World Environment Day: दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस पर जलवायु परिवर्तन के बड़े खतरों पर चर्चा कर रही है, तब एशिया के सबसे बड़े ‘अर्बन फॉरेस्ट’ (करीब 10 हजार हेक्टेयर हरित क्षेत्र) रखने वाला जबलपुर कॉन्क्रीट के जंगल में फंस गया है। शहर के पास डुमना नेचर पार्क की दो हजार एकड़, मदन महल से बरगी हिल्स तक 625 एकड़ और सैन्य व सुरक्षा संस्थानों की करीब 21,600 एकड़ (जहां 70 प्रतिशत हरियाली है) जैसी ग्रीन बेल्ट है। इसके बावजूद शहर ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (शहरी ऊष्मा द्वीप) में तब्दील हो गया है। यहां अब दिन के साथ रातें भी भट्टी की तरह तप रही है।
खतरे का संकेत
मौसम विभाग के दशक भर के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि शहर का मौसम चक्र बिगड़ रहा है। साल 2019 में जून में अधिकतम तापमान ने 46.8 डिग्री का सर्वकालिक रिकॉर्ड छुआ था। लेकिन, असली डरावना बदलाव न्यूनतम (रात के) तापमान में आया है। मई महीने में लगातार एक सप्ताह से भी ज्यादा समय तक रात का तापमान 30 डिग्री या उसके आसपास रहा है। 2016-2020: रात का तापमान अमूमन 21 से 23 डिग्री के बीच रहता था। इससे रातें ठंडी हो जाती थीं। इस साल जून में अधिकतम तापमान 39.8 डिग्री दर्ज हो चुका, वहीं न्यूनतम तापमान 27.8 डिग्री पर पहुंच गया। यह जून के औसत न्यूनतम तापमान (27 डिग्री) से भी अधिक है। वैज्ञानिकों के अनुसार, जबलपुर के इस ‘लोकल हीटिंग’ के पीछे बड़ा भूगर्भीय कारण है।
बड़ी संख्या में तालाबों को पाट दिया गया
शहर के नीचे मौजूद ग्रेनाइट की कठोर चट्टानें भीषण गर्मी में किसी भट्ठी की तरह तप जाती हैं। पर्यावरणविद् प्रो. एचबी पालन के अनुसार ग्रेनाइट की यह प्रकृति होती है कि वह ऊष्मा सौखकर लम्बे समय तक रोके रखता है। पहले शहर के ताल-तलैया, कुएं और बावड़ियां ‘नेचुरल कूलिंग सिस्टम’ का काम करती थीं। लेकिन, बड़ी संख्या में तालाबों को पाट दिया गया। जमीन पर कंक्रीट की ‘त्वचा’ मढ़ दी गई है। कॉन्क्रीट और ग्रेनाइट मिलकर दिन भर की गर्मी अवशोषित कर लेते हैं, जो रात में धीरे-धीरे वातावरण में रिलीज होती है। इससे रातें गर्म हो रही हैं।
ये भी जानिए
10 हजार हेक्टेयर के लगभग एशिया का सबसे बड़े अर्बन फॉरेस्ट है शहर में
02 हजार एकड़ जमीन है निगम की डुमना नेचर पार्क में
625 एकड़ मदन महल पहाड़ी से बरगी हिल्स तक
21600 एकड़ सैन्यप्रशिक्षण संस्थान व सुरक्षा संस्थानों के पास
03 हजार हेक्टेयर फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट व फॉरेस्ट की अन्य जमीन
हजार पेड़ों की बलि…
पिछले पांच साल में फ्लाईओवर (मदन महल-दमोहनाका, कटंगा) और सड़क (डुमना रोड, अधारताल महाराजपुर) के चौड़ीकरण के नाम पर एक हजार से अधिक दशकों पुराने विशालकाय पेड़ काट काट दिए गए। वर्तमान में जबलपुर-कुंडम मार्ग पर भी तीन सौ पेड़ कटने की कगार पर हैं। पर्यावरण विद् एबी मिश्रा ने बताया कि नियमानुसार एक वयस्क पेड़ के बदले 10 पौधे लगने चाहिए, लेकिन हकीकत में सिर्फ ‘शो-प्लांट’ लगाकर खानापूर्ति की जा रही है। इसके विपरीत नगर निगम में सवा तीन लाख सम्पत्तियां दर्ज हैं (2 लाख आवासीय, 60 हजार कमर्शियल) और हर साल औसतन पंद्रह सौ नए कॉन्क्रीट भवन खड़े हो रहे हैं। ये वाटर रिचार्जिंग रोक रहे हैं।


