाई जाती है। गांव के लोगों के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ पारिवारिक और सामाजिक विरासत से भी जुड़ा है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में ग्रामीणों की भागीदारी बनी रहती है। घाटी, मंडरो और पिंडारी में भी सदियों पुरानी पूजा जामताड़ा जिले के अन्य गांवों में भी दुर्गापूजा की पुरानी परंपराएं प्रचलित हैं। घाटी गांव में करीब 500 वर्षों से, मंडरो में 350 वर्षों से, पिंडारी में 300 वर्षों से और अमजोरा में करीब 250 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा किए जाने की परंपरा बताई जाती है। इन पूजा स्थलों पर आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां की आराधना की जाती है। महाष्टमी से लेकर विजयादशमी तक जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक गतिविधियां तेज रहती हैं। कहीं दंडवत करते हुए मंदिर पहुंचने की परंपरा है, तो कहीं नवपत्रिका को पालकी में लाने की रस्म निभाई जाती है। अलग-अलग गांवों में प्रचलित ये परंपराएं जामताड़ा की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनका निर्वहन स्थानीय लोगों की आस्था और परंपराओं से जुड़े रहने का प्रमाण है। जामताड़ा जिले में महाष्टमी पर रविवार को मां दुर्गा की आराधना के लिए पूजा पंडालों और प्राचीन मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। नारायणपुर बाजार स्थित गढ़ दुर्गा मंदिर में सुबह पांच बजे से ही भक्त पहुंचने लगे। श्रद्धालुओं ने पहले महतो अहरा तालाब में स्नान किया। इसके बाद दंडवत देते हुए मां के दरबार तक पहुंचे। भक्तों ने दंडवत प्रणाम कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। मंदिर में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। वैष्णवी परंपरा से जुड़े इस प्राचीन मंदिर में महाष्टमी के अवसर पर मां दुर्गा को 56 प्रकार के भोग अर्पित किए गए। महाआरती के बाद श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। नारायणपुर गढ़ दुर्गा मंदिर का इतिहास करीब 450 साल पुराना बताया जाता है। इसकी स्थापना 16वीं सदी में राज परिवार ने की थी। महाष्टमी पर मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए सुबह से ही भक्तों का पहुंचना जारी रहा। नाला के नीचेपाड़ा में 491 वर्षों से हो रही पूजा जामताड़ा जिले के ग्रामीण इलाकों में भी दुर्गापूजा की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। नाला प्रखंड के नीचेपाड़ा हाटतला स्थित गढ़ेर मां दुर्गा मंदिर में करीब 491 वर्षों से पूजा होने की परंपरा है। मंदिर के शिलापट्ट पर 1535 अंकित है, जो इस पूजा के प्राचीन इतिहास की पहचान बताता है। यहां आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां दुर्गा की आराधना की जाती है। महा नवमी और विजयादशमी के अवसर पर नारायणपुर के गढ़ दुर्गा मंदिर में दो दिवसीय मेले का आयोजन भी होता है। पूजा के साथ मेले में बड़ी संख्या में लोगों के जुटने की परंपरा रही है। इन प्राचीन धार्मिक स्थलों पर पूजा-अर्चना केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक परंपराओं से भी जुड़ी है। पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के कारण इन मंदिरों में नवरात्र के दौरान विशेष उत्साह देखने को मिलता है। मंझलाडीह में छह पीढ़ियों से पूजा की परंपरा फतेहपुर प्रखंड के मंझलाडीह गांव में करीब 450 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा हो रही है। इस परंपरा की शुरुआत जमींदार आनंद सिंह ने की थी। इसके बाद सिंह परिवार की छह पीढ़ियां पूजा की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। बताया जाता है कि पहले यह पूजा महज 20 रुपए के खर्च में होती थी, जबकि अब इसका बजट करीब डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच गया है। यहां महासप्तमी के अवसर पर नवपत्रिका को पालकी में सजाकर मंदिर लाने की विशेष परंपरा है। पूजा की यह रस्म आज भी पारंपरिक तरीके से निभाई जाती है। गांव के लोगों के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ पारिवारिक और सामाजिक विरासत से भी जुड़ा है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में ग्रामीणों की भागीदारी बनी रहती है। घाटी, मंडरो और पिंडारी में भी सदियों पुरानी पूजा जामताड़ा जिले के अन्य गांवों में भी दुर्गापूजा की पुरानी परंपराएं प्रचलित हैं। घाटी गांव में करीब 500 वर्षों से, मंडरो में 350 वर्षों से, पिंडारी में 300 वर्षों से और अमजोरा में करीब 250 वर्षों से मां दुर्गा की पूजा किए जाने की परंपरा बताई जाती है। इन पूजा स्थलों पर आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मां की आराधना की जाती है। महाष्टमी से लेकर विजयादशमी तक जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक गतिविधियां तेज रहती हैं। कहीं दंडवत करते हुए मंदिर पहुंचने की परंपरा है, तो कहीं नवपत्रिका को पालकी में लाने की रस्म निभाई जाती है। अलग-अलग गांवों में प्रचलित ये परंपराएं जामताड़ा की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनका निर्वहन स्थानीय लोगों की आस्था और परंपराओं से जुड़े रहने का प्रमाण है।  

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