रीवा में प्रसूता कल्पना मिश्रा की मौत, अस्पताल में महिला मरीज के चेहरे पर कीड़े रेंगने की घटना और इंटर्न डॉक्टरों के आंदोलन के बाद मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था सवालों के घेरे में है। इन घटनाओं और सरकार की कार्रवाई को लेकर दैनिक भास्कर ने डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल से सीधी बातचीत की। उन्होंने कल्पना मिश्रा की मौत पर जिम्मेदार डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ पर हुई कार्रवाई को लेकर कहा कि सरकार ने औपचारिकताओं का इंतजार नहीं किया, बल्कि तत्काल कार्रवाई की। वहीं इंटर्न डॉक्टरों पर वाटर कैनन और लाठीचार्ज को उन्होंने अनावश्यक बताते हुए अधिकारियों की नासमझी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। स्वास्थ्य सेवाओं पर कांग्रेस के आरोपों को भी उन्होंने आंकड़ों और रीवा में हो रहे स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के जरिए खारिज किया। भास्कर- आपको नहीं लगता कि इंटर्न डॉक्टरों के मामले में फैसला लेने में देरी हुई? डिप्टी सीएम- नहीं, ये विषय हमारे विचार में था ही… मुख्यमंत्री जी के साथ पहले भी हमारी बैठक हो चुकी थी। मुख्यमंत्री जी सैद्धांतिक रूप से तैयार थे। फिर जब ये घटना हुई तो उन्होंने नाराजगी व्यक्त करते की। उन्होंने कहा कि मात्र दो सौ बच्चे थे तो यह सब करने की क्या जरूरत थी! वे विदेश में थे। मैंने उन्हें वस्तुस्थिति से अवगत कराया और बताया कि सुबह 10:30 बजे मैं बच्चों से मिल रहा हूं। उन्होंने कहा कि आप बच्चों से मिलिए और आश्वस्त करिए। मुख्यमंत्री जी ने मुझसे कहा कि जो कार्रवाई हुई है उससे मैं नाराज हूं और उनकी जो मांग है, उसका समाधान निकलें। भास्कर- पुलिस की वाटर कैनन और लाठीचार्ज की कार्रवाई से इंटर्न डॉक्टरों में नाराजगी है? डिप्टी सीएम- स्वाभाविक है, उसकी आवश्यकता नहीं थी। पता नहीं क्यों किया? कुछ ऐसे अधिकारी-कर्मचारी होते हैं जो उतनी परिपक्वता से चीजों को हैंडल नहीं कर पाते। ये उसी का परिणाम था। इसीलिए तत्काल मुख्यमंत्री जी ने निर्देश भी दिए हैं और दो संबंधित लोग जो फ्रंट में थे और जिनकी नासमझी के कारण ऐसी परिस्थिति बनी, उनको लाइन अटैच करने का आदेश भी हो गया है। एक निष्पक्ष जांच भी संस्थित कर दी गई है। भास्कर- सीएम विदेश में थे ऐसे में डॉक्टरों के आंदोलन के दौरान कितने बार आपकी और सीएम के बीच बातचीत हुई है? डिप्टी सीएम- एक बार जब यह घटना हुई तब बातचीत हुई फिर स्टाइपेंड बढ़ाने के संबंध में बात हुई। उन्होंने कहा असेसमेंट कर लीजिए उन लोगों से चर्चा कर लीजिए। तीसरी बार जब बात हुई तो हमने कहा कि इसे फाइनल करने वाले हैं। उन्होंने कहा आप आगे बढ़िए। क्योंकि आप जानते हैं कि इस प्रकार के निर्णय मुख्यमंत्री जी की स्वीकृति के बाद ही लिए जा सकते हैं। तो हम लोग लगातार टच में थे। इससे एक महीने पहले बात हुई थी उसमें भी वे पॉजिटिव ही थे। बस समय की बात थी कि इसे कब करना है लेकिन, जब आंदोलन में वाटरकैनन और ये सब हुआ तो फिर तय हुआ कि इसे तुरंत करना