सवाल- मैं नई दिल्ली से हूं। मेरा बेटा 4 साल का है। जब वह पैदा हुआ तो हम चाइल्ड साइकोलॉजी की काफी किताबें पढ़ते थे। उसमें लिखा था कि बच्चों को बिल्कुल डांटना नहीं चाहिए। अभी वह चार साल का है और इन सालों में हमने कभी उसके सामने आवाज ऊंची नहीं की, उसे कभी डांटा नहीं। लेकिन अब वह काफी जिद्दी हो गया है। उसके मन का न हो तो रो-रोकर घर सिर पर उठा लेता है। हमें समझ नहीं आ रहा कि उसे कैसे हैंडल करें क्योंकि हम डांटना नहीं चाहते। प्लीज हमें गाइड करें। एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। बच्चे को न डांटना एक समझदार पेरेंटिंग है। लेकिन यहां देखने वाली दो जरूरी बातें हैं- समझने वाली बात– बच्चे को डांटना, मारना नहीं है। लेकिन सही-गलत और डूज-डोंट्स का फर्क समझाना जरूरी है। इसे समझाने का तरीका क्या हो, यही समझने की जरूरत है। आपने अब तक बहुत धैर्य और समझदारी से पेरेंटिंग की है। लेकिन ‘कभी न डांटना’ और ‘कोई लिमिट न तय करना’ इन दोनों में फर्क होता है। बच्चे के मनोविज्ञान से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें समझना जरूरी है। जैसेकि– 4 साल की उम्र में बच्चे- उनके दिमाग में ये मैसेज फीड हो जाता है- “रोना = जीत” इस सिचुएशन को पेरेंट्स कैसे हैंडल करते हैं? वे दो तरीके अपनाते हैं- लेकिन हमें करना क्या चाहिए कुछ उदाहरण: बच्चा दूसरी टॉफी के लिए जिद कर रहा है। वो रो रहा है, पैर पटक रहा है। पूरा घर सिर पर उठा रखा है। आप क्या करेंगे– गोल्डन रूल– बच्चे की जिद की असल वजह समझें बच्चों की जिद को पेरेंट्स सिर्फ बिहेवियरल प्रॉब्लम मान लेते हैं, जबकि इसके पीछे कई साइकोलॉजिकल, पेरेंटिंग और एनवायर्नमेंटल कारण छिपे होते हैं। अगर इन कारणों को सही तरीके से समझ लिया जाए, तो बच्चे के व्यवहार को संभालना आसान हो जाता है। नीचे दिए ग्राफिक से समझिए बच्चे आखिर जिद क्यों करते हैं- समस्या ‘जिद‘ नहीं, ‘सिखाने का तरीका‘ है 4 साल की उम्र में बच्चा- इसलिए जब उसकी बात नहीं मानी जाती, तो वह रोकर, चिल्लाकर रिएक्ट करता है। इसका मतलब ये नहीं कि बच्चा बिगड़ गया है। इसका मतलब है कि उसे इमोशन मैनेज करना सिखाना बाकी है। तो क्या बच्चे को डांटना सही है? इसमें फर्क सिर्फ ये है कि बच्चे को डांटना नहीं, गाइड करना है। असली जरूरत: डिसिप्लिन की है, ना कि पनिशमेंट की बहुत से पेरेंट्स इन दोनों को एक जैसा समझ लेते हैं। जबकि- आपका लक्ष्य बच्चे को सही तरीका सिखाना होना चाहिए, न कि उसे डराना। बच्चे की जिद को ऐसे करें हैंडल जब बच्चा जिद करे तो पेरेंट्स का काम उसे डांटने-मारने या जिद पूरी करने की बजाय स्थिति को समझदारी से हैंडल करना है। अगर पेरेंट्स शांत रहकर कुछ आसान तरीके अपनाएं, तो