देशभर में शारदीय नवरात्र की पहचान नौ दिनों की पूजा और दशहरा से होती है, लेकिन लातेहार के चंदवा में मां उग्रतारा नगर भगवती की आराधना की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां मां की पूजा नौ नहीं, बल्कि पूरे 16 दिनों तक चलती है। जिउतिया व्रत के पारण के साथ ही नगर भगवती मंदिर में शारदीय पूजन का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस वर्ष 4 अक्टूबर को मां अष्टादशभुजा की कलश स्थापना के साथ 16 दिवसीय शारदीय पूजन आरंभ हुआ है। अब 20 अक्टूबर को दशमी के दिन नीलकंठ दर्शन के साथ इस विशेष पूजा का समापन होगा। इन 16 दिनों में हर दिन पूजा का विधान अलग होता है। कलश पूजन, महाआरती, विल्वाभिमंत्रण, देवी आमंत्रण, हवन, बलि और विसर्जन जैसे अनुष्ठान तय परंपरा के अनुसार संपन्न किए जाते हैं। यही वजह है कि चंदवा का नगर भगवती मंदिर शारदीय पूजन की अपनी अलग परंपरा के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। 500 साल पुरानी पोथी में दर्ज है पूजा का पूरा विधान नगर भगवती मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां सदियों से चली आ रही पूजा पद्धति है। मंदिर में पूजा आधुनिक धार्मिक पुस्तकों के अनुसार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से सुरक्षित हस्तलिखित कैथी लिपि की पोथी के आधार पर होती है। मंदिर के सेवायत सह मुंतजिमकार पंडित गोविंद बल्लभ मिश्र के अनुसार यह पोथी करीब 500 वर्ष पुरानी है। इसमें पूजा के मंत्र, विधि और अलग-अलग अनुष्ठानों का पूरा विधान दर्ज है। समय के साथ पूजा के तौर-तरीकों में बदलाव आया, लेकिन नगर भगवती मंदिर में इस प्राचीन पोथी में दर्ज परंपरा को आज भी उसी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। मंदिर के इतिहास को लेकर भी कई लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि चंदवा-टोरी क्षेत्र के तत्कालीन शासक पीतांबर नाथ शाही को स्वप्न में देवी के दर्शन हुए थे। इसके बाद मनकरी क्षेत्र के जोड़ा तालाब से देवी की प्रतिमाएं मिलने की कथा कही जाती है। इन्हीं घटनाओं को नगर भगवती मंदिर की स्थापना की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। सदियों से यहां शक्ति और तंत्र साधना की परंपरा से जुड़े श्रद्धालु दूर-दूर से पहुंचते रहे हैं। फूल गिरने से भक्तों की मनोकामना होती है पूरी नगर भगवती मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। सबसे खास मान्यता मां के आसन पर चढ़ाए जाने वाले फूल को लेकर है। भक्त अपनी मनोकामना लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में ही नहा कर पूजा के बाद मां के आसन पर फूल चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि जब फूल आसन से नीचे गिरता है तो इसे श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण होने का संकेत माना जाता है। वहीं एक मान्यता पान के पत्ते के गिरने का है। मां को अर्पित पान पत्ता गिरने के बाद शारदीय नवरात्र का विसर्जन का आदेश माना जाता है। विजयदशमी के दिन मां के आसन पर पान के पत्ते चढ़ाए जाते हैं। पान के पत्ता गिरने ही मां मातेश्वरी की स्वीकृति अथवा आदेश का संकेत माना जाता है। इसके बाद नवपत्रिका का विसर्जन होता है। यही परंपरा मंदिर को श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बनाती है। तय कार्यक्रम के अनुसार 4 अक्टूबर को कलश स्थापना से शुरू हुए पूजन में 5 से 9 अक्टूबर तक प्रतिदिन मां अष्टादशभुजा का कलश पूजन और महाआरती होगी। 10 अक्टूबर को अमावस्या की संध्या मां गौरा के आगमन के बाद विशेष कलश स्थापना होगी। इसके बाद परंपरा के अनुसार बलि का क्रम शुरू होगा। 11 से 15 अक्टूबर तक प्रतिपदा से पंचमी तक प्रतिदिन सभी पहर आरती और मंडप स्थित कलश का पूजन होगा। 16 अक्टूबर को षष्ठी तिथि पर दोपहर 2 बजे विल्वाभिमंत्रण के लिए श्रद्धालु दामोदर गांव के लिए प्रस्थान करेंगे। 