है। भास्कर- डॉक्टरों और अन्य हेल्थ केयर वर्कर्स की मांगों को लेकर आगे आंदोलन की स्थिति न बने इसके लिए क्या व्यवस्था बना रहे हैं? डिप्टी सीएम- इनके जितने भी संगठन के लोग हैं वो सब हमारे टच में रहते हैं। हमारा भारतीय मजदूर संघ के माध्यम से भी वे समय लेते हैं तो हम बैठकों में अधिकारियों के साथ बैठकर सारे विषयों पर चर्चा कर लेते हैं। तो समय-समय पर कर्मचारियों की समस्याओं का निराकरण करते हैं वो संतुष्ट भी होते हैं। जो हमारे स्तर का होता है उसका हम निराकरण करते हैं। कुछ निर्णय मुख्यमंत्री जी के स्तर पर होते हैं। मुख्यमंत्री जी इस मामले में बहुत संवेदनशील और गंभीर हैं। वर्षों से अधिकारी- कर्मचारियों के प्रमोशन नहीं हो पा रहे थे। उनके प्रमोशन का रास्ता प्रशस्त हो गया। स्थिति ये हुई कि हम जब वल्लभ भवन गए तो अधिकारी-कर्मचारी हमें मिठाई खिलाने के लिए लाइन लगाकर खडे़ थे। ये बहुत बड़ा काम हुआ है। भास्कर- रीवा में कल्पना मिश्रा की मौत हुई, एक अन्य महिला मरीज के चेहरे पर कीड़े रेंग रहे थे? इन घटनाओं पर क्या कार्रवाई हुई? डिप्टी सीएम- कल्पना मिश्रा की जो दुखद मृत्यु हुई जिन्होंने भी देखा वो आहत हैं। शायद पहली बार ऐसा हुआ हो कि कंसल्टेंट लेवल के डॉक्टर्स को हमने तत्काल सस्पेंड किया। आमतौर पर पहले फॉरमेलिटीज होती हैं। हमने कहा ये सब बाद में करेंगे पहले सस्पेंशन होना चाहिए। जिम्मेदार नर्सिंग स्टाफ पर कार्रवाई की। डीन और अधीक्षक को भी बदला। जितनी तत्परता से हम कार्रवाई कर रहे थे उसके पीछे की यह सोच है कि हम इस घटना के कारणों का पता लगाकर इसकी तह में जाना चाहते थे। आखिर इस प्रकार की दुर्घटना का असली जिम्मेदार कौन है? लेकिन, हम जिस प्रकार से कार्रवाई कर रहे थे तो कांग्रेस के लोगों ने इस अवसर का लाभ उठाने के लिए कल्पना मिश्रा के मामले में राजनीति शुरु कर दी। कल्पना मिश्रा के पिता जी गांव चले गए थे और कार्रवाई हो रही थी। भास्कर: कांग्रेस कह रही है कि प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं बदहाल हैं? डिप्टी सीएम: 2003 के पहले जब कांग्रेस की सरकार थी। तो उस समय 1000 प्रसूताओं में से 450 माताओं की मौत हो जाती थी। जब हमारी सरकार बनी तो इस दिशा में तेजी से सुधार के प्रयास हुए। मैं जब 2023 में स्वास्थ्य मंत्री बना तब वो संख्या 173 हुई और बीते तीन सालों में घटकर 135 आ गई है। अगला एनएफएचएस सर्वे आएगा तो हमारा लक्ष्य इस आंकडे़ को 100 के नीचे पहुंचाने का है। हम तो मातृ और शिशु मृत्यु दर को राष्ट्रीय दर से नीचे ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में यदि किसी लापरवाही के कारण ऐसी घटना होती है तो उसे हम बिलकुल छोड ही नहीं सकते। हम बेहतर काम कर रहे हैं । इसी का असर है कि विंध्य क्षेत्र में उनके प्रति घृणा डबल हो गई है। विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस की स्थिति क्या है वो चुनाव परिणामों से समझा जा सकता है। पूरे विंध्य क्षेत्र में 30 सीटों पर मात्र चार-पांच विधायक ही कांग्रेस के जीत पा रहे हैं। इससे साफ है कि उनके कुशासन