असम विधानसभा में बुधवार को विपक्षी सदस्यों ने समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर लाए गए विधेयक को “भाजपा का राजनीतिक एजेंडा” बताया और प्रस्तावित कानून को पारित करने से पहले सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श की मांग की।
‘द यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम, 2026 विधेयक’ पर चर्चा के दौरान विपक्षी विधायकों ने यह भी कहा कि यह समाज के एक विशेष वर्ग के अधिकारों को नुकसान पहुंचा सकता है।
कांग्रेस विधायक दल के नेता वाजेद अली चौधरी ने कहा, ‘‘समान नागरिक संहिता में जिन विषयों का उल्लेख किया गया है, वे पहले से ही अलग-अलग कानूनों के माध्यम से लागू हैं। बाल विवाह, बहुविवाह, विवाह और तलाक का पंजीकरण, गुजारा भत्ता और अन्य मुद्दे विभिन्न कानूनों द्वारा शासित हैं।
फिर यूसीसी लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी।’’
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह “कानूनों का सरलीकरण नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को और अधिक जटिल बनाना है।”
चौधरी ने सवाल उठाते हुए कहा, “भाजपा इसे केवल राजनीति के लिए लायी है। लोगों के निजी मामलों में हस्तक्षेप करना लोकतांत्रिक नहीं है। और जो कानून आदिवासियों को बाहर रखता है, उसे समान कैसे कहा जा सकता है?”
उन्होंने आरोप लगाया कि यूसीसी लाना बेरोजगारी, बाढ़ और सरकारी स्कूलों की स्थिति जैसे मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने की एक रणनीति है।
विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ जैसे व्यक्तिगत मामलों पर एक समान कानून लागू करने के उद्देश्य से, असम सरकार ने सोमवार को समान नागरिक संहिता से संबंधित एक विधेयक पेश किया, जिसमें बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने और लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।
हालांकि, विधेयक में कहा गया है कि यह असम में रहने वाले अनुसूचित जनजाति समुदाय पर लागू नहीं होगा।
इसमें कई दंडात्मक प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं, जिनमें बहुविवाह या दो विवाह के लिए सात साल की कैद और लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण न कराने पर तीन महीने की जेल शामिल है।
चौधरी का समर्थन करते हुए कांग्रेस विधायक जाकिर हुसैन सिकदर ने कहा कि 2018 में तत्कालीन विधि आयोग ने यूसीसी की आवश्यकता नहीं होने की राय दी थी।आयोग के अनुसार, यदि सरकार इसे लागू करना भी चाहती है तो उसे सभी हितधारकों से व्यापक परामर्श करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “असम सरकार ने विभिन्न धार्मिक संगठनों से चर्चा किए बिना यह विधेयक पेश कर दिया है। कई धर्म और सामाजिक समूह विधानसभा में प्रतिनिधित्व नहीं रखते।
हमारी पहचान ‘विविधता में एकता’ है।”
सिकदर ने मांग की कि विधानसभा में इस विधेयक को पारित करने से पहले व्यापक परामर्श किया जाए। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह किया कि मसौदा कानून को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।
उन्होंने यह भी कहा, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2023 में भारतीय जनता पार्टी की एक बूथ बैठक में कहा था कि एक घर के दो सदस्यों के लिए दो कानून नहीं हो सकते और एक घर के लिए एक ही कानून होना चाहिए।
इसलिए यूसीसी का शीर्षक बदलना चाहिए क्योंकि यह राज्य के सभी लोगों को शामिल नहीं करता।”
सिकदर ने सवाल उठाया कि सरकार कुछ लोगों को इसमें शामिल न करके उनके साथ अन्याय क्यों कर रही है।
उन्होंने कहा, “यह विधेयक केवल भाजपा का राजनीतिक एजेंडा है, क्योंकि इन विषयों से जुड़े पहले से ही मौजूदा कानून मौजूद हैं। हमें यूसीसी की आवश्यकता नहीं है।”
एक अन्य कांग्रेस विधायक नुरुल होदा ने एक संशोधन प्रस्ताव लाते हुए राज्य के सभी जनजातियों और समुदायों को यूसीसी के दायरे में शामिल करने की मांग की।
उन्होंने कहा, “हमारा संविधान कहता है कि जाति, पंथ और धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं हो सकता। हम कुछ समूहों को किसी कानून के दायरे से बाहर नहीं रख सकते।”
एआईयूडीएफ विधायक मजीबुर रहमान ने कहा कि संविधान में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए विभिन्न प्रावधान दिए गए हैं, और असम सरकार ने यूसीसी को संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत लाया है, जो राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों का हिस्सा है।
उन्होंने आरोप लगाया, “हालांकि, निदेशक सिद्धांतों के नाम पर मौलिक अधिकारों का त्याग नहीं किया जा सकता। एक प्रक्रिया चल रही है जिससे कुछ वर्गों के अधिकारों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।”
रहमान ने यह भी कहा कि मुख्य रूप से शरीयत पर आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ में वे सभी बिंदु पहले से ही मौजूद हैं जो प्रस्तावित यूसीसी में शामिल किए गए हैं।


