बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक दशहरा इस बार 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। दशमी तिथि 20 अक्टूबर की सुबह 9:10 बजे शुरू होकर 21 अक्टूबर की सुबह 10 बजे तक रहेगी। काशी के ज्योतिषाचार्य BHU के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर पं. सुभाष पांडेय के मुताबिक, धर्मशास्त्रों में विजयादशमी के लिए केवल उदयातिथि ही नहीं, बल्कि श्रवण नक्षत्र और अपराह्न काल का भी महत्व है। शास्त्रीय गणना के अनुसार, 20 अक्टूबर को ही दशहरा मनाना उचित है। इसी दिन शाम को रावण दहन होगा। 20 अक्टूबर को ही दशहरा क्यों, जानिए वजह पंडित सुभाष पांडेय ने बताया- सामान्य तौर पर कई हिंदू पर्वों को उदयातिथि के आधार पर मनाया जाता है, लेकिन विजयादशमी के निर्धारण में कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, दशमी तिथि के साथ श्रवण नक्षत्र का संयोग और अपराह्न काल की उपलब्धता इस पर्व के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस बार विजयादशमी के लिए आवश्यक समय 20 अक्टूबर को ही प्राप्त हो रहा है। इसलिए शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन दशहरा मनाना उचित होगा। शाम को सूर्यास्त के आसपास रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाएगा। इसके साथ ही लोग एक-दूसरे को विजयादशमी की शुभकामनाएं देकर सुख, समृद्धि और मंगल की कामना करेंगे। दशहरा पर शस्त्र और शमी के पौधे की पूजा का भी विधान विजयादशमी का पर्व केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है। इस दिन शस्त्र पूजा की भी प्राचीन परंपरा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयादशमी को शक्ति, साहस और विजय का प्रतीक माना जाता है। इसी वजह से कई स्थानों पर लोग अपने अस्त्र-शस्त्र, वाहनों और काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान अस्त्र-शस्त्र शमी के वृक्ष में छिपा दिए थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद उन्होंने आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को शमी के वृक्ष से अपने शस्त्र निकाले और उनकी पूजा की थी। इसी मान्यता के आधार पर विजयादशमी पर शस्त्र पूजा और शमी के वृक्ष की पूजा करने की परंपरा प्रचलित हुई। काशी में 75 फीट का रावण जलेगा, मुस्लिम परिवार निभाएगा परंपरा काशी में दशहरे पर गंगा-जमुनी तहजीब की अनोखी मिसाल देखने को मिलती है। यहां रावण के पुतले को मुस्लिम परिवार तैयार करता है। शमशाद खान का परिवार बीते तीन पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहा है। इस बार भी BLW में जलने वाले पूर्वांचल के सबसे बड़े 75 फीट के रावण को शमशाद और उनका परिवार बना रहा है। शमशाद खान ने बताया कि उनके नाना बाबू खान ने करीब पांच दशक पहले रावण का पुतला बनाने की परंपरा शुरू की थी। अब वह अपने बेटों के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। दशहरे से करीब तीन महीने पहले ही पूरा परिवार पुतले बनाने में जुट जाता है। कोई बांस की टहनियों को काटकर ढांचा तैयार करता है तो कोई पुतले को आकार देता है। परिवार रोजाना करीब 16 घंटे इस काम में जुटा रहता है। शमशाद पिछले 25 वर्षों से वाराणसी के विभिन्न दशहरा मेलों के लिए रावण के पुतले बना रहे हैं। इस साल भी वह आधा दर्जन से अधिक बड़े पुतले तैयार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक पुतले को बनाने में करीब पांच हजार रुपये प्रति फीट तक खर्च आता है। इस बार बरेका में जलने वाले 75 फीट के रावण को कागज के बजाय सिल्क के कपड़ों से तैयार किया जा रहा है। शमशाद के मुताबिक, काशी में होली हो या दिवाली, हर पर्व हिंदू-मुस्लिम मिलकर मनाते हैं। दशहरे पर रावण निर्माण की यह परंपरा आपसी भाईचारे की मिसाल पेश करती है। ————————– ये खबर भी पढ़िए- पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर हादसा, इंजीनियर और पिता की मौत: शादी में शामिल होने मऊ जा रहे थे, पत्नी-बेटी समेत 3 घायल आजमगढ़ में पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर सड़क हादसे में इंजीनियर और उसके पिता की मौत हो गई। मां, बहन और भाई गंभीर घायल हैं। तेज रफ्तार कार अचानक डिवाइडर से टकराई और पूरी लेन को क्रास करते हुए दूसरी तरफ सड़क के किनारे गिर गई। पढ़ें पूरी खबर…