को जनता भूली नहीं हैं। भास्कर: रीवा में ही स्वास्थ्य सेवाओं पर कांग्रेस सवाल उठा रही है? डिप्टी सीएम: कोई साफ-सुथरा व्यक्ति आरोप लगाए तो एक समय लोग उसे ध्यान से समझ सकते हैं। लेकिन, जो घोषित शातिर राजनीतिज्ञ हैं वो लोग यदि आरोप लगाएंगे तो जनता सबको जानती है कि कौन कैसा है? ये जो वातावरण बना इससे यह हुआ कि इस प्रकार के एलिमेंट अस्पतालों में जाने लगे। कहीं भी किसी की फोटो खींचने लगे। स्वास्थ्य के क्षेत्र में रीवा को हम मेडिकल हब बना रहे हैं। संजय गांधी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर आश्चर्यचकित हैं कि इतना बड़ा डेवलपमेंट संजय गांधी में हो सकता है इसकी तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। भास्कर: रीवा की स्वास्थ्य सेवाओं में क्या विस्तार कर रहे हैं? डिप्टी सीएम: अभी हमने 750 बेड का मदर एंड चाइल्ड हॉस्पिटल के लिए 450 करोड़ रुपए मंजूर कराए हैं। जहां पर बमुश्किल 200 बेड थे। हम 300 बेड का कैंसर हॉस्पिटल बना रहे हैं। जहां 100 करोड़ रुपए की मशीनें लगेंगी। टाटा कैंसर हॉस्पिटल मुंबई में जो मशीनें हैं वो हमने रीवा में मंगा ली हैं। बिल्डिंग बनकर तैयार हो रही है। रीवा में किडनी ट्रांसप्लांट हो रहा है। वहां रोजाना दस से 15 एंजियोप्लास्टी हो रही है। बायपास सर्जरी हो रही है। इस प्रकार की परिस्थितियों के बाद वो लोग स्वास्थ्य में अव्यवस्थाएं हैं इसका जो सवाल उठा रहे थे। इससे लोगों को समझ आ गया कि इन्हें मृत्यु पर दुख नहीं हैं बल्कि मौत पर राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहे हैं। भास्कर: जिस महिला मरीज के चेहरे पर कीड़े रेंग रहे थे उसमें क्या कार्रवाई हुई? डिप्टी सीएम: मीडिया, सोशल मीडिया में ऐसा बताया गया कि उस महिला की पांच दिन पहले मृत्यु हो गई थी उसे पांच दिन तक उसे घोषित नहीं किया। मैंने इस मामले में पता किया है उसमें प्रोटोकॉल है कि ब्रेन डेड होने के बाद भी जब तक हार्ट चलता है तब तक मृत घोषित नहीं करते। इस बीच में कोई मक्खी, मच्छर जैसा उड़ने वाले कोई जीव जंतु आए उसके कारण ये परिस्थति आई लेकिन नर्सों ने उसे ठीक कर लिया। लेकिन, जब वहां पर 24 घंटे इस प्रकार के एलिमेंट्स यही दिखाने के लिए घूम रहे हैं कि यहां पर सारी व्यवस्थाएं गड़बड़ हैं तो उसी दौरान उन लोगों ने कुछ मिनट का वीडियो बनाकर संजय गांधी अस्पताल को बदनाम करने के लिए प्रचारित कर दिया। अब हमने यह कहा है कि अस्पताल में प्रोटोकॉल होना चाहिए कि हॉस्पिटल के अंदर वार्ड में, आईसीयू में दस नर्सेज हैं और वहां पांच अनवॉन्टेड लोग घूम रहे हैं। तो ऐसे अनावश्यक लोगों पर रोक लगनी चाहिए। किसी भी अच्छे अस्पताल में सिर्फ विजिटिंग ऑवर में ही मरीज के पास जाने को मिलता है। लेकिन हमारे यहां जब वार्ड के अंदर भीड को वेबजह जाने से रोका जाता है तो वे स्टाफ से लड़ाई झगड़े करते हैं। ये अव्यवस्था फैलाने वाले लोग राजनीतिक फायदा लेकर सत्ता में आना चाहते हैं। ये सत्ता में आकर करेंगे क्या? क्योंकि न तो ये काम करना चाहते हैं और न ही काम करना जानते हैं। यदि ये ठीक से