बच्चे में धीरे-धीरे सुधार होगा। नीचे ग्राफिक से समझिए कि बच्चा जिद करे तो तुरंत क्या करना चाहिए- बच्चे की परवरिश के गोल्डन रूल्स जब हम प्यार, धैर्य और स्पष्ट नियमों के साथ बच्चे को गाइड करते हैं तो वह धीरे-धीरे सही व्यवहार सीखता है। नीचे दिए गए पेरेंटिंग के कुछ गोल्डन रूल्स हैं, जो बच्चे की जिद को सही तरीके से संभालने में मदद करेंगे। बच्चे की जिद कम करने के लिए 7-दिन का एक्शन प्लान सबसे पहले ध्यान रखें, यह कोई मैजिक नहीं है, लेकिन अगर लगातार इसे फॉलो करेंगे तो 7 दिन में फर्क दिखना शुरू हो जाएगा। पहला दिन– ‘ऑब्जर्बेशन डे’ आज कुछ बदलना नहीं है, बस समझना है कि- इसे एक डायरी में नोट करें। इसका मकसद ट्रिगर को पहचानना है। दूसरा दिन– कनेक्शन बनाएं आज से कुछ एक्शनेबल काम शुरू करें। फायदा तीसरा दिन– स्पष्ट नियम बनाएं आज 2-3 छोटे नियम सेट करें। जैसेकि- बच्चे को नियम के फायदे-नुकसान बताएं। शांति से बात करें। ये नियम खुद भी फॉलो करें। उसे बताएं कि ये नियम नहीं बदलेंगे। चौथा दिन– ‘नहीं मतलब नहीं’ आज असली टेस्ट है। जब बच्चा जिद करे- अगर रोता है- पांचवां दिन– “पॉजिटिव रीइन्फोर्समेंट” आज फोकस बदलें। गलत पर नहीं, सही पर ध्यान दें। तुरंत बोलें- इससे व्यवहार में पॉजिटिव बदलाव आएगा। छठा दिन– ‘शांति सिखाएं’ आज बच्चे को शांत होना सिखाएं। इसे खेल की तरह सिखाएं। उससे कहें- इससे दिमांग शांत होगा। सातवां दिन– “रियल प्रैक्टिस डे” अब सबकुछ साथ में लागू करें। जब बच्चा जिद करे, उससे कहें- सबसे जरूरी बात नोट: पहले 2-3 दिन बच्चा और ज्यादा जिद करेगा, क्योंकि उसे लगेगा कि अब तक तो रोकर काम हो जाता था। लेकिन आप टिके रहे तो 4-5 दिन में बदलाव दिखेगा और 2-4 हफ्तों में काफी फर्क महसूस होगा। 5 लाइनें, जो आपको बिल्कुल नहीं बोलनी हैं- अंत में यही कहूंगी कि बच्चों की जिद कोई बड़ी समस्या नहीं है। यह उनके विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस समय उन्हें डांटने की बजाय धैर्य, समझदारी के साथ हैंडल करें। इससे वे धीरे-धीरे इससे बाहर निकल जाते हैं। ………………….. पेरेंटिंग की ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- दूध पीकर बच्चा सो जाता है: क्या उसे नींद से उठाकर डकार दिलाना जरूरी, मैं नई मां हूं, थोड़ा कनफ्यूज भी, क्या करूं? सबसे पहले तो आपको मां बनने की बधाई। एक नई मां के रूप में आपके मन में ऐसे सवाल आना स्वाभाविक हैं। इस समय आसपास के लोग तरह-तरह की सलाह देते हैं। इससे कन्फ्यूजन और बढ़ जाता है। इसलिए सही जानकारी होना जरूरी है। आगे पढ़िए…
पेरेंटिंग- 4 साल के बेटे को कभी डांटा-मारा नहीं:अब वो बहुत जिद्दी हो गया है, बच्चे को बिना डांटे प्यार से डिसिप्लिन कैसे सिखाएं