17 अक्टूबर को सप्तमी पर मातेश्वरी को आमंत्रण के बाद संध्या में कलश पूजन और महाआरती होगी। अष्टमी से नवमी तक हवन और संधि बलि 17 अक्टूबर को मां गौरा के विसर्जन के बाद देवी को लाने के लिए दामोदर गांव जाने की परंपरा है। इसी दिन देवी स्नान, श्रीगणेश-ब्रह्मा कलश स्थापना और देवी पूजन होगा। रात 10:30 बजे से श्रद्धालुओं के लिए बलि शुरू होगी। 18 अक्टूबर को अष्टमी पर शाम 4 बजे मंदिर के पश्चिम दिशा स्थित हवन कुंड में हवन होगा। रात 10:30 बजे कलश पूजा के बाद बलि शुरू होगी। 19 अक्टूबर नवमी को सुबह 6:47 से 6:53 बजे के बीच संधि बलि की परंपरा निभाई जाएगी। इसके अगले दिन 20 अक्टूबर को दशमी पर सुबह हवन के बाद करीब 8:30 बजे महिष बलि होगी। इसके बाद करीब 9:34 बजे भगवती का भव्य श्रृंगार कर आसन पर पान चढ़ाया जाएगा। पान का पत्ता गिरने के बाद मातेश्वरी का आदेश मिलने की मान्यता है। इसके बाद नवपत्रिका और भगवती विसर्जन की परंपरा पूरी होगी। अंत में नीलकंठ दर्शन और महिष बलि के साथ दशहरा पर्व संपन्न होगा। इस तरह 16 दिनों तक चलने वाली पूजा की हर रस्म अपने तय समय और विधान के अनुसार पूरी की जाती है। पोथी से लेकर परंपरा तक हर रस्म में इतिहास नगर भगवती मंदिर का 16 दिवसीय शारदीय पूजन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला नहीं, बल्कि चंदवा की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत भी है। जिउतिया के पारण के साथ पूजा शुरू होने की परंपरा, करीब 500 वर्ष पुरानी कैथी लिपि की हस्तलिखित पोथी, अलग-अलग दिनों में बदलते पूजा विधान और मां के आदेश से जुड़ी पान के पत्ते की मान्यता इस मंदिर को अन्य पूजा स्थलों से अलग पहचान देती है। यहां नवरात्र के नौ दिनों के बजाय पूरे 16 दिनों तक देवी आराधना होती है और हर दिन का अपना धार्मिक महत्व है। यही वजह है कि शारदीय पूजन के दौरान चंदवा के नगर भगवती मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी आस्था और विश्वास के साथ निभाई जा रही है। देशभर में शारदीय नवरात्र की पहचान नौ दिनों की पूजा और दशहरा से होती है, लेकिन लातेहार के चंदवा में मां उग्रतारा नगर भगवती की आराधना की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां मां की पूजा नौ नहीं, बल्कि पूरे 16 दिनों तक चलती है। जिउतिया व्रत के पारण के साथ ही नगर भगवती मंदिर में शारदीय पूजन का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस वर्ष 4 अक्टूबर को मां अष्टादशभुजा की कलश स्थापना के साथ 16 दिवसीय शारदीय पूजन आरंभ हुआ है। अब 20 अक्टूबर को दशमी के दिन नीलकंठ दर्शन के साथ इस विशेष पूजा का समापन होगा। इन 16 दिनों में हर दिन पूजा का विधान अलग होता है। कलश पूजन, महाआरती, विल्वाभिमंत्रण, देवी आमंत्रण, हवन, बलि और विसर्जन जैसे अनुष्ठान तय परंपरा के अनुसार संपन्न किए जाते हैं। यही वजह है कि चंदवा का नगर भगवती मंदिर शारदीय पूजन की अपनी अलग परंपरा के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। 500 साल पुरानी पोथी में दर्ज है पूजा का पूरा विधान नगर भगवती मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यहां सदियों से चली आ रही पूजा पद्धति है। मंदिर में पूजा आधुनिक धार्मिक पुस्तकों के अनुसार नहीं, बल्कि पीढ़ियों से सुरक्षित हस्तलिखित कैथी लिपि की पोथी के आधार पर होती है। मंदिर के सेवायत सह मुंतजिमकार पंडित गोविंद बल्लभ मिश्र के अनुसार यह पोथी करीब 500 वर्ष पुरानी है। इसमें पूजा के मंत्र, विधि और अलग-अलग अनुष्ठानों का पूरा विधान दर्ज है। समय के साथ पूजा के तौर-तरीकों में बदलाव आया, लेकिन नगर भगवती मंदिर में इस प्राचीन पोथी में दर्ज परंपरा को आज भी उसी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। मंदिर के इतिहास को लेकर भी कई लोकमान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि चंदवा-टोरी क्षेत्र के तत्कालीन शासक पीतांबर नाथ शाही को