काम करना जानते तो मप्र बीमारू राज्य क्यों कहलाता। मप्र में बीमारू क्षेत्र हमारा विंध्य कहलाता था। आज विंध्य डेवलपमेंट में इतना आगे हो गया है कि लोग विंध्य के विकास पर कहानियां बना रहे हैं। भास्कर: आपके जिले के एक विधायक ने कहा है कि खूबसूरत महिलाओं के शवों के साथ बलात्कार होता है? क्या सच में मप्र में ऐसा होता है? डिप्टी सीएम: जब व्यक्ति की सोच इतनी घिनौनी होती है तो वह उसके चेहरे पर दिखती है और बातों में भी दिखती है। राजनीति में जब इस प्रकार के लोग एंटर करते हैं तो इस प्रकार की गंदी बातें सामने आती हैं इस प्रकार की किसी बात पर जवाब देना मुझे लगता है कि उनकी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेता तो हम और आप क्यों लें? भास्कर: छिंदवाड़ा, बालाघाट में बच्चों की मौतें हुईं? ऐसी घटनाएं रोकने के लिए क्या नीति बनी है? डिप्टी सीएम: हमने यह तय किया है कि मेडिकल कॉलेज में जो प्रोफेसर होते हैं। उन कंसल्टेंट्स के डेली रूटीन को समझा वे रोज ओपीडी में आते हैं। फिर जिसका ओटी का दिन है वो ऑपरेशन थिएटर में जाएगा। फिर नियमित रूप से अपने यूनिट में राउंड लेंगे और मरीज देखेंगे। फिर यूजी की क्लास लेते हैं। उसके बाद पीजी स्टूडेंट्स की क्लास लेते हैं और उसके बाद शाम को यूनिट में राउंड लेते हैं। ऐसे रोस्टर के अनुसार कंसल्टेंट्स काम करते हैं। मैंने हेल्थ कमिश्वर के साथ विभागाध्यक्षों की बैठक में कहा था कि इतना सारा काम कंसल्टेंट्स के पास होता है। इतने व्यस्त रूटीन के बाद कंसल्टेंट्स के पास प्रायवेट प्रेक्टिस करने के लिए समय कहां है? फिर भी यदि आप प्रायवेट प्रेक्टिस करेंगे तो फिर मेडिकल कॉलेज के रूटीन कामों में कटौती करोगे। फिर यह बातें आएंगी कि आप राउंड पर नहीं आए। वहां पीजी स्टूडेंट्स काम कर रहे हैं। मेडिकल कॉलेज के हॉस्पिटल पेशेंट सर्चिंग के केन्द्र तो नहीं हैं? कि आप वहां मरीज देखो और फिर उसे प्रायवेट में ले जाओ। इसलिए इमेज खराब होती है। तो जिस मेडिकल कॉलेज में आपकी नियुक्ति हुई है उसमें पूरा समय दीजिए। आपको मॉनिटरिंग भी करनी पड़ेगी। सीरियस पेशेंट है तो आपको ऑन कॉल कभी भी बुलाया जा सकता है। ये तभी हो पाएगा। जब आप प्रायवेट प्रेक्टिस कर रहे हैं तो उसे मत करो। नहीं तो कभी कोई घटना होगी तो फिर आपके ऊपर कार्रवाई भी होगी निलंबन भी होगा। ये बात मैंने एचओडीज की बैठक में कही है। मैंने अपने प्रमुख सचिव से भी कहा है कि ऐसा मैकेनिज्म बना लें जिससे हम कभी भी यह देख सकें कि मेडिकल कॉलेज में किस वार्ड में किस राउंड है वो वहां उपस्थित हैं। या नहीं। उन्हें ये डर रहे कि कोई हमें देख रहा है। उसके बाद कोई मरीज आता है और वो बहुत ही क्रिटिकल है और तमाम प्रयासों के बाद भी हम उसे नहीं बचा पा रहे हैं तो उसके परिजनों को इस बात का स्वयं संतोष होना चाहिए कि डॉक्टरों ने बचाने की भरपूर कोशिश की है। चूंकि भर्ती के समय ही वो बहुत क्रिटिकल थे। कभी-कभार कैजुअल्टी होती हैं लेकिन उसके बाद भी मरीजों के परिजन यह कहते हैं कि डॉक्टरों ने अपनी तरफ से बचाने के लिए पूरा प्रयास किया।