स्वप्न में देवी के दर्शन हुए थे। इसके बाद मनकरी क्षेत्र के जोड़ा तालाब से देवी की प्रतिमाएं मिलने की कथा कही जाती है। इन्हीं घटनाओं को नगर भगवती मंदिर की स्थापना की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। सदियों से यहां शक्ति और तंत्र साधना की परंपरा से जुड़े श्रद्धालु दूर-दूर से पहुंचते रहे हैं। फूल गिरने से भक्तों की मनोकामना होती है पूरी नगर भगवती मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। सबसे खास मान्यता मां के आसन पर चढ़ाए जाने वाले फूल को लेकर है। भक्त अपनी मनोकामना लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में ही नहा कर पूजा के बाद मां के आसन पर फूल चढ़ाया जाता है। मान्यता है कि जब फूल आसन से नीचे गिरता है तो इसे श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण होने का संकेत माना जाता है। वहीं एक मान्यता पान के पत्ते के गिरने का है। मां को अर्पित पान पत्ता गिरने के बाद शारदीय नवरात्र का विसर्जन का आदेश माना जाता है। विजयदशमी के दिन मां के आसन पर पान के पत्ते चढ़ाए जाते हैं। पान के पत्ता गिरने ही मां मातेश्वरी की स्वीकृति अथवा आदेश का संकेत माना जाता है। इसके बाद नवपत्रिका का विसर्जन होता है। यही परंपरा मंदिर को श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बनाती है। तय कार्यक्रम के अनुसार 4 अक्टूबर को कलश स्थापना से शुरू हुए पूजन में 5 से 9 अक्टूबर तक प्रतिदिन मां अष्टादशभुजा का कलश पूजन और महाआरती होगी। 10 अक्टूबर को अमावस्या की संध्या मां गौरा के आगमन के बाद विशेष कलश स्थापना होगी। इसके बाद परंपरा के अनुसार बलि का क्रम शुरू होगा। 11 से 15 अक्टूबर तक प्रतिपदा से पंचमी तक प्रतिदिन सभी पहर आरती और मंडप स्थित कलश का पूजन होगा। 16 अक्टूबर को षष्ठी तिथि पर दोपहर 2 बजे विल्वाभिमंत्रण के लिए श्रद्धालु दामोदर गांव के लिए प्रस्थान करेंगे। 17 अक्टूबर को सप्तमी पर मातेश्वरी को आमंत्रण के बाद संध्या में कलश पूजन और महाआरती होगी। अष्टमी से नवमी तक हवन और संधि बलि 17 अक्टूबर को मां गौरा के विसर्जन के बाद देवी को लाने के लिए दामोदर गांव जाने की परंपरा है। इसी दिन देवी स्नान, श्रीगणेश-ब्रह्मा कलश स्थापना और देवी पूजन होगा। रात 10:30 बजे से श्रद्धालुओं के लिए बलि शुरू होगी। 18 अक्टूबर को अष्टमी पर शाम 4 बजे मंदिर के पश्चिम दिशा स्थित हवन कुंड में हवन होगा। रात 10:30 बजे कलश पूजा के बाद बलि शुरू होगी। 19 अक्टूबर नवमी को सुबह 6:47 से 6:53 बजे के बीच संधि बलि की परंपरा निभाई जाएगी। इसके अगले दिन 20 अक्टूबर को दशमी पर सुबह हवन के बाद करीब 8:30 बजे महिष बलि होगी। इसके बाद करीब 9:34 बजे भगवती का भव्य श्रृंगार कर आसन पर पान चढ़ाया जाएगा। पान का पत्ता गिरने के बाद मातेश्वरी का आदेश मिलने की मान्यता है। इसके बाद नवपत्रिका और भगवती विसर्जन की परंपरा पूरी होगी। अंत में नीलकंठ दर्शन और महिष बलि के साथ दशहरा पर्व संपन्न होगा। इस तरह 16 दिनों तक चलने वाली पूजा की हर रस्म अपने तय समय और विधान के अनुसार पूरी की जाती है। पोथी से लेकर परंपरा तक हर रस्म में इतिहास नगर भगवती मंदिर का 16 दिवसीय शारदीय पूजन केवल धार्मिक अनुष्ठानों का सिलसिला नहीं, बल्कि चंदवा की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत भी है। जिउतिया के पारण के साथ पूजा शुरू होने की परंपरा, करीब 500 वर्ष पुरानी कैथी लिपि की हस्तलिखित पोथी, अलग-अलग दिनों में बदलते पूजा विधान और मां के आदेश से जुड़ी पान के पत्ते की मान्यता इस मंदिर को अन्य पूजा स्थलों से अलग पहचान देती है। यहां नवरात्र के नौ दिनों के बजाय पूरे 16 दिनों तक देवी आराधना होती है और हर दिन का अपना धार्मिक महत्व है। यही वजह है कि शारदीय पूजन के दौरान चंदवा के नगर भगवती मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी आस्था और विश्वास के साथ निभाई जा रही